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29 मई 2014

१५. पीपल वाली छाँव

बिछड़ गये है सारे अपने
संग-साथ है नहीं यहाँ,
ढूँढ रहा मन पीपल छैंयाँ
ठंडी होती छाँव जहाँ

छोड़ गाँव को, शहर आ गया
अपनी ही मनमानी से,
चकाचौंध में डूब गया था
छला गया, नादानी से

मृगतृष्णा की अंधी गलियाँ
कपट द्वेष का भाव यहाँ
दर्प दिखाती, तेज धूप में
झुलस गये है पाँव यहाँ,

सुबह-साँझ, एकाकी जीवन
पास नहीं है, हमजोली
छूट गए चौपालों के दिन
अपनों की मीठी बोली

भीड़ भरे, इस कठिन शहर में
खुली हवा की बाँह कहाँ
ढूंढ़ रहा मन फिर भी शीतल
पीपल वाली छाँव यहाँ।

- शशि पुरवार
वर्धा

१४. देवालय का सजग सन्तरी

देवालय का सजग सन्तरी,
हर-पल राग सुनाता है।
प्राणवायु को देने वाला ही,
पीपल कहलाता है।।

इसकी शीतल छाया में,
सारे प्राणी सुख पाते हैं,
कागा और कबूतर इस पर,
अपना नीड़ बनाते हैं,
देवालय में पीपल राजा,
देवों से बतियाता है।
प्राणवायु को देने वाला ही,
पीपल कहलाता है।।

सभी आस्थावान लोग,
जल इस पर रोज चढाते हैं,
बजरंगी हुनमान वीर को,
अपना शीश नवाते हैं,
देवालय के देवों का तो,
पीपल ही उद्गाता है।
प्राणवायु को देने वाला ही,
पीपल कहलाता है।।

पेड़ लगायें कहाँ आज हम,
आँगन तो अब नहीं रहे,
जंगल खाली हुए धरा से,
कैसे शीतल हवा बहे?
कंकरीट का जंगल अब तो,
सबको बहुत लुभाता है
प्राणवायु को देने वाला ही,
पीपल कहलाता है।।

-रूपचंद्र शास्त्री मयंक
खटीमा (उत्तराखंड)

१३. वृद्ध पीपल यह

वृद्ध पीपल यह
खड़ा चौपाल के आगे
साक्षी अनगिन-अकथ
मौखिक कथाओं का

आयु में भी यह
पितामह से बड़ा है
पीढ़ियां खेलीं
कई इसके तले हैं
हर अमंगल के
हरण की कामना के ,
मनौती के दीप
चरणों में जले हैं

इन बदलती
आस्थाओं के क्षरण में
साक्षी पीपल बना
निष्ठुर व्यथाओं का

हो रहे बदलाव
श्रम के साधनों में
हम बदलते जा रहे
सहकार से भी
चेतना कच्चे कलावों से
बंधी जो
छोड़ पाये हैं नहीं
व्यवहार से भी

ये हमारे नीम
पीपल और बरगद
दे रहे सन्देश अब भी
हैं प्रथाओं का

-जगदीश पंकज
गाजियाबाद

28 मई 2014

१२. कब सीखा पीपल ने

धर्म-कर्म दुनिया में
प्राणवायु भरना
कब सीखा पीपल ने
भेदभाव करना?

फल हों रसदार या
सुगंधित हों फूल
आम साथ हों
या फिर जंगली बबूल
कब सीखा
चिन्ता के
पतझर में झरना

कीट, विहग, जीव-जन्तु
देशी-परदेशी
बुद्ध, विष्णु, भूत, प्रेत
देव या मवेशी
जाने ये
दुनिया में
सबके दुख हरना

जितना ऊँचा है ये
उतना विस्तार
दुनिया के बोधि वृक्ष
इसका परिवार
कालजयी
क्या जाने
मौसम से डरना

धर्मेन्द्र कुमार सिंह
बिलासपुर

११. बूढ़ा पीपल

बूढ़ा पीपल खडा आज भी,
स्वाभिमान के साथ तना,
डरे न आंधी तूफानों से,
आश्रय को नहिं करे मना।

जीवन संघर्षो में बीते,
हम भी पीपल जैसै जीते,
चूर-चूर हो जाते अक्सर,
कष्ट कभी जब पड़े घना।

पीपल पात बिछड़ जाता है,
साथ छोड़ जब वो जाता है,
शाख, शाख से रोये लिपटे,
आँखों को बेहाल बना।

पल-पल बस पीपल ही पीपल,
जिसे देख मन होता शीतल,
कैसे समझे ये मन-मानस,
रुके न आँखों का झरना।

काट दिये जड़ तने कभी जब,
पूछ रहे हैं, कैसे हो अब ?
पीपल चुप हो झेल गया सब
इस दुनिया का हाल घिना।

-पवन प्रताप सिंह पवन
नरवर (म.प्र.)

