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2 अक्टूबर 2012

२३. ये कैसी ऊँचाई

इतने ऊंचे उड़े गगन में
पंख कटे सिसकायें
मन की खूंटी टंगे हुए हैं
किसको ये दिखलायें



धमनी-धमनी बिखर गये हम
नस-नस में विष फैले
प्रीत मांगती
भिक्षा डोले
मीरा से मन दहले

सात-समंदर पार बस गये
बँगला पैसा गाड़ी
घर की ड्योढ़ी
रस्ता देखे
कटी हुई हैं नाड़ी

बिना पलस्तर दीवारों में
मन कैसे हुलसायें



लैपटॉप में सिमट रह गया
जन-मानस का प्यार
सूनी अँखियाँ
बेवा जैसे
भूल चलीं त्यौहार

हास खो गया मान खो गया
राख हुई नैतिकता
चिंगारी हर
पल सुलगाये
कहाँ गई मौलिकता

किसको देखें किसे दिखाएँ
खुद मन को बहलायें



वृद्धाश्रम खुल गये कि देखो
अपने हुए बिराने
बूढ़ी अँखियाँ
खोज रही हैं
किसको अपना माने

ये कैसी ऊँचाई जिसने
मन-तन को है बाँटा
ममता बिलख
रही है मन में
अंतर पर है चाँटा

प्रेम बिना निस्सार है जीवन
किसको ये सिखलाएँ


गीता पंडित
दिल्ली

1 अक्टूबर 2012

२२. बड़ी उदासी थी कल मन में

बडी़ उदासी थी कल मन में
क्यूँ घर हमने छोड़ दिया ।

रीति कौन बताये मुझको
संध्या गीत सुनाये मुझको
कौन पर्व है ,कौन तिथि पर
इतना याद दिलाये मुझको
गाँव की छोटी पगडंडी को
हाई वे से जोड़ दिया

दीवाली पर शोर बहुत था
दीप उजाला कम करते थे
होली भी कुछ बेरंगी थी
मिलने से भी हम डरते थे
सजा अल्पना कुछ रंगों से
बिटिया ने फिर जोड़ दिया

राजमहल हैं लकदक झूले
तीज के मेले हम कब भूले
सावन राखी मन ही भीगा
भीड़ बहुत पर रहे अकेले
कैसे जाल निराशा का फिर
'अन्तर्जाल 'ने तोड़ दिया

बडी़ उदासी थी कल मन में
क्यूँ घर हमने छोड़ दिया ।

ज्योत्सना शर्मा
बिजनौर

30 सितंबर 2012

२१. क्यों हमने घर छोड़ा था

क्यों हमने घर छोड़ा था ?

सुख चादर
में छेद मिले
लहरों लहरों भेद मिले
जेब भरी
मन खाली था
जीवन बना रुदाली था
फिर भी नाता जोड़ा था
क्यों हमने घर छोड़ा था ?

घर में
खुशिया चलती थी
ताख उम्मीदें पलती थी
माथे
अगर पसीना हो
अम्मा पंखा झलती थी
जो था क्या वो थोडा था ?
क्यों हमने घर छोड़ा था ?

सावन
आँगन उतरे
वसंत किवाड़ सजाये
शाम ,
सिंदूरी धूप से
आकर घर रंग जाये
इस दृश्य से मुँह मोड़ा था
क्यों हमने घर छोड़ा था ?

रचना श्रीवास्तव
यू.एस.ए.

२०. क्या घरौंदे कम बड़े थे


मंजिलों के अक्स धुंधले
पाँव नन्हे पथ कड़े थे

इन्द्रधनुष भी था हमारा
और सारी तितलियाँ
समय नदी की रेत से
सृष्टी करती उंगलियाँ

कंक्रीट के जंगलों से
क्या घरोंदे कम बड़े थे

वो महकता माँ का आँचल
गुड़ की डल्ली सिर का काजल
नेह के आँगन ये रीते
और गुम वो जादुई पल

चन्द्र खिलोने के लिए जब
कन्हैय्या जिद पर अड़े थे

ऊँचाइयों के तंग शिखर हैं
काफिले को छोड़ आये
झूठ की तलवार थामी
सच की उंगली छोड़ आये

जीत ली है कितनी दुनिया
खुद से लेकिन कब लड़े थे

आज मुठ्ठी में गगन है
चाहे लहराता चमन है
प्रश्न करते पंख जलते
आबोहवा है या अगन है

सोच में है मन का पंछी
आज हैं या कल बड़े थे?

