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23 अक्टूबर 2011

२६. उत्सव के ये मौसम

उत्सव के ये मौसम
क्या क्या रंग दिखाते आये,
तन-मन यादों के मेले में
फिर भरमाते आए

लाल ओढनी
ओढ़े मनवा फिर से हुआ मलंग,
अंतर्मन की ड्योढ़ी पर फिर
बज उठे मृदंग,

तानपुरे के
तारों पर फिर थिरकन आकर झूली
गत कोई फिर कोकिल बनकर
अपने रस्ते भूली

पिया मिलन की बातों से फिर
दिन शरमाते आए

हँसे जो झालर
आज हवेली वही झोपडी जाये ,
आँसू गुनिया की आँखों के
दुलराये बहलाये ,

अबके बरस जो
आये त्यौहारी मन चहके चहकाये,
हर शहीद के धर पर थोड़ी
उजियारी धर जाए

देख पटाखे करें प्रदूषण
मन धमकाते आए

मौल सजे
बाजार लगे पर जेब नहीं है भारी,
किश्तों पर सब कुछ मिलता घर-
बजट पे चलती आरी,

एक आँख में
आँसू अपने हमसे बिछड़ गये क्यूँ,
आतंकी दानव के सम्मुख
ऐसे पिघल गये क्यूँ,

दीप दिवाली ले उजियारा
फिर समझाते आए

-गीता पंडित
(नई दिल्ली)

22 अक्टूबर 2011

२५. दीपक को जलने दो

द्वार पर धरा
दीपक
भोर तलक जलने दो

सूरज ने कैद किया
विद्रोही चाँद
लुकछिप कर भागा है
शुक्र बाड़ फाँद
तारों ने टाँक दिये
चमकीले बूटे
क्षितिज के पार नहीं
ज्योति पिंड छूटे

जुगनू का संगी बन
अंधियारा हरने दो
दीपक को जलने दो

यौवन में रंग भरे
मंगल की चाल
मदमाता केतु अब
देता है ताल
राहू की नजर लगी
चाँद हुआ दुबला
कैसे बच पायेगा
लक्ष्य बना अगला

धरती के ओर छोर
रोशनी बिखरने दो
दीपक को जलने दो

-सुरेश पण्डा
(रायपुर)

21 अक्टूबर 2011

२४. उत्सव गीत

कल था मौसम बौछारों का
आज तीज और त्योहारों का
रंग रोगन वंदनवारों का
घर घर जा कर बंजारा नि‍त
इक नवगीत सुनाए।

कल बि‍जुरी ने पावस गीत
दीपक राग आज हर दीप
भ्रमर गीत गाते मन मीत
सात सुरों में अरु बयार ने
उत्ससव गीत सुनाए।

शरत् चाँदनी छि‍टकी नभ से
कमल कली भी चटकी फट् से
बजी पैंझनी कौंधनी कटि‍ से
चमक चाँदनी नि‍कली बन ठन
घर घर दीप जलाए।

मदन दीप दीपाधारों से
रंगोली घर के द्वारों से
भरे हुए पथ अंगारों से
क्षि‍ति‍ज परे तक देव दि‍वाली
अमि‍त प्रदीप लुटाये।

दि‍न मधुबन मधुयामि‍नी रातें
देवोत्था‍न सजी बारातें
जि‍तने मुँह और उतनी बातें
कूल कलि‍न्दी कदम्ब तले कहीं
कान्हा‍ बंसी बजाये।

-आकुल, कोटा

20 अक्टूबर 2011

२३. गीत हैं बिखरे चारों ओर

गीत हैं
बिखरे चारों ओर
मन पतंग को लगे उड़ाने,
उत्सव लेकर डोर,

समाचार
हैं बिछे लान में,
शतरंजी बाज़ी बागान में,
प्याले चाय, कहकहे काफी,
सहेलियों के
झुरमुट झाँकी,
मंद-मंद है पवन सुहानी,
रस भीगी है भोर,

झाँक रहा
कोहरे का दर्पण,
शीतलता से सिहरा आँगन,
त्योहारों के मौसम आए,
खील खिलौने
सबको भाए,
दीप देहरी सजे हुए हैं,
नाच रहे मनमोर

-कल्पना रामानी
(नवी मुंबई)

19 अक्टूबर 2011

२२. आ गया दीपों का त्यौहार

आ गया
दीपों का त्यौहार
अँधेरा टाले नहीं टले

दूर हो
मन की कड़वाहट
न हो अब कोई जन आहत
मिटा दे हर विकार मन से
नेह का हो
ऐसा व्यवहार
हृदय में अनुपम नेह पले

