7 मार्च 2010

२०-ठहरो ज़रा सँवरने दो : निर्मला जोशी

ठहरो ज़रा सँवरने दो
फिर जी भर कर
निरख लेना
बाँधूगी आँचल में मधुवन
मधु ॠतु को मुक्त लहरने दो
ठहरो ज़रा सँवरने दो

यौवन के महके
मोहक क्षण
तन में मन में जग में पग में
रंग गंध घुल जाने तक
फागुन को
आज मचलने दो
होली के रंग
भिगोएँ तो
फिर जी भर कर
महक लेना
आजूंगी आखों में काजल
अलकें पलकों तक गिरने दो
ठहरो ज़रा सँवरने दो

यह फागुन है
घुल जाने दो
तन में मन में, मुझ में तुम में
रेशम रेशम हो जाने तक
सांसों को आज
मचलने दो
बाँहों में भर
तो लो अनंग
फिर जी भर कर
बहक लेना
बाचूँगी मौसम की पाती¸
रंगों में रंग निखरने दो
ठहरो ज़रा सँवरने दो

--
निर्मला जोशी

8 टिप्‍पणियां:

  1. इस नवगीत में
    बहुत अच्छे छंद की
    रचना की गई है
    और बहुत अच्छे ढंग से
    इसे सँवारा गया है!

    --
    कुछ बिंब तो बहुत मोहक हैं, जैसे --
    --
    मधु ॠतु को मुक्त लहरने दो!
    अलकें पलकों तक गिरने दो!
    यह फागुन है
    घुल जाने दो
    तन में मन में, मुझ में तुम में
    रेशम-रेशम हो जाने तक
    साँसों को आज
    मचलने दो!

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  2. सुन्दर गीत के लिए निर्मला जी को बहुत बहुत बधाई, धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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  3. बाचूँगी मौसम की पाती¸
    रंगों में रंग निखरने दो
    ठहरो ज़रा सँवरने दो

    सुंदर.....


    बधाई
    निर्मला जी...

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  4. Nirmalaji apke "thahro jara sanvarne do" me jo gati v bahav hai vah chahkar bhee kisi ko thaharne nahee deta. agar mai jhooth hun to koi to samne aae jo in panktiyon ko padhkar thahar jaae
    यौवन के महके
    मोहक क्षण
    तन में मन में जग में पग में
    रंग गंध घुल जाने तक
    फागुन को
    आज मचलने दो
    होली के रंग
    भिगोएँ तो
    फिर जी भर कर
    महक लेना
    आजूंगी आखों में काजल
    अलकें पलकों तक गिरने दो
    ठहरो ज़रा सँवरने दो

    उत्तर देंहटाएं
  5. यह फागुन है
    घुल जाने दो
    तन में मन में, मुझ में तुम में
    रेशम रेशम हो जाने तक


    very nice.

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  6. बाँधूगी आँचल में मधुवन
    मधु ॠतु को मुक्त लहरने दो
    ठहरो ज़रा सँवरने दो
    अत्यन्त सुन्दर निर्मल जी, इस नवगीत ने वसन्त को और संवार दिया । धन्यवाद तथा बधाई ।
    सादर,
    शशि पाधा

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  7. ठहरो ज़रा सँवरने दो
    फिर जी भर कर
    निरख लेना

    तन में मन में जग में पग में
    रंग गंध घुल जाने तक
    फागुन को
    आज मचलने दो

    बाचूँगी मौसम की पाती¸
    रंगों में रंग निखरने दो
    ठहरो ज़रा सँवरने दो

    - सुंदर

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  8. वाह! वाह! नवगीत की ठसक, भाषिक माधुर्य, शाब्दिक सरलता, भाव-संचरण, छांदस प्रवाह सभी ने आनंदित कर दिया. नमन.

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