4 मार्च 2010

१८- सखी बसंत आया : मानसी


सखी बसंत आया

कोयल की कूक तान
व्याकुल से हुए प्राण
बैरन भई नींद आज
साजन संग भाया
सखी बसंत आया

लागी प्रीत अंग-अंग
टेसू फूले लाल रंग
बिखरी महुआ की गंध
हवा में मद छाया
सखी बसंत आया

पाँव थिरके देह डोले
सरसों की बाली झूमे
धवल धूप आज छिटके
जगत सोन नहाया
सखी बसंत आया

अमुवा की डारी डारी
पवन संग खेल हारी
उड़े गुलाल रंग मारी
सुख आनंद लाया
सखी बसंत आया

--
मानसी

13 टिप्‍पणियां:

  1. कोयल की कूक तान
    व्याकुल से हुए प्राण
    बैरन भई नींद आज
    हवा में मद छाया
    सखी बसंत आया

    बासंती अनुराग का मधुर-मदिर गीत. मन भाया.

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  3. सुन्दर रचना बहुत बहुत बधाई, धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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  4. मानसी के मनस में
    डेरा जमाया...
    शब्द काम्या कामिनी ने
    अर्थ शाश्वत कंत पाया.
    बाग़ में भाषा के
    बनकर छंद खुद ऋतुराज आया.
    मानसी के मनस में
    डेरा जमाया...

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  5. पाँव थिरके देह डोले
    सरसों की बाली झूमे
    धवल धूप आज छिटके
    जगत सोन नहाया
    सखी बसंत आया

    अमुवा की डारी डारी
    पवन संग खेल हारी
    उड़े गुलाल रंग मारी
    सुख आनंद लाया
    सखी बसंत आया
    khulke rang udele koee
    prem pacheesee khe koee
    tera roop salona saajan
    mere man pe chhaayaa
    sakhee vasant aayaa

    badheeho is prernaapoorn anubhuti ke lie

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  6. पलाश की रक्तिमा
    टेसू के पीले फूल
    भिगोया बनाया
    बासंती रंग
    खेलो होली संग
    हवा में मद छाया
    सखी बसंत आया

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  7. सभी का बहुत बहुत शुक्रिया, इस गीत को पसंद करने का।

    --मानोशी

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  8. अमुवा की डारी डारी
    पवन संग खेल हारी
    उड़े गुलाल रंग मारी
    सुख आनंद लाया
    सखी बसंत आया


    sundar bhaav....

    aabhar...maansee jee....badhaaee....

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  9. रचना पूर्ण तरह से बसंत वर्णन कर रही है |
    इस गीत के लिए बधाई |


    अवनीश

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  10. वासंती रंग में रंगी मधुर रचना के लिये बधाई एवं धन्यवाद ।
    शशि पाधा

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