12 अगस्त 2011

६. किससे करें गिला

भीड़ भरी इस
नीरवता का
किससे करें गिला

पीपल, बरगद, नीम
छोड़कर कहाँ चले आये
कैसे कहें
यहाँ पग-पग पर
ज़ख्म बहुत खाये
जो आया
हो गया यहीं का
वापस जा न सका
चुग्गे की
जुगाड़ में पंछी
खुलकर गा न सका
साँसों वाली
मिली मशीने
इंसां नहीं मिला

इस मेले में
सभी अकेले
कैसा ये संयोग
जितना ऊँचा
कद दिखता है
उतने छोटे लोग
किसको फुरसत यहाँ
कि जाने, उसका कौन पड़ोसी
मन में ज्वार
छिपा रहता है
होठों पर खामोशी
रहे बदलते
राजा रानी
बदला नहीं किला

अपनी अपनी
नाव खे रहे
सब नाविक ठहरे
कोई नहीं
किसी की सुनता
सबके सब बहरे
बूढ़े बरगद की
दाढ़ी का
कहाँ ठिकाना है
गौरैया का
नहीं यहाँ अब
आना जाना है
गमलों में भी
कहीं भला कब,
कोई कमल खिला

-डा० जगदीश व्योम
(नई दिल्ली)

22 टिप्‍पणियां:

  1. भाई डॉ० जगदीश व्योम जी अद्भुत नवगीत के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं |

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  2. भाई जगदीश व्योम का यह गीत एक मुकम्मिल नवगीत है - इसके मुखड़े में और बाद की सभी पदांत पंक्तियों में जिस खूबी से फ़िलवक्त के महानगरीय खोखलेपन का आकलन हुआ है, वह स्तुत्य है|अंतिम पदांत तो, सच में, अनूठा बन पड़ा है|
    मेरा हार्दिक साधुवाद व्योमजी को इस श्रेष्ठ नवगीत के लिए|
    कुमार रवीन्द्र

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  3. डॉ जगदीश व्योम जी का यह नवगीत हर दृष्टि से उत्तम नवगीत है। बहुत बधाई उन्हें इस शानदार नवगीत के लिए।

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  4. उत्तम द्विवेदी12 अगस्त 2011 को 12:11 pm

    सरल शब्दावली, शैली में सहजता, कत्थ्य में गहराई व नवता लिए एक गतिशील नवगीत के लिए व्यास जी को बधाई व धन्यवाद !
    बूढ़े बरगद की
    दाढ़ी का
    कहाँ ठिकाना है
    ---- अतिसुन्दर!

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  5. एक पूर्ण परिपक्व नवगीत के लिये डा० व्योम को वधाई।

    गमलों में भी कहीं भला
    कब कोई कमल खिला ?
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं।

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  6. तुषार जी ! मेरे नवगीत पर टिप्पणी लिखने के लिये आभार ।

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  7. भीड़ भरी इस
    नीरवता का
    किससे करें गिला
    व्योम जी के नवगीत का एक एक अन्तरा बोलता हुआ है। शुरुआत से ही मज़ा आ गया। भीड़ में नीरवता ? दोनों विरोधाभाषी हैं, भीड़ में नीरवता कहाँ होती है..... वहाँ तो कोलाहल होता है..... पर नवगीत यहीं से उठता है आपसी सम्प्रेषण कहाँ है महानगर में..... वहाँ तो भीड़ है और सिर्फ भीड़..... महानगर की समूची त्रासदी को इन पंक्तियों में समेट लिया है.... बहुत बहुत वधाई व्योम जी ।

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  8. चुग्गे की
    जुगाड़ में पंछी
    खुलकर गा न सका
    साँसों वाली
    मिली मशीने
    इंसां नहीं मिला
    ............... हरेक के मन की पीड़ा ...बहुत सुंदर नवगीत ...बधाई व्योम सर..

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  9. कुमार रवीन्द्र जी, धर्मेन्द्र कुमार सज्जन जी, उत्तम द्विवेदी जी, अश्वघोष जी, गीता पंडित जी, शलभ जी, आचार्य संजीव वर्मा जी नवगीत पर सारगर्भित टिप्पणी लिखने के लिए हार्दिक आभार। उन सभी का भी आभार जो अपने कीमती समय में से कुछ क्षण निकाल कर पाठशाला पर नियमित आ रहे हैं और अपनी टिप्पणियों से नवगीतकारों के सृजन की सराहना कर रहे हैं।

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  10. Adarniy Jagdish Ji,
    Na jaane kitani baar parha hai yeh navgeet our har baar sukhad anubhuti hui.
    Bahut dhnyvaad apka .

    saadar,

    Shashi Padha

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  11. शशि जी आपने इतनी आत्मीयता से टिप्पणी लिखी है कि मुझे पूरा विश्वास है कि नवगीत ने आपको गहराई से कहीं न कहीं छुआ है। दरअसल इसे बहुत ईमानदार टिप्पणी भी कह सकते हैं। आपकी टिप्पणी से मेरा श्रम सार्थक हुआ, आभार आपका।

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  12. डा. व्योम, बहुत अच्छा लगा यह नवगीत पढ़कर। एकदम सटीक और सच्चाई से भरा हुआ। शहर की भागदौड़ और जीवन शैली का बहुत खूबसूरती से एक चित्र खींच दिया आपने। आपको बधाई

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  13. बहुत सुन्दर शुरुआत
    "भीड़ भरी इस
    नीरवता का
    किससे करें गिला"

    महानगर में भीड़ तो है अपनापन नहीं, लेकिन आप ने बहुत सच कहा है कि आखिर इसका गिला शिकवा करें भी तो किससे ? और क्यों ? बहुत अच्छा और परिपक्व नवगीत के लिये वधाई।

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  14. अर्बुदा जी नवगीत पर टिप्पणी के लिये आभार

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  15. Dr.Vyom ji ka yeh navgeet aaj ki vastvikata ko parilakshit karta he. BAHUT KHOOB.
    TRILOK SINGH THAKURELA

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  16. गमलों में भी कहीं भला
    कब कोई कमल खिला ?
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं।
    हुत सुंदर नवगीत बधाई
    rachana

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  17. जितना ऊँचा कद दिखता है उतने छोटे लोग..
    किसको फुर्सत यहाँ की जाने उसका कौन पडौसी ..

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  18. इस मेले में
    सभी अकेले
    कैसा ये संयोग
    जितना ऊँचा
    कद दिखता है
    उतने छोटे लोग
    किसको फुरसत यहाँ
    कि जाने, उसका कौन पड़ोसी
    मन में ज्वार
    छिपा रहता है
    होठों पर खामोशी
    रहे बदलते
    राजा रानी
    बदला नहीं किला

    ऐसे मार्गदर्शक नलगीतों का हम हमेशा आभारी रहेंगे

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