19 जुलाई 2009

६ सुख दुख इस जीवन में

मन से ही उत्पन्न हुए हैं
खो जाते हैं मन में
आते हैं जाते हैं
सुख दुख इस जीवन में ।

हो मन के अनुकूल
उसे ही सुख कहते हैं
मन से जो प्रतिकूल
उसे ही दुख कहते हैं
गमनागमन किया करते हैं
इच्छा के वाहन में
आते हैं जाते हैं
सुख दुख इस जीवन में ।

दूल्हे जैसा सर्व प्रतीक्षित
सुख आता है
अनचाहे मेहमान सरीखा
दुख जाता है
एक गया तो दूजा आया
पड़ें न उलझन में
आते हैं जाते हैं
सुख दुख इस जीवन में ।


सुख फूलों सा मनमोहक
सुन्दर दिखता है
फिर दुख आता हे तो
काँटों सा चुभता है
एक हंसाता एक रुलाता
क्रमशः मन के वन में
आते हैं जाते हैं
सुख दुख इस जीवन में ।

दोनों का ही कुछ स्वतन्त्र
अस्तित्व नहीं हे
और किसी का कुछ भी
स्थायित्व नहीं
दुख भोगा सुख की तलाश में
मिला न तन धन में
आते हैं जाते हैं
सुख दुख इस जीवन में ।

--विपन्नबुद्धि

6 टिप्‍पणियां:

  1. दूल्हे जैसा सर्व प्रतीक्षित
    सुख आता है
    अनचाहे मेहमान सरीखा
    दुख जाता है
    ये इस गीत की सबसे अच्छी पंक्तियां लगीं जहां बात को कुछ नये ढंग से कहने की कोशिश की गयी है.यहां सुख को दूल्हे जैसा सर्व प्रतीक्षित बताया है. प्रयोग नया है चौंकाता भी है नवगीत के लिये ये अतिआवश्यक है कि बात बिल्कुल नये ढंग से कही जाये. परम्परागत रूप से जिन प्रतीकों का प्रयोग होता आ रहा है उन्हें लेकर यदि गीत की रचना की जाय तो वह गीत तो होगा लेकिन नवगीत नहीं. हां ये अवश्य ध्यान रखने वाली बात है कि प्रयोग सिर्फ चौंकाने के लिये न हो वरन उसकी सर्वस्वीकृति भी हो. पढने वाले को ऐसा न लगे कि अरे ऐसा कैसे हो सकता है. 'दूल्हे जैसा सर्व प्रतीक्षित' में एक पाठक की नज़र से मुझे भी यही लगता है कि प्रयोग सिर्फ चौंकाता है. खुशी से उछालता नहीं.

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  2. अब तक आये नवगीतों में यह सबसे अच्छा प्रतीत हो रहा है मुझे। एक स्थान पर समझने में कठिनाई लग रही है।
    दूल्हे जैसा सर्व प्रतीक्षित
    सुख आता है
    अनचाहे मेहमान सरीखा
    दुख जाता है

    यहाँ अनचाहे मेहमान के जाने पर तो खुशी होनी चाहिये। रचनाकार के मन में सम्भवतः यह है कि दुख अनचाहे मेहमान की तरह आता है और उसी तरह उपेक्षित रह कर या कष्ट पहुँचा कर चला जाता है। (क्या मैं सही हूँ?) परन्तु प्रथम दृष्टया यह वाक्य अटपटा सा लग रहा है। हो सकता यह मेरी समझ का फेर हो।
    फिर भी अच्छी कल्पना के लिये बधाई!
    सादर
    अमित

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  3. एक हंसाता एक रुलाता
    क्रमश: मन के वन में

    अच्छा नवगीत है, पर कहीं-कहीं अटपटापन लगता है। सुन्दर प्रयोग किये हैं जो कि अच्छी बात है,ये और बात है कि उससे लय थोड़ी-बहुत टूटती है। कुल मिला कर गीत रुचिकर है।

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  4. जीवन का शाश्‍वत सत्‍य है सुख और दुख। यह भी सत्‍य है कि सुख और दुख मन का विषय हैं। लेकिन जब हम नवगीत की बात करते हैं तब किसी नवीनता की कल्‍पना की जाती है। कुछ ऐसे प्रतीक हों या कुछ ऐसे बिम्‍ब हो कि लगे आधुनिक युग में सुख और दुख को जीवन में देखने के नए आयाम मिले हैं। यहाँ दूल्‍हा और सुख की कल्‍पना है लेकिन सामाजिक जीवन में दूल्‍हा और सुख की कल्‍पना नहीं है, लडकी का विवाह हो यह तो सुख है लेकिन सर्वप्रतिक्षित दूल्‍हा सुख का प्रतीक नहीं बनता। हाँ दुल्‍हन के लिए जरूर कहा जाता है कि दुल्‍हन के रूप में घर की खुशियां आती हैं।

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  5. teesre aNtre ke astiTva aur sthaiTva shaBd thode bhari lagte haiN vaise geyta meiN badha nahi aur poora geet suNder bana hai

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  6. इस पाठशाला की सबसे यही खास बात है...जितने अच्छे गीत, उतनी ही रोचक टिप्पणियां...
    अहा!
    किंतु पूर्णिमा जी और कटारे जी की अनुपस्थिति अब खलने लगी है....

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