30 जून 2009

डॉ. विनोद निगम के दो नवगीत - इसी विषय पर

गाढी हो गई धूप

गाढी हो गई धूप
नीमों के नीचे भी,
सूख गए फल वाले हरे कुंज आमों के,
फूल के बगीचे भी,

छायाएं सिमट गईं वस्त्रहीन पेड़ों में,
सूखापन बिछा हुआ, खेतों में, मेड़ों में
हाँफ रहा शहर ,गर्म हवा के थपेड़ों में,
उड़ती है तपी धूल ,
आगे भी ,पीछे भी,

सड़कों पर दूर दूर सन्नाटा.
झुलस गया कोलाहल
सूखा, आकर्षण चौराहों का
कुम्हलायी चहल॰पहल
भाप बन गए ,पुरइन वाले तालाब कुएं
कलशों का ठंडा जल,

बित्तों भर बची नदी ,
भिगो नहीं सकी मुई गोरी की घांघर को
टखनों के नीचे भी,

कमरों में जमीं हुई खामोशी,
बाहर है पिघलापन,
मौसम के आग बुझे हाथ, छू रहे तन को,
मन को भी घेरे है, एक तपन,
और एक याद, जो चमक उठती रह रह
ज्यों धूप में टंगा दर्पण ,

सुलग रहे हरियाली के आँचल,
दूब के गलीचे भी,
नीमों के नीचे भी ,
गाढी हो गई धूप


धूप

घाटियों में ऋतु सुखाने लगी है
मेघ धोये वस्त्र अनगिन रंग के
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।

पर्वतों पर छन्द फिर बिखरा दिये हैं
लौटकर जातीं घटाओं ने।
पेड़, फिर पढ़ने लगी हैं, धूप के अखबार
फुरसत से दिशाओं में।
निकल, फूलों के नशीली बार से
लड़कड़ाती है हवा
पाँव दो, पड़ते नहीं हैं ढ़ग के।

बँध न पाई, निर्झरों की बाँह, उफनाई नदी
तटों से मुँह जोड़ बतियाने लगी है।
निकल जंगल की भुजाओं से, एक आदिम गंध
आंगन की तरफ आने लगी है।

आँख में आकाश की चुभने लगी हैं
दृश्य शीतल, नेह-देह प्रसंग के।
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।

-डॉ. विनोद निगम

29 जून 2009

नवगीत - कुछ जिज्ञासाएँ कुछ समाधान

राजेन्द्रप्रसाद सिंह ने सन् 1958 में मुज़फ़्फ़रपुर से प्रकाशित ‘गीतांगिनी’ में नवगीत का प्रयोग किया । इससे पूर्व 1957 में इलाहाबाद साहित्य सम्मेलन में वीरेन्द्र मिश्र ने ‘नवगीत’ पर निबन्ध पढ़ा । आकाशवाणी से प्रसारित’नई कविता’विषयक वार्त्ताओं में देवी शंकर अवस्थी ने इसे कविता की कसौटी से अलग नहीं स्वीकारा-“नए गीत को नई कविता के समानान्तर किसी काव्य –धारा के रूप में देखना अनुचित है।”

जब कविता के स्थान पर ‘नई कविता’ प्रचलित हो सकती है तो नवगीत के नाम पर नाक –भौं सिकोड़ना उचित नहीं है । अतीत से पूर्णतया कटकर वर्त्तमान का कोई मूल्य नहीं है । न सारे पारम्परिक गीत लिजलिजी भावुकता के शिकार हैं और न ‘नवगीत’ के नाम पर लिखी जाने वाली सारी रचनाएँ पूरी तरह से नवगीत हैं । जहाँ तक शिल्प के अन्तर की बात है; किसी एक ही विधा में एक ही रचनाकार अपने विकासमान शिल्प के कारण अलग दिखाई दे सकता है । यदि ऐसा नहीं होगा तो फिर नयापन कहाँ रह जाएगा ? कथ्य की नवीनता , वैयक्तिकता के स्थान पर सामाजिकता का स्वर ,उपमान , बिम्ब , प्रतीक ,भाषा ,छन्द सभी में नयापन । लोकजीवन की आँच में बसी –तपी सहज भाषा ने इसके रूप को सँवारा है । विभिन्न आघात –प्रत्याघात से आहत मानव को अभिव्यक्ति दी है । छन्दोबद्ध हो जाने मात्र से लयात्मकता नहीं आ पाती है। छन्द को गति और यति की कसौटी पर कसकर नवगीत के लयात्मक स्वरूप की सत्ता स्थापित की जाती है । संवेदना और शिल्प में सन्तुलन ज़रूरी है । शिल्प की जकड़बन्दी में नए उपमान , प्रतीक और बिम्ब भी अपनी चमक खोने लगते हैं । ये सभी तभी कारगर होते हैं जब इनमें जीवन झलकता है।