-परमेश्वर फुँकवाल
लखनऊ

28 सितंबर 2012

१९. उपलब्धियों के गाँव

भोर से ही युग बटोही
ढूँढ़ता है छाँव
धूप गोरी ...!
कहाँ तेरा गाँव

स्वर्ण वर्षी मेघ
हिम संवेदना
कनक अवनी किन्तु
कुत्सित चेतना
प्रगति की प्रचीर पर
कनक मद में पाँव

गगनचुम्बी तुंग से
नील नभ में छेद
यन्त्रचालित युग निहारे
मनुज मन के भेद
शुष्क अंतस झील तट
कैसा बसाया ठाँव

मनुजता को त्याग
वैभव राह पर निकले
प्रकृति को भी छेड़
प्राय: पाँव ही फिसले
भयातुर हो विहग सारे
ढूँढ़ते वट छाँव
उपलब्धियों के गाँव

धूप गोरी ...!
कहाँ तेरा गाँव

-श्रीकान्त मिश्र कान्त
कोलकाता

27 सितंबर 2012

१८. मन सुगना क्यों मौन स्वरों में करता क्रंदन


जीवन थाली में रखे हैं
सुख सुविधा के छप्पन व्यंजन
मन सुगना क्यों
मौन स्वरों में करता क्रंदन

फटी बिवाई
तन पर एक कौपीन सलूका
बारहमासे
कभी तीज त्यौहार
पूरियाँ खा इतराते दिन
इनके उनके सुख दुःख सबके
छप्पर से समवेत करों में
भार उठाते दिन

आवाजाही में कब टूटे
अपनेपन के बंधन

शहरी रंगमहल उछ्रंखल
राजनर्तकी तृष्णा
पूँजी प्याले में उंड़ेलती
अहंकार की हाला
क्या राजा क्या मंत्री चाकर
यहाँ टुन्न दो घूँट चढ़ाकर
नैतिकता की चींटी रौंदे
धन बल गज मतवाला

रूठा काकी के पैरों से
नत अभिनन्दन

आज हथेली में चंदा
पगथलियों में जग
नाप सके न मगर
पड़ोसी घर की दूरी दो पग
दो कमरे के बया घोंसले
अधिवासी सन्नाटे के खग
ऑफिस के टेबल पर उतरे
मोरपंखिया शाम
और बैठक में नभ नग

शायद ज़्यादा ही खोया कम पाया
कहता ये मन

रामशंकर वर्मा
लखनऊ

26 सितंबर 2012

१७. जिंदगी नचा रही


दौडती जा रही भागती जा रही
जिंदगी हाथ से छूटती जा रही


छूट गए खेत गाँव
टिके नहीं कहीं पाँव
ढूँढते ही रह गए
तोष में विलीन छाँव
हठी-नटी तृषा मृगी
कितना नचा रही


अनबुझी प्यास के
हाट का उधार है
सूद रोज बढ़ रहा
आर है न पार है
चैन की हवाओं को
भूलती जा रही


समय नहीं पोंछ ले
रुक के कोई आँख नम
हाथ थाम चल पड़े
रुक रहे जो साँस-दम
बाँट ले संवेदना जो,
हाथ छोड़ जा रही


ठहर जरा देख ले
चाँद डूबते हुए
और आसमान पर
सूर्य जूझते हुए
झील की तरंग में
चाँदनी नहा रही
तू क्यों ना देख पा रही ?