१०. पीपल के पत्तों पर

पीपल के पत्तों पर फिसल
रही चाँदनी

नालियों के भीगे हुए पेट पर
पास ही जम रही घुल रही
पिघल रही चाँदनी
पिछवाड़े बोतल के टुकड़ों पर--
चमक रही दमक रही
मचल रही चाँदनी
दूर उधर बुर्जों पर उछल
रही चाँदनी

आँगन में दूबों पर गिर पड़ी--
अब मगर किस कदर
सँभल रही चाँदनी
पिछवाड़े बोतल के टुकड़ों पर
नाच रही कूद रही उछल
रही चाँदनी

वो देखो सामने
पीपल के पत्तों पर फिसल
रही चाँदनी

-नागार्जुन

९. पीपल का पात हिला

पीपल का पात हिला
उससे ही पता चला
अभी सृष्टि ज़िन्दा है

शाहों ने मरण रचा
बस्तियाँ मसान हुईं
सुभ-शाम-दुपहर औ'
रातें बेजान हुईं

कहीं कोई फूल खिला
उससे ही पता चला
अभी सृष्टि ज़िन्दा है

शहज़ादों का खेला
गाँव-गली राख हुए
सारे ही आसमान
अँधियारा पाख हुए

एक दीया जला मिला
उससे ही पता चला
अभी सृष्टि ज़िन्दा है

नाव नदी में डूबी
रेती पर नाग दिखे
संतों की बानी का
कौन भला हाल लिखे

रंभा रही कपिला
उससे ही पता चला
अभी सृष्टि ज़िन्दा है।

- कुमार रवीन्द्र
हिसार

27 मई 2014

८. पथ निहारता रहता पीपल

पथ निहारता रहता पीपल,
किन्तु न मैं उस तक जा पाता।

इस जीवन की भूल-भुलैया
मुझको अपने में उलझाती,
समय-डाकिया दे जाता है
अब भी स्मृतियों की पाती,
मैं सुदूर, पर कभी न भूला
पीपल से वह प्यारा नाता।

वह स्निग्ध पात पीपल के
वह सुमधुर संगीत सुहाना,
नटखट बचपन बुनता रहता
मन-भावन सा ताना-बाना,
जब मन होता तभी डाल पर
चढ़ जाता, खुश होकर गाता।

गुल्ली-डंडा, चोर -सिपाही,
कितने खेल छाँह में खेले,
स्वप्न हुए वे दिन सोने से
आते रहते याद अकेले,
कभी कल्पना के विमान में
अनायास उन तक हो आता।

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
माउंट आबू (राजस्थान)

७. पीपल के वृक्ष रात के सन्नाटे में

रात के सन्नाटे में
ठोकर खाकर गिरा चाँद
ऐसे फैली है धवल चाँदनी
जैसे पिसे हुए गेहूँ की
कई बोरियाँ बिखर गई हों।

ऐसे लगते हैं पीपल के वृक्ष
रात के सन्नाटे में
जैसे मंदिर के बाहर
भिखमंगों की टोलियाँ खडी हों
चुप बैठा है शाखों पर
अपराध बोध से ग्रस्त अँधेरा
जैसे उसके नीले नीले हाथों पर
संटियाँ पड़ी हों

किरच-किरच हो गया वक्त
फिर ऐसे फैल गया राहों पर
जैसे जंगल में बबूल की
कई टहनियाँ बिखर गई हों।

आसमान के उलझे-उलझे बालों में
उँगलियाँ फिरा कर
हवा छरहरी दोनों हाथ उठाकर
अँगड़ाई लेती है
तन्मयता से सुनती और समझती
पत्तों की भाषा को
प्रश्नचिह्न से खडे दरख्तों को
सटीक उत्तर देती है

जलते-बुझते कुछ जुगनू
ऐसा उजास भरते जीवन में
जैसे उगते हुए सूर्य की
कई रश्मियाँ बिखर गई हों।