यहाँ हरिशंकर सक्सेना, यश मालवीय और कुँअर बेचैन के तीन अलग –अलग रंगों - भंगिमाओं एव भाव गीत दिए जा रहे हैं।
सक्सेना जी के नवगीत ‘मत अंगार बिछाओ’ में पूरा राष्ट्रीय परिदृश्य है। मानचित्र ,अंगार , नागफनी , फ़सल , खरपतवार, जोंकें आदि प्रतीक पूरी विषम परिस्थिति की व्याख्या बनकर उपस्थित हैं। आज यदि देश की हालत पर नज़र डालें तो मानचित्र को जलाने के षड़यन्त्र रोज रचे जा रहे है। नारेबाज़ी में पूरा देश घिरा नज़र आ रहा है। शोषकवर्ग इधर के वर्षों मे खूब फूला-फला है। यह नवगीत वर्त्तमान परिस्थिति का आईना है।

1-मत अंगार बिछाओ
हरिशंकर सक्सेना
जल जाएगा
मानचित्र यह
मत अंगार बिछाओ।

मौसम की
बीमार हवा भी
आक्रामक लगती है
आदर्शों की
पगडण्डी पर
नागफनी उगती है।
मर जाएगी फ़सल यहाँ
मत खर –पतवार उगाओ।
जोंके
पीकर रक्त हमारा
आदमकद हो आईं
शिरा-शिरा में
कालदंश की
लहरें फिर मुस्काईं।

राह ढूँढ़ती पीढ़ी को
मत नारों में उलझाओ ।

[साभार :काव्या -4 (1991) सम्पादक : हस्तीमल ‘हस्ती’]
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दूसरा नवगीत ‘बेटे हैं परदेस में’ पारिवारिक परिदृश्य की मार्मिक अनुभूति को पूरी तन्मयता से अभिव्यक्त करता है। बेटे भी कैसे ? मेरी दोनों आँखों जैसे ; वह भी परदेस में । साँय –साँय करता पूरा घर जैसे अनकही उदासी से घिरा हुआ है। अलगाव का दर्द घर को और घर के हर व्यक्ति को व्यथित कर रहा है । बेटों का पल भर न बिसरना उनके प्रति गहरे लगाव को व्यंजित करता है। इस नवगीत में अलगाव की विवशता को सहर्ष स्वीकार करने का आग्रह भी है। रोटी –रोज़ी के लिए घर परिवार से दूर जाना जीवन का कड़वा सच है।

2-बेटे हैं परदेश में
यश मालवीय

मेरी दोनों आँखों जैसे
बेटे हैं परदेस में ।

याद आ रही है दोनों की
मिली-जुली –सी शैतानी
नहीं हो रही है
इन दोनों बाहों की खींचातानी
पत्थर बना रहा है
अम्मा की आँखों वाला पानी
फ़ोन कर रही
सन जैसे बालों की बुढ़िया नानी-

हमें बताओ , आखिर कैसे
बेटे हैं परदेस में ?

दादी की तस्वीर
कह रही है, बच्चों को फ़ोन करो
बैठो नहीं इस तरह
उठकर सन्नाटे पर पैर धरो
देख अजनबी अपना चेहरा
शीशे में , किसलिए डरो ?
मरने की तो उमर नहीं है
क्यों आखिर इस तरह मरो ?

हमें पता है जैसे –तैसे
बेटे हैं परदेस में !