-शशि पाधा
यू.एस.ए

25 सितंबर 2012

१६. उड़ रहे हैं दूर तक


उड़ रहे हैं दूर तक,
पर खो गईं उनकी ज़मीने

नींद लिपटे
बादलों की करवटों से
झाँकता तो है वो सूरज सलवटों से
पर नज़र से भोलापन
छीना किसी ने

उड़ रहे हैं दूर तक,
पर खो गईं उनकी ज़मीने

घुल गए हैं
श्वास में बाज़ार अब
आँखें भी सच देख कर बेज़ार अब
बिक रहे जज़्बात जो
बेचे हमी ने

उड़ रहे हैं दूर तक,
पर खो गईं उनकी ज़मीने

-सुवर्णा
छिंदवाड़ा

24 सितंबर 2012

१५. आसमान के पार स्वर्ग है

आसमान के पार स्वर्ग है
सोच चला घर से
जाकर देखा वहाँ अँधेरा दीपक को तरसे

पर्वत पर चढ़ने को माटी का आँचल छोड़ा
हरियाली ने धीरे धीरे मुझसे मुँह मोड़ा
थोड़ा और चढ़ा ऊपर तो
मिले बर्फ़ के दिल
आसमान छूने का लेकिन
नशा बड़ा कातिल
इससे ऊपर प्रेम-मेघ से भी हिम ही बरसे

जीवन का पौधा उगता हिमरेखा के नीचे
धार प्रेम की जहाँ नदी बन धरती को सींचे
आसमान से आम आदमी
लगता है चींटी
नभ केवल रंगीन भरम है
सच्चाई मिट्टी
गिर जाता जो अंबर से वो मरता है डर से

अंबर तक यदि जाना है तो चिड़िया बन जाओ
दिन भर नभ की सैर करो पर संध्या घर आओ
आसमान पर कहाँ बसा है
कभी किसी का घर
ज्यादा जोर लगाया जिसने
टूटे उसके पर
फैलो, काम नहीं चलता ऊँचा उठने भर से

-धर्मेन्द्र सिंह सज्जन
बिलासपुर

22 सितंबर 2012

१४. भीड़ में गुम हो गया

आज फिर
कोई शहर की भीड़ मे
गुम हो गया

सिमट गई चौपाल
उदास है पीपल बरगद
लील रही विस्तार गाँव का
शहरों की हद
सोचते हैं
कौन सूनापन यहाँ पर
बो गया

ताल-तलैया पेड़
और घर पनघट कूआँ
अमराई में बिन सखियोँ के
झूला सूना
कौन चितेरा
इन चित्रों से रंग उड़ाकर
खो गया

चुपचुप हैँ बैलोँ के घुंघरु
खोई है रुनझुन
जन उत्सव से लुप्त हुई
शहनाई की धुन
लोकगीत की
मधुर तान को सुने इक दशक
हो गया

- सुरेन्द्रपाल वैद्य

21 सितंबर 2012

१३. जब से मन की नाव चली

जब से मन की नाव चली, अँगना छूटा
घर गलियाँ भी

पनघट कहाँ,
कहाँ अठखेली, जमघट से बाजार पटे
बटवृक्षों की थाती इतनी, रिश्तों के भ्रमजाल हटे
जब से मन के बाँध बँधे मधुबन छूटा
रँगरलियाँ भी

झगड़े टंटे,
आपाधापी, जैसे पैरों फटी बिवाई
मकड़जाल में फँसी उमरिया, सुख पहुँचा, आँखें पथराई
जब से मन की पीर घटी कसबल छूटा
खलबलियाँ भी

चंदनवन दिन,
केसर रातें, मधुकोष भरी ॠतुएँ देखीं
घर का ना नेह घटा किंचित, बस उमर सदा घटते देखीं
जब से मन आकाश हुआ कथना छूटा,
कनबतियाँ भी

सतरंगी सपने
चाहत के, घर से दूर भगा लाये
सागर ने फैलाई बाहें, मुड़कर क़दम न जा पाये
जब से मन की आँख खुली कल युग छूटा,
अब सदियाँ भी

आकुल
कोटा

20 सितंबर 2012

१२. स्वप्न हुए साकार


स्वप्न हुये साकार
मगर सब अपने रूठ चले
जीवन भर आपाधापी के
क्या परिणाम मिले ?