चाँदनी
तू चुप सी क्यों है
अमावस से डरती क्यों हैं
तमस का टूटेगा फिर जाल
प्रकाशित होगा
हर घर द्वार
रौशनी होगी साँझ ढले

-कृष्णकुमार तिवारी
(बरेली)

18 अक्टूबर 2011

२१. ऊँचे ऊँचे टँगे कंदील

खुशियों से आँगन भरने को,
छोटे छोटे दीप सजे,
ऊँचे ऊँचे टँगे कंदील।

द्वार सजाएँ बंदनवार
चमके घर-आँगन
चम-चम
माँ लक्ष्मी के पाँव सजाएँ
कुल्हिया भरे बताशे खील

आसमान से लिपटे आतिश
तारे आए
धरणी पर
दीवाली की धूम में देखो
जागी गाँव की सोई झील

नव परिधानों में सब निकले,
सजी रंगोली
अंतस महके
खुशियों से आँगन भरने को
नियमों ने कुछ बरती ढील

-भावना सक्सेना
(पारामारीबो, सूरीनाम)

17 अक्टूबर 2011

२०. द्वार रंगोली दीप कतार

द्वार रंगोली दीप कतार
छाया घर-घर में उजियार

खुशियों की सरगम से गुंजित
नवल वस्त्र आभूषण सज्जित
उल्लासित मन नाच रहे हैं
नया गीत है आई बहार

हर मुख पर मुस्कान खिली है
हर दिल में फुलझड़ी जली है
खील मिठाई लक्ष्मीपूजन
द्वार सजे हैं बंदनवार

अक्षत बहना लिए खड़ी है
भाई दूज की आई घडी है
इस रोली के मधुर चिह्न में
बहना का है प्यार अपार

--अरुणा सक्सेना
(दिल्ली)

16 अक्टूबर 2011

१९. सजी दिवाली

कहीं हँसी औ’ कहीं ठिठोली
झर-झर झरती अक्षत रोली
गाती ढपली, बजती ढोलक
बरस रहे हैं गीत

चले पटाखे अपनी धुन में
सरपट दौड़े, उड़े गगन में
फुलझड़ियों को आई मस्ती
मन में उपजी प्रीत

फिरकी देखो झाँक रही है
थिरक-थिरककर नाच रही है
झूमे धरती गाए आँगन
झूम उठे संगीत

दीपों की टोली है आई
अँधियारी मावस शरमाई
रंग-बिरंगी खुशियाँ बिखरीं
गाएँ हिलमिल गीत

खील-बताशे की ज्यौनार
जुड़े रहें तन-मन के तार
खुशी मनाएँ खेलें खेल
होगी मन की जीत

लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू
धन बरसाए भर-भर चुल्लू
सुख की रात अनोखी आई
दुख जाएँगे रीत

मंत्रों से अभिसिंचित धरती
सारे जग का कालुष हरती
सजी दिवाली दुल्हन जैसी
गूँजे मंगलगीत

- मीना अग्रवाल
(गुड़गाँव)

15 अक्टूबर 2011

१८. जगमग जोत जले

मन हो रहा प्रफुल्लित
घर में
जगमग जोत जले

आनंदित किलकारी भरती
नव संचित फुलझड़ियों सी
श्याम रात
चम चम करती है
उत्सव वाली लड़ियों सी
स्वप्न सजीले संचित
सुख समृद्धि की ओर चले

सुन्दर शाश्वत हो शृंगार
पूजा की फिर थाल संवार
राम राम नाम
की धुन को रटते
सारी विपदाएँ हों पार
लक्ष्मी चरण हों अंकित
जग से भय ओर क्रोध टले !

-नूतन व्यास
(गुड़गाँव)

14 अक्टूबर 2011

१७. ज्योतिर्मय आई दीवाली

ज्योतिर्मय आई दीवाली
पुलकित है हिय में हर आली
दीपक थाल लिये

श्री पूजन संग गणपति वंदन
मधुर गीत स्वर का स्पंदन
शोभित है हर ओर गगन के
घोर अमावस माथे चंदन
नीरज नाल लिये

वन्दनवार पटाखे लड़ियाँ
बचपन झूमे ले फुलझड़ियाँ
कम्पित गात धरे पग धीरे
कुसुमित नवल वधू मन कलियाँ
पुष्पित माल लिये

स्नेह अकिंचन अंतस तमसित
काव्य प्रकाश भुवन में उजसित
वागेश्वरि वीणा झंकृत कर
राग विहाग हृदय हो विकसित
माँ उर माल लिये

-श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
(कोलकाता)