साँय-साँय करता पूरा घर
पूरे घर को गाओ ना
गाओ कुछ इस तरह कि गा दे
घर का हर कोना-कोना
मधुर-मधुर –सा गीत बना दो
ये अपना हँसना-रोना
कठिन वक़्त का चले न
सूरज –चन्दा पर जादू टोना

नहीं बिसरते पल भर , ऐसे
बेटे हैं परदेस में !
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[ आजकल : अप्रैल 2009 से साभार ]

कुँअर बेचैन का नवगीत ‘बेटियाँ’ नवगीत –जगत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है । बेटी के लिए कवि द्वारा प्रयुक्त उपमान नवीन एवं ताज़गी लिये हुए तो हैं ही ,साथ ही साथ बेटी के सन्दर्भ में नितान्त उपयुक्त नवीन उपमान -‘शीतल हवाएँ’ , तरल जल की परातें, लाज़ की उज़ली कनातें, पावन-ऋचाएँ हैं तो कुछ प्रचलित उपमान –‘पारे, ध्रुव-सितारे,नाव, घटाएँ’ अपनी नई आभा के साथ उपस्थित हैं ।

3-बेटियाँ : कुँअर बेचैन
बेटियाँ-
शीतल हवाएँ हैं
जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं
बेटियाँ -
पावन-ऋचाएँ हैं
बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं
हैं चपलता तरल पारे की
और दृढता ध्रुव-सितारे की
कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन
नाव हैं ये उस किनारे की
बेटियाँ-
ऐसी घटाएँ हैं
जो छलकती हैं, नदी बनकर नहीं बहतीं ।

सामाजिकता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि मानव-मन की सहज चेतना में अंकुरित, पल्लवित –पुष्पित भावों और कल्पना को तिलांजलि दे दी जाए और नवगीत को किसी विचारधारा विशेष का अनुचर बना दिया जाए । ‘चन्दन वन डूब गया’ के नवगीतकार किशन सरोज की इन पंक्तियों की सामाजिकता और गहन तथा पावन प्रेमानुभूति(गंगा शब्द को ध्यान में रखकर) को देखिए:-

(क ) -अपनी ही पीड़ा मत जानो मेरे मन !
आँगन का भी दु:ख पहचानो मेरे मन !

(ख) 1– मिल सको तो अब मिलो
अगले जनम की बात छोड़ो ।

2-नागफनी आँचल में बाँध सको तो आना
धागो- बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं ।

3- कर दिए लो
आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र
तुम निश्चिन्त रहना।
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प्रस्तुति -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

24 जून 2009

नवगीत से जुड़ी घटनाएँ

कभी कभी रचनाओं के साथ रोचक घटनाएँ जुड़ी होती हैं।

उदाहरण के लिए मेरी रचना "धूप के दिन आए" ऊपर दिए गए चित्र को देखने के बाद लिखी गई थी। क्या इस कार्यशाला में आपकी रचना के पीछे भी कोई रोचक घटना छुपी है जिसके साथ मिलकर आपका नवगीत और भी रोचक हो जाए, तो वह घटना हमें इस पृष्ठ पर दिए गए पते पर लिख भेजें। नवगीत के साथ उसे प्रकाशित करने में हमें प्रसन्नता होगी।
--पूर्णिमा वर्मन

21 जून 2009

२०- आहा...लो, आई गर्मी

गर्मी के दिन दुई चार हो भैया,
गर्मी के दिन, दुई -चार !
आते हैँ, फिर जाते हैँ,
यूँ ही,
गर्मी के दिन दुई चार !
करेँ खुदाया खैर हो भैया,
गर्मी के दिन दुई चार ..

आता जाडा,खूब ठिठुरता,
कँपकँपी बदन मेँ,
ओढ, रजाई गुजरता
काँपे, हम दिन रैन
हैँ ये मौसम के खेल..
हो भैया, फिर, आते हैँ,
गर्मी के दिन, दुई चार !

बरखा रानी, झमझम आतीँ,
नदियाँ,पोखर,छलका जातीँ
काले मेघा, बरस बरस कर
कर देते, मालामाल
यूँ बीतता सावन भादो
कहाँ गये बताओ भैया,
गर्मी के दिन,दुई चार?

काले जामुन, आम रसीले,
बेर,अचार,छाछ,शरबत,
चलता पँखा घर्र घर्र कर,
सब गर्मी से बदहाल,
छुट्टी मेँ बच्चे करेँ धमाल
यूँ बीते हैँ रे,भैया,
गरमी के दिन दुई चार!