प्यास बुझाने के खातिर
खोदा तालाब कुआँ
श्रम संयम का पाठ पढ़ा
नित बंदरबाँट हुआ
घिसते रहे रात-दिन चप्पल
तब सुख प्राप्त हु,

स्वर्ण मछलियाँ चाप रहे
कुछ संन्यासी बगुले

सदा समझते रहे सभी
गाजर मूली भाँटा,
कभी किसी से मिली गालियाँ
कभी मिला चाँटा,
हाथो हाथ लिया कुछ ने तो
कभी गया डाँटा,

सुख-दुःख जीते रहे
त्याग कर शिकवे और गिले

-अनिल कुमार वर्मा
लखनऊ

११. वृक्ष लगे फलदार

ठहरे हुए पानी का
मीलों विस्तार
बर्फ सा जमा हुआ
पिछला संसार

आचमन की दौड़ में
फिरता रहा
लोग कहते आदमी है
सिरफिरा
रख लिए बटोरकर
अनसुलझे रिश्ते
गूँजते गली गली
अनकहे किस्से

मन की नदी का
गीला है उद्गम
फँस गई सुख की
नाव मझधार

संघर्षों के बाद सुनी
सुख की पदचापें
छत पर लेटकर
अपने को नापें
बैठ शिखर सोचते
जीवन हुआ हवन
आदमी होने का
पाले रहे भरम

पहले पन्ने पर छपते
सहलाते सम्मान
जहरीले सपनों में
वृक्ष लगे फलदार

--ज्योति खरे
कटनी

19 सितंबर 2012

१०. यंत्र युग की भटकनों में

कटे अपने आप से हम
छिपकली की
पूँछ-से

कल शून्य में तैरे रहे
ध्रुव, चाँद पर भी चढ़ गए
तिल थे कभी पर कीमती
अब ताड़ से हैं बढ़ गए
हो गए निष्प्रभ निरर्थक
आज नकली
मूँछ से

गर्द हमने झाड़ ली है
तोड़ कर सब मकड़जाले
द्वार पर की रोशनी है
बुझा भीतर के उजाले
घाव कर बैठे स्वयं पर
हम अहं की
बूच से

संचयित युग-संस्कारों
की बडी गाढ़ी कमाई
यंत्र-युग की भटकनो में
आत्मा हमने गँवाई
ढुल गया सत नालियों में
रह गए हम
छूँछ-से

-शशिकांत गीते
खंडवा

९. उच्चाकांक्षा की चमक में



खिलखिलाती
सिसकियों का हर तरफ ही शोर है
भीड़ में तन्हाइयों की भीड़
चारों ओर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

छू रहा
मानव सफलता के चमकते नव शिखर
प्रकृत नियमों को विकृत करता ये कैसा है सफर
है सभी कुछ पर अधूरी,
हर निशा हर भोर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

कितनी परतों
में दबा है आज का ये आदमी
अब कहाँ किरदार सच्चे अनृत की है तह जमी
स्वार्थ आरी नेह बंधन,
कर रहीं कमज़ोर हैं

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

है धुआँ
आँखों में रिश्तों की सुलगती आह का
टूटते अनुबंधों का और टिमटिमाती चाह का
उच्चाकांक्षा की चमक में,
तिमिर ही घनघोर है

ये कहाँ हैं हम ?
क्या यही थे हम ?