13 अक्टूबर 2011

१६. नए अन्न की खुशबू

पूछो नहीं
कि क्या उत्सव का मौसम ले आया
गंगा जमुना की यादों का
संगम ले आया

मिला दशहरा
दीवाली की उजली साँसों से
धरती खुल कर बतियाती
अपने आकाशों से
कौंधा कोई छ्न्द,
ताल, स्वर, सरगम ले आया

नए अन्न की
खुशबू आई, जागी नई रसोई
नई बहू ने चाँद सरीखी
निर्मल रोटी पोई
नया नया सपना
सहेज कर बालम ले आया

किरन छुई
सूरज की गहरी नींद नदी की टूटी
लहर लहर में लगी चमकने
शुभ दिन सजी अँगूठी
भूला सा प्रसंग आखों में
शबनम ले आया

झालर पहने
हुई मुँडेरे माँग लगी फिर भरने
डेहरी डेहरी उजियारे की
चिड़िया लगी उतरने
एक हाशिया सघन सुखों का
कालम ले आया

काजल भरी
रात की आखों हँसने लगा सवेरा
फिर जहाज का पंछी लौटा
चहका रैन बसेरा
अपना "सांताक्रूज", "अमौसी",
"पालम" ले आया

- यश मालवीय
(इलाहाबाद)

11 अक्टूबर 2011

१५. धूप आँगने आई

डूबा था इकतारा
मन में
जाने कब से
चाह रहा था
खुलना-खिलना
अपने रब से
दी झनकार सुनाई

खुलीं खिड़कियाँ
दरवाज़े
जागे परकोटे
चिड़ियाँ छोटीं
तोते मोटे
मिलकर लोटे
नया सवेरा लाई

महकीं गलियाँ
चहकीं सड़कें
गाजे-बाजे
लोग घरों से
आए बाहर
बनकर राजे
गूँजी फिर शहनाई

--अवनीश सिंह चौहान
(मुरादाबाद)

10 अक्टूबर 2011

१४. उत्सव का मौसम

आया उत्सव का मौसम

हर्षाई हर साँझ, दुपहरी
ढोल, नगाड़े, ताशे बाजे
घर, आंगन, द्वारे, गलियारे
मन रंगीले झालर साजे
त्यौहारी उजियारे ने यों
'हरे' हृदय के 'तम'

पर्व उजासे, पावस 'बोली'
महल-मड़ैय्या, हंसी-ठिठोली
'बंदरवार' बंधे हैं 'नभ' तक
घरती माढ़ रही 'रंगोली'
खुशियों की बाँहों में हौले
मुस्काते हैं 'गम'

ऋतुओं के पग खिले 'महावर'
'पल' फूलों की डोली जैसे
पाहुन की अगुवाई करते
'दिन' दीवाली, होली जैसे
घुंघट में ज्यों 'दुल्हन' हुलसे
आँखें हैं पर, नम

-नियति वर्मा
(इंदौर)

9 अक्टूबर 2011

१३. देसी घर –संसार


बरसों पहले आई जब मैं
सात समंदर पार
गठरी बाँध के लाई थी संग
सारे तीज – त्यौहार

कभी मैं खोलूँ एक गाँठ मैं
द्वारे दीप सजाऊँ
इक खोलूँ मैं पुड़िया रंग की
मंगल कलश रंगाऊँ
बड़े जतन से जोड़ा मैंने
देसी घर – संसार

कभी मैं खोलूँ दूजी गठरी
ओढूँ लाल चुनरिया
झिलमिल बिंदिया माथे सोहे
पाँव सजे पायलिया

भेंट करें परदेसी नाते
रीझ – रीझ उपहार

कभी तो पागल मनवा ढूँढे
बचपन की वो गलियाँ
याद करूँ सखियाँ –हमजोली
भर - भर आवें अँखियाँ

आँचल में बाँधा है अब तक
माँ – बाबुल का प्यार

-शशि पाधा
(कनेक्टीकट, यू.एस.ए.)

8 अक्टूबर 2011

१२. दिन खनकता है

दिन खनकता है
सुबह से शाम कंगन-सा।

खुल रहा मौसम
हवा में गुनगुनाहट और नरमी
धूप हल्के पॉंव करती
खिड़कियों पर चहलकदमी
खुशबुओं-सी याद
ऑंखों में उतरती है
तन महकता है
सुबह से शाम चंदन-सा।

मुँह अँधेरे छोड़ कर
अपने बसेरे
अब यहॉं तब वहॉं चिड़ियॉं
टहलती हैं दीठ फेरे
तितलियों-से क्षण
पकड़ में पर नहीं आते
मन फुदकता है
सुबह से शाम खंजन-सा।