रम्मी,कैरम,ताश के पत्ते,
रानी राजा, सत्ती, अट्ठे,
जीजा, जीजी,'हा हा'हँसते,
कूलरवाले कमरे मेँ,
फैमेली फन का इँतजाम
बीते चैनभरे दिन यूँ,
गरमी के दिन दुई चार !

सीझन ब्याह का,आये दुल्हेराजा
बैन्ड बाजे गाजे,शहनाई
आरती करे दुलहिन की मम्मी,
तरबतर नाचेँ, सँग बाराती,
आइस्क्रीम खायेँ ,दादी, नानी,
उत्सव से जगमग- लकदक,
गरमी के दिन, दुई चार !

हो भैया,
आते हैँ, फिर जाते हैँ,
यूँ ही,
गर्मी के दिन, दुई -चार !
करेँ खुदाया खैर हो भैया,
गर्मी के दिन दुई चार

--लावण्या शाह

20 जून 2009

१९- आते हैं जब गर्मी के दिन

आते हैं जब गर्मी के दिन
आ जाते तब छुट्टी के दिन
नाचे गायें धूम मचायें
अच्छे कितने, मस्ती के दिन
आते हैं जब गर्मी के दिन...

दूर पहाड़ों पर जो जायें
कुदरत का सब मज़ा उठायें
ठंडे मौसम में जब घूमें
गर्म हवा फिर भूल ही जायें

क़ुल्फ़ी ठंडी खाने के दिन
आते हैं जब गर्मी के दिन...

जेठ तपे है, आम पके है
सड़कें रो रो कर पिघले हैं
पोंछ पसीना लाल हुआ तन
पीयें बहुत, न प्यास मिटे है

कटती रातें तारे गिन-गिन
आते हैं जब गर्मी के दिन...

आषाढ़ के पीछे हंसता सावन
सर्दी-गर्मी कुदरत का तन
क्यूं घबराये मेरे साथी
सुख-दुख से बनता है जीवन

पंछी प्यासे गाते निश-दिन
आते हैं जब गर्मी के दिन...

आंखों में सूरज है चुभता
तन्हाई में सीना तपता
रिश्ते सारे टूट हैं जाते
साथ बदन के जी है जलता

ऐसे होते मुफ़लिस के दिन
आते हैं जब गर्मी के दिन...

दुनिया में बारूदी गर्मी
हिंसा औ बदले की गर्मी
इन्सा से अब इन्सा लड़ता
गई किधर वो प्यारी गर्मी

कौन भुलाये वैसे दिन
आते हैं जब गर्मी के दिन...

--निर्मल सिद्धू

19 जून 2009

१८- गर्मी की ऋतु ऐसी

गर्मी की ऋतु ऐसी
जिसमें साजन भये विदेशी
सारे ए.सी. बन्द पड़े
कैसे कैसे समय कटे।

तन जलता
मन बहुत मचलता
दिन निकले कैसे
शुष्क नदी में
मीन तड़पती
बिन पानी जैसे
ताल तलैया सूख गए हैं
पोखर सब सिमटे।

अंगिया उमसे
बिस्तर चुभता
तन तरबतर हुआ
कहाँ जायें है पीछे खाई
आगे मुआं कुआं
सब सोलह शृंगार व्यर्थ ही
टप टप टप टपके।
कैसे कैसे समय कटे।

--डॉ. रमा द्विवेदी

18 जून 2009

१७- जाने क्या हो गया

जाने क्या हो गया, कि
सूरज इतना लाल हुआ।

प्यासी हवा हाँफती
फिर-फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ-कोकिला, मीठी
बानी खोज रही
नीम द्वार का, छाया खोजे
पीपल गाछ तलाशे
नदी खोजती धार
कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी-पानी रटे
रात-दिन, ऐसा ताल हुआ।

जाने क्या हो गया, कि
सूरज इतना लाल हुआ।।

सूने-सूने राह, हाट, वन
सब कुछ सूना-सूना
बढ़ता जाता और दिनो-दिन
तेज धूप का दूना
धरती व्याकुल, अम्बर व्याकुल
व्याकुल ताल-तलैया
पनघट, कुँआ, बावड़ी व्याकुल
व्याकुल बछड़ा गैया
अब तो आस तुझी से बादल
क्यों कंगाल हुआ।