सीमा अग्रवाल
कोरबा, छत्तीसगढ़

17 सितंबर 2012

८. उपलब्धियों का दंश

टूट गयी सुख चैन की माला
बिखर गए फुरसत के मोती
यश वैभव की लहर चली तो
मंद हुई
रिश्तों की ज्योति

छूट गया है प्रथम पहर में
पत्तों पर वो ओस ढूँढना
गहरी साँसे ,आँख मींच कर
कोई ताज़ा फूल सूंघना
आँगन की बरखा भी अब तो
हथेलियों को
नहीं भिगोती

चकाचौंध की दीवारों ने
जज्बातों की हवा रोक ली
ढकी हुई है मन की गागर
धडकन सूनी श्वास खोखली
चेहरे पर ख्याति की परतें
आखिर इक
दिन आँखें धोतीं

गणित हो गया जीवन पूरा
हर लम्हा कागज़ में अंकित
भरी सितारों से झोली पर
धरती की मिट्टी से वंचित
तमगे दे कर भीड़ हमेशा
तन्हाई की
फसलें बोती

--संध्या सिंह
लखनऊ

16 सितंबर 2012

७. चारों ओर रोशनी

चारों ओर रोशनी,
फिर भी,भीतर बहुत अँधेरा है
ऊँचे टीले पर बैठा
मन पंछी बहुत
अकेला है !

धूल, धुआँ,
धूप के साए
कंकरीट से रिश्ते पाए
हवा विरोधी, आपाधापी
छाया में भी, तन जल जाए
क्या पाना था? क्या पाया है ?
ख़ुद को कहाँ,
ढकेला है

प्लेटफ़ॉर्म पर
खड़े रह गए,
छूट गईं सब रेलगाड़ियाँ
भोलापन खा गई तरक्की
सीख गए हम कलाबाज़ियाँ
बजा सीटियाँ, समय ने जाने
खेल कौन-सा
खेला है?

डॉ .भावना तिवारी
कानपुर

६. पूँछें उपलब्धियाँ हुईं

प्रहर, दिवस, मास, वर्ष बीते
जीवन का
कालकूट पीते

पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
खेलते हुए साँप-सीढी
मन्त्रित, निस्तब्ध सो गयी
युद्ध - भूमि में युयुत्सु पीढी
कन्धों पर
ले निषंग रीते

खुद ही अज्ञातवास ओढ़ कर
धनंजय बृहन्नला हुआ
मछली फिर तेल पर टंगी है
धनुष पडा किन्तु अनछुआ
कौन इस
स्वयम्वर को जीते

जाने कैसा निदाघ तपता है
आग भर गयी श्यामल घन में
दावानल कौन बो गया
चीड, शाल, देवदारु - वन में
अकुलाये सिंह,
व्याघ्र, चीते!

--धनंजय सिंह.
गाजियाबाद

14 सितंबर 2012

५. नदी की धार सी संवेदनाएँ

घट रही है
अब नदी की धार सी
संवेदनाएं

पेड़ कब से
तक रहे पंछी घरों को लौट आयें
और फिर अपनी उड़ानों की खबर
हमको सुनाएँ
अनकहे से
शब्द में फिर कर रही आगाह
क्या सारी दिशाएँ

हाट बस
आडम्बरों के दीखते जिस और जाएँ
रक्तरंजित हो चली है नेह की
सारी ऋचाएँ
रोक दो
जिस ओर से भी आ रही
जहरीली हवाएँ

-रोहित रुसिया

13 सितंबर 2012

४. उपलब्धियों के ये शिखर

बहुत कुछ खोकर मिले
उपलब्धियों के ये शिखर

गाँव छूटा
परिजनों से दूर
ले आई डगर
खो गयी अमराइयाँ
परिहास की
वे दोपहर
मार्ग में आँखें बिछाए
है विकल सा वृद्ध घर

हर तरफ
मुस्कान फीकी
औपचारिकता मिली
धरा बदली
कली मन की
है अभी तक अधखिली
कभी स्मृतियाँ जगातीं
बात करतीं रात भर

भावनाओं की गली में
मौन के
पहरे लगे हैं
भोर सी बातें नहीं
बस स्वार्थ के ही
रतजगे हैं
चंद सिक्के बहुत भारी
जिंदगी के गीत पर

--त्रिलोक सिंह ठकुरेला
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