25 दिसंबर 2010

१२. अपनों की रखवाली

अपनों की
रखवाली करते-करते उम्र तमाम हुई
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई

मन के
सुमन चहकने में है,
अभी बहुत है देर पड़ी
गुलशन
महकाने को कलियाँ
कोसों-मीलों दूर खड़ीं
पवन-बसन्ती
दरवाजों में
आने में नाकाम हुई

पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई

चाल-ढाल
है वही पुरानी,
हम तो उसी हाल में हैं,
जैसे गये
साल में थे
वैसे ही नये साल में हैं

गुमनामी
के अंधियारों में
खुशहाली परवान हुई

पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई

-- डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

7 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है...बहुत ही सुंदर...नये साल की बधाईया......

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  2. चाल-ढाल
    है वही पुरानी,
    हम तो उसी हाल में हैं,
    जैसे गये
    साल में थे
    वैसे ही नये साल में हैं

    यथार्थ... बस समय बदलता है हालात नहीं...

    अच्छी रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  3. चाल-ढाल
    है वही पुरानी,
    हम तो उसी हाल में हैं,
    जैसे गये
    साल में थे
    वैसे ही नये साल में हैं
    sach likha vese hi hain bas ab nai tarikh likhenge
    bahut sunder likha hai
    badhai
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  4. गुमनामी
    के अंधियारों में
    खुशहाली परवान हुई

    पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
    और शाम हई |




    यही है जीवन का संगीत ..

    .बहुत सुंदर रचना मयंक जी..


    आभार और
    ढेर सारी बधाई आपको....


    शुभ कामनाएँ...
    गीता पंडित

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