जाने क्या हो गया, कि
सूरज इतना लाल हुआ।।

--डॉ. जगदीश व्योम

17 जून 2009

१६- गर्मी के दिन

भोर जल्द भाग गई लू के डर से
साँझ भी निकली है बहुत देर में घर से
पछुँआ के झोकों से बरसती अगिन
गर्मी के दिन।

पशु-पक्षी पेड़-पुष्प सब हैं बेहाल
सूरज ने बना दिया सबको कंकाल
माँ चिड़िया लाती पर दाने बिन-बिन
गर्मी के दिन।

हैण्डपम्प पर कौव्वा ठोंक रहा टोंट
कुत्ता भी नमी देख गया वहीं लोट
दुपहरिया बीत रही करके छिन-छिन
गर्मी के दिन।

बच्चों की छुट्टी है नानी घर तंग
ऊधम दिन भर, चलती आपस की जंग
दिन में दो पल सोना हो गया कठिन
गर्मी के दिन।

शादी बारातों का न्योता है रोज
कहीं बहूभोज हुआ कहीं प्रीतिभोज
पेट-जेब दोनों के आये दुर्दिन
गर्मी के दिन।

--अमित

16 जून 2009

१५- गर्मी के दिन फिर से आये

गर्मी के दिन फिर से आये

सुबह सलोनी, दिन चढ़ते ही
बनी चंडी आंखें दिखलाने
और पीपल की छांव सड़क पर
लगी अपनी रहमत जतलाने
सन्नाटे की भाँग चढ़ा कर
पड़ी रही दोपहर नशे में
पागल से रूखे पत्ते ज्यों
पागल गलियाँ चक्कर खाये

गर्मी के दिन फिर से आये

नंगे बदन बर्फ़ के गोलों
में सनते बच्चे, कच्छे में
कोने खड़ा खोमचे वाला
मटका लिपटाता गमछे में
मल कर गर्मी सारे तन पर
लू को लिपटा कर अंगछे में
दो आने गिनता मिट्टी पर
फिर पड़ कर थोड़ा सुस्ताये

गर्मी के दिन फिर से आये

तेज़ हवा रेतीली आंधी
सांय सांय सा अंदर बाहर
खड़े हैं आंखें मूँदे, सारे
महल घरोंदे मुँह लटकाकर
और उधर लड़ घर वालों से
खेल रही जो डाल-डाल पर
खट्टे अंबुआ चख गलती से
कूक कूक पगली चिल्लाये

गर्मी के दिन फिर से आये

ठेठ दुपहरी में ज्यों काली
स्याही छितर गई ऊपर से
फिर कुछ रूई के फ़ाहों के
धब्बे पड़े बरस ओलों के
संग में बरसी खूब गरज कर
बड़ी बड़ी बूंदे, सहसा ही
जलता दिन जलते अंगारे
उमड़ घुमड़ रोने लग जाये

गर्मी के दिन फिर से आये

--मानसी

15 जून 2009

१४- गर्मी की है बात निराली

गर्मी की
है बात निराली
दिन तपता पर रात सुहानी

जलता सूरज
आग लगाए
दावानल सा खूब जलाए
कोई
कहीं बचे न बाकी
माँगे मिले कहीं
ना पानी

गर्मी की
है बात निराली
दिन तपता पर रात सुहानी

तप कर
ही तो कुन्दन बनता
तप से सबका रूप निखरता
झीलों में,
सागर में पानी
गर्मी नहीं तो सब
बेमानी

गर्मी की
है बात निराली
दिन तपता पर रात सुहानी

--अर्बुदा ओहरी

14 जून 2009

१३. रचनाकारों के नाम व अन्य सूचनाएँ

आज से हर रोज़ दो गीतों में रचनाकारों के नाम जोड़े जा रहे हैं। यह जानना रोचक हो सकता है कि नाम किस गीत में लगा। यानि किस गीत का रचनाकार सामने आया और जो सामने आया वह कौन है...