चुस्कियों में चाय-सा
दिन भी गया है बँट
दोपहर के बाद होती
खतों की आहट
रंग मौसम के सुहाने
लौट आए हैं
लौटता अहसास फिर-फिर
शोख बचपन-सा।
दिन खनकता है
सुबह से शाम कंगन-सा।

-ओम निश्चल
(वाराणसी)

7 अक्टूबर 2011

११. बदले बदले से लगते हैं

बदले बदले से लगते हैं
उत्सव के मौसम।

आई शरद
शक्ति पूजा की
जगह जगह चर्चा
पूजा-अर्चन, दीपमालिका
कितना ही खर्चा
किन्तु अहिल्या पाषाणी सी
क्र्रोध भरे गौतम।

सिर्फ जलाये गये
हर जगह कागज के पुतले
अब भी देव डरे सहमे हैं
रावण-राज चले
वन में राम, बध्द्व है सीता
विवष संत संगम।

इस पिशाचनी महँगाई की
कब तक घात सहें
भूखी नंगी दीवाली की
किस से व्यथा कहंे
पर्वत बनी समस्याऐें है
तिनके जैसे हम


त्रिलोक सिंह ठकुरेला
आबूरोड (राज.)

6 अक्टूबर 2011

१०. दीप जला दो आँगन–आँगन

जगमग
नव प्रकाश हो पावन
दीप जला दो‚ आँगन–आँगन

ये प्रकाश
के पंख रुपहले
दूर क्षितिज पर जाकर पहले
कर दें अपना यह विज्ञापन

धुँधले
पंथ‚ अँधेरी राहें
पकड़–पकड़ ज्योतिर्मय बाहें
स्वर्ग बना दें‚ जगत अपावन

अंधकार
का नष्ट गर्व है
दीप जले हैं‚ ज्योतिपर्व है
उजला–उजला दामन–दामन

मन से
मन का दीप जलाएँ
आजीवन जन–जीवन गाएँ
द्वेषभाव का किए विसर्जन

—राममूर्ति सिंह 'अधीर

5 अक्टूबर 2011

९. उत्सव का मौसम

हरियाली ने हर घाव पर
लगा दिया मरहम
पावस बीता, फिर से लौटा
उत्सव का मौसम

हम जीव की भाग दौड़ में
बुरी तरह थक जाते
फिर मन में उमंग भर देते
ये उत्सव जब आते
छुवन हवा की बिसरा देती
दुनिया के सब गम

दुर्गा पूजा और दशहरा
फिर होगी दीवाली
मेला देखेंगी पापा संग
आँखें भोली भाली
बूढ़ों से आगे ही होंगे
बच्चे चार कदम

माथे पर चिन्ता की रेखा
डाल गई महँगाई
आखिर हमको भी जब कड़वी
लगने लगी मिठाई
तब गरीब पर क्या गुजरेगी
सोच रहे हैं हम

-रवि शंकर मिश्र 'रवि'
(प्रतापगढ़)

4 अक्टूबर 2011

८. आँगन आँगन दीप

आँगन-आँगन दीप धरें
यह अंधकार बुहरें

होता ही आया तम से रण
पर तम से तो हारी न किरण
जय करें वरण ये अथक चरण
भू-नभ को नाप धरें

लोक-हृदय आलोक-लोक हो
शोक-ग्रसित भव विगत-शोक हो
तमस-पटल के पार नोक हो
यों शर-संधान करें

डूबे कलरव में नीरवता
भर दे कोमलता लता-लता
पत्ता-पत्ता हर्ष का पता
दे, ज्योतित सुमन झरें

- डॉ. राजेन्द्र गौतम
(नई दिल्ली)

3 अक्टूबर 2011

७. उत्सव का मौसम


घर घर में
फिर आया
उत्सव का मौसम

बिजली की धोबिन ने
जमकर था लूटा
धोबी इसके फंदों
से थोड़ा छूटा
त्यौहारी पैसों से
जेबों में खनखन
सूखे आँगन में है
कपड़ों का सावन
सहरा पे लहराया
रंगों का परचम

हलवाई ने प्रतिमा
शक्कर से गढ़ दी
भूखी गैलरियों में
जमकर ये बिकती
बढ़ई के औजारों में
होती खट-खट
दिन भर भड़भूँजे के
घर मचती पट-पट
आँवें के मुख पर है
लाली का आलम

मैली ना हो जाएँ
बैठीं थीं छुपकर
बक्सों से खुशियाँ सब
फिर आईं बाहर
हर घर में रौनक है
गलियों में हलचल
फूलों से लगते वो
पत्थर जो थे कल
अद्भुत है कमियों का
खुशियों से संगम

-धर्मेन्द्र कुमार सिंह
(बरमाना, बिलासपुर,हिमाचल प्रदेश)