साथ ही नए विषय की घोषणा- अगली कार्यशाला-३ के लिए विषय है- सुख दुख इस जीवन में...। रचना में इन पंक्तियों का होना आवश्यक नहीं है। रचना भेजने की अंतिम तिथि है- ३० जून २००९।

इसके साथ ही एक सूचना और- अनुभूति का १३ जुलाई का अंक कदंब विशेषांक होगा। इस विशेष अवसर के लिए कदंब के फूल या पेड़ से संबंधित गीत, गज़ल, दोहा, हाइकु, क्षणिका, मुक्तक और छंदमुक्त रचनाएँ आमंत्रित है। रचना भेजने की अंतिम तिथि १ जुलाई २००९ है।

१२- द्वारचार कर जाती गरमी

सोचो, जानो और समझ लो,
कैसे है सह जाती धरनी।
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी।

अक्सर शांत समुन्दर ने ही,
तूफां का आगाज किया है।
कठिन डगर चलने वाले को,
मंजिल ने सरताज किया है।

काम लगन से करने वालों,
मीठे फल है लाती करनी।
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी।

उजियारा होने से पहले,
होती है अंधियारी रात।
दुख के पीछे सुख आयेगा,
लगती कितनी प्यारी बात।

बुरे वक्त में अच्छा सोचो,
दिल में है आ जाती नरमी।
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी।

जीवन जीना एक कला है,
उससे यूँ घबराना कैसा।
धूप छांव के बीच रहा है,
रिश्ता अजब पुराना जैसा।

भावी खुशियों के खातिर ही,
पीड़ा है पड़ जाती सहनी।
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी।
--समीर लाल 'समीर'

13 जून 2009

११- गर्मी के मौसम में

गर्मी के
मौसम र्में

चिलचिलाती धूप यह
कितनी हो क्रुद्ध चली।
घूम रही गली-गली
छांह के विरूद्ध पली।
अंतहीन
सड़कों में
पांव जले
डामर में
हांफने लगा जीवन
सांसों के घेरों में।
सन्नाटा घोल गया
क्या-क्या इन प्राणों में।
गर्मी के
मौसम में

देखो वह सृजनहार
हाथों में छाले
आँखों में आस लिये
रहता भ्रम पाले।
पेट की
बुझी न आग
कैसी है
नियति हाय!
मुट्ठी भर छाया ना
भाग्यहीन कहां जाय?
धरती शृंगार गया
झर-झर पसीने में।
गर्मी के
मौसम र्में
-- निर्मला जोशी

11 जून 2009

१०- क्यों याद करे मन?

गर्मी की रातें, वो गर्मी के दिन
दस्तक दें मुझको, क्यों याद करे मन?

वो बालू के टीले, वो मन्दिर की घंटी
वो बेला, चमेली, वो पानी की टंकी
वो रुकती हवाएं, वो पेड़ों के पत्ते
वो माटी घरोंदे, वो सखियों के मेले,

रातों की बातें, वो भीगा सा मन
तरसाए मुझको, क्यों याद करे मन?

ये तपते से दिन हैं, हैं कमरों में परदे
ये नकली हवा हैं, ये नकली ही गुल हैं
न बातों में सच है, ना वादों की हिम्मंत
न माटी है घर में, ना माटी की इज्ज्त

गर्मी की बातें, वो रीता सा खत
भरमाए मुझको, क्यों याद करे मन?

--डॉ.श्रीमती अजित गुप्‍ता

9 जून 2009

९- जरा धूप फैली

जरा धूप फैली जो
चुभती कड़कती
हवा गर्म चलने लगी है ससरती

पिघलती
सी देखी
जो उजली ये वादी
परिंदों ने की है शहर में मुनादी
दरीचे खुले हैं सवेर-सवेरे
चिनारों पे आये
हैं पत्‍ते घनेरे
हँसी दूब देखो है कैसे किलकती

ये सूरज
जरा-सा
हुआ है घमंडी
कसकती हैं यादें पहन गर्म बंडी
उठी है तमन्ना जरा कुनमुनायी
खयालों में
आकर, जो तू मुस्कुरायी
ये दूरी हमारी लगे अब सिमटती

बगानों
में फैली
जो आमों की गुठली
सँभलते-सँभलते भी दोपहरी फिसली
दलानों में उड़ती है मिट्टी सुगंधी
सुबह से
थकी है पड़ी शाम औंधी
सितारों भरी रात आयी झिझकती

--गौतम राजरिशी

8 जून 2009

८- धरा से उगती उष्मा

धरा से उगती ऊष्मा, तड़पती देह के मेले
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो

यहाँ उपभोग से ज़्यादा प्रदर्शन पे यकीं क्यों है
तटों को मिटा देने का तुम्हारा आचरण क्यों है
तड़पती मीन- तड़पन को अपना कल समझ लो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो

मुझे तुम माँ भी कहते निपूती भी बनाते हो
मेरे पुत्रों की ह्त्या कर वहां बिल्डिंग उगाते हो
मुझे माँ मत कहो या फिर वनों को उनका हक दो
दरकती भू ने समझाया, ज़रा अब तो सबक लो

रचनाकार ने अपनी रचना कुछ संशोधन के साथ पुनः प्रस्तुत की है। नया स्वरूप इस प्रकार है-

धरा से ऊगती उष्मा,
तड़पती देह के मेले
दरकती भू ने समझाया,
ज़रा अब तो सबक ले ले

तू मुझको माँ भी कहता है
निपूती भी बनाता है
मेरे पुत्रों का वध कर-के
भवनों को उगाता है
न कह तू माँ मुझे या
फिर वनों को उनका हक दे दे
मुझे माँ ने है समझाया
ज़रा अब तो सबक ले ले

मुझे तुझसे कोई शिकवा नहीं
न कोई अदावत भी
तेरे ही आचरण में जाने
क्यों पलती बगावत सी
मेघ तुझसे रूठें हैं ,
इसी से तू समझ ले ले
दरकती भू ने समझाया,
ज़रा अब तो सबक ले ले

--गिरीश बिल्लौरे मुकुल

७- पत्तों से पेड़ों के

पत्तों से पेड़ों के
आतीं छनकर किरणें
आग सी बरसती है
मानव की बात दूर,
पौधे कुम्हलाते हैं।

चलती है गरम हवा
लू लगने के डर से
घर में छिप जाते हैं
धूप से पराजित हो
तड़प-तड़प जाते हैं

रुकने की आस लिए
बढते जाते पथिक
छाँव कहीं आगे है
जलते हैं पैर भले
चलते ही जाते हैं

नीम तले खटिया पर
सोने सी दोपहरी
लेटकर बिताते हैं
चाँदी-सी रातों में
थककर सो जाते हैं

--हरि शर्मा

6 जून 2009

६- उफ ये कैसे

उफ ये कैसे, गर्मी के दिन

सुबह की
शीतल भोर सुहानी
रातों की वो मधुर चाँदनी
शाम ढले गाँवों
में फैली
धूल-कणों की उड़ती लाली
गर्मी भर
न ये दिख पातीं
कटती रातें
तारों को गिन
उफ ये कैसे गर्मी के दिन

शीतल
छाया भाती सबको
दिन में धूप सताती सबको
जीव जगत व्याकुल
हो जाता
तरस नहीं क्यों? आता रब को
श्रमिकों का
बाहर श्रम करना
हो जाता है
बड़ा कठिन
उफ ये कैसे गर्मी के दिन

आग
उगलता है सूरज जब
खो जाती है हरियाली सब
कूप-सरोवर के
जल-स्तर
दूर, न जाने हो जाते कब
वन-
उपवन गर रहे उजड़ते
सब खुशियाँ
जायेंगी छिन
उफ ये कैसे गर्मी के दिन

--विजय तिवारी 'किसलय'

5 जून 2009

५- अनचाहे पाहुन

अनचाहे पाहुन से
गर्मी के दिन।

व्याकुल मन घूम रहा-
बौराये-
बौराये
सन्नाटा पसरा है-
चौराहे
-चौराहे

चुभो रही धूप यहाँ,
तन मन में पिन।
गर्मी से अकुलाये,
गर्मी के दिन।

छाया को तरसे खुद,
जेठ की दुपहरी है।
हवा हुई सत्ता सी,
गूँगी औ॔' बहरी है।

कैसे अब वक़्त कटे,
अपनों के बिन।
आख़िर क्यों आये ये,
गर्मी के दिन।

वोटों के सौदागर,
दूर हुए मंचों से।
जनता को मुक्ति मिली,
तथाकथित पंचों से।

आँखों में तैर रहे,
सपने अनगिन।
गंध नयी ले आये,
गर्मी के दिन।
--संजीव गौतम
(मूल शीर्षक बदलने के लिए क्षमायाचना, ऐसा करना पड़ा क्यों कि एक गीत पहले ही गर्मी के दिन शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है)

४- फूल सेमल के

लो आई गर्मियाँ
बिछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ।

सुर्ख, कोमल, लाल पखुरियाँ
लिए रहती,
अनेकों तान छत वाली
बहुत ऊँची,
गगन छूती
डालियाँ
खिल उठी हैं
हो के मतवाली।

छा गई मैदान पर,
रक्तिम छटाएँ
चलो नंगे पाँव तो,
वे गुदगुदाएँ

खदबदाती सी खड़ी
वे पीर लगती है,
खुशी के पल भरा पूरा
नीड़ लगती हैं।
ग्रीष्म भर उड़ती रहेगीं रेशे ..रेशे
जो कभी विचलित,
कभी प्रतिकूल लगती है।

बिछ गयें हैं शूल,
तन...मन के
लो आई गर्मियाँ।
बिछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ।

--कमलेश कुमार दीवान

नोटः यह गीत ग्रीष्म ऋतु मे सेमल के पेड़ के फूलने फलने और बीजों को लेकर उड़ते सफेद कोमल रेशों के द्श्य परिस्थितियों पर लिखा गया है ।

4 जून 2009

३- गर्मी के दिन

कुछ अलसाये
कुछ कुम्हलाये
आम्रगन्ध भीजे, बौराये
काटे ना
कटते ये पल छिन
निठुर बड़े हैं गर्मी के दिन

धूप-छाँव
अँगना में खेलें
कोमल कलियाँ पावक झेलें
उन्नींदी
अँखियां विहगों की
पात-पात में झपकी ले लें
रात बिताई
घड़ियां गिन-गिन
बीतें ना कुन्दन से ये दिन

मुर्झाया
धरती का आनन
झुलस गये वन उपवन कानन
क्षीण हुई
नदिया की धारा
लहर- लहर
में उठता क्रन्दन
कब लौटेगा बैरी सावन
अगन लगायें गर्मी के दिन।

सुलग- सुलग
अधरों से झरतीं
विरहन के गीतों की कड़ियाँ
तारों से पूछें दो नयना
रूठ गई
क्यों नींद की परियाँ
भरी दोपहरी
सिहरे तन-मन
विरहन की पीड़ा से ये दिन

--शशि पाधा

3 जून 2009

२- याद करें हम

याद करें हम गर्मी के दिन

दुपहर सूनी
धूप की चादर
धरती व्याकुल प्यासा सागर
पुरवा संग पत्तों की झिन झिन
याद करें हम गर्मी के दिन

घना कनेरा
गर्मी भूले
शाम चमेली आँगन झूले
सूने साँझ सकारे तुम बिन
याद करें हम गर्मी के दिन

खुशबू महके
धरती सारी
सुबह ओस की ठंडक प्यारी
ऋतु मनमोहक खुशियाँ अनगिन
याद करें हम गर्मी के दिन

--संध्या

1 जून 2009

१- मालवा की रातें मालवा के दिन

मालवा की रातें
मालवा के दिन
याद है अभी भी
गर्मी के दिन

जाता था अपनी नानी के घर
खेलता था अपने भाईयों के संग
दिन भर नहाता था कुएँ पे मैं
बावला सा घूमता था नंग-धड़ंग
याद है वो बाल्टियाँ
जो खींची गिन-गिन

दो या तीन नहीं बच्चे थे वहाँ
बच्चे थे पूरे दस-बारह वहाँ
बेर से ले कर तरबूज-ककड़ी तक
हर चीज की होती थी पांती वहाँ
याद है वो कुल्फ़िया
जो खाई गिन-गिन

सोते थे ठंडे पतरों पर
जगते थे मोर की तानों पर
पी के कड़वे नीम का रस
खाते थे मिश्री मुट्ठी भर-भर
याद है अभी भी
वो प्यारे पल-छिन
--राहुल उपाध्याय