मैं खिड़की पर खड़ा हुआ
देखा करता हूँ सूनेपन को
सुनता हूँ अनुगूँज
हृदय की घाटी में बीते लम्हों की
आदमकद अतीत आईना लेकर
सम्मुख आ जाता है
हरी दूब की दुर्बलता
पगडण्डी बन जाती यादों की

कुछ क्षण महके चमकीले
ऐसे बिछ गए मेरी पलकों पर
जैसे सागर की रेती पर
कई सीपियाँ बिखर गई हों।

-कुमार शिव
कोटा (राजस्थान)

६. मुझ अश्वत्थ की टेर सुनो अब

गेह तजो या देवों जागों
बहुत हुआ निद्रा व्यापार

कब तक आशिर्वचनो से
पीड़ा के तन को सहलाऊँगा
वरदानो की तारीखों को
कब तक आगे खसकाऊँगा
कब तक भ्रम में रखूँ उम्मीदें
कब तक ओढूँ
यह अपकार

महुआ की माई आई थी
कल श्रीहरि हित लिए कलावा
थाली में दीपक अक्षत था
आँखों में गहरा पछतावा
शायद अब की
समध्याने का
हुआ है दुगुना माँग पसार

साँस साँस बंधक है मेरी
श्रद्धामय दृढ विश्वासों की
निशिवासर देहरी पर बैठे
पावन निश्छल उपवासों की
देवों लो संज्ञान
या मुझे
वरदानो का दो अधिकार

-सीमा अग्रवाल
कोरबा (छत्तीसगढ़)

५. गाँव के पीपल का संसार

भोलू भइया के
संग कंचे, भोली बुधिया के
संग प्यार
गाँव के पीपल
की छाया में, सिमटा है
निर्मल संसार

झूला झूल
रहा है बचपन, ठंडक में किलकारी दे
यौवन महक रहा है पावन, साँसें प्यारी प्यारी ले
देख रही हैं बूढ़ी आँखें,
सारे जीवन का सिंगार

शहर का पीपल
उगा सड़क पर, किसी ने प्याऊ लगा दिया
शीतल अमृत सी छाया में, जल सुविधा का सिला दिया
पीपल की पावनता प्यारी,
जन जन का करती उद्धार

गाँव शहर जी रहे
मधुर, जिस प्रकृति अलौकिक क्यारी को
उसकी प्राण वायु हर लेती, हर मुश्किल बीमारी को
पीपल सब में महापुण्यप्रद,
करता देवों का सत्कार

डॉ कृष्ण कान्त मधुर
नई दिल्ली

26 मई 2014

४. पीपल के बिछोह में

खोया कहीं बचपन तरुणाई के मोह में
छोड दिया गाँव जब जीविका की टोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

पीपल चौंतरे पर छुटपन के पैंतरें थे,
पातों के छातों पर, और और छाते थे
पीपल की छाँव तले, कितने अरमान पले
छनती हुई धूप में, पर्ण पर्ण पवन झले

दूर कहीं इठलाती, मधुवन की जोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

देववृक्ष अश्वत्थ के देवतुल्य प्रभाव से
अनुष्ठान पूर्ण हुए कई अपने गाँव के
प्रभुराम कथा वाचन या धर्म कर्म प्रवचन
चले नवदंपती हों महकाने निज उपवन

बैठना पीपल तले जब भी उहापोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

याद रहा पीपल को गाँव का अतीत सभी
थक कर जो बंद हुई तब की वो रीत सभी
पीपल की मूल फैली खेतों औ’ बागों में
पवन को दिये सुर कितने ही रागों के

संग सदैव गाँव के आरोह अवरोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

-ओम प्रकाश नौटियाल
देहरादून

३. डीहे का पीपल

गर्म हवाओं को सहला कर
कर लेता शीतल
डीहे का पीपल।

इसकी छाया में आ
मिटती पीर पसीनों की
यह चबूतरा है सुख–शैय्या
दीनों–हीनों की
सुस्ताने आते दुपहर को
यहाँ, बैल औ हल।

साँझ–सुबह जुटतीं चौपालें
चतुर सयानों की
बहसें, राजनीति पर
चर्चा, गाँव सिवानों की
कौन, दाँव में हार गया सब
कौन रहा अव्वल।

सोख, धूप का ताप
शान से यह लहराता है
ले, खुद विष की साँस
हमें अमृत लौटाता है
सरल साधु सा उपकारी
यह ज्यों माँ का आँचल।

– कृष्ण नन्दन मौर्य
प्रतापगढ़ (उ.प्र.)

२. गीत कोई पीपल पर लिक्खूँ

गीत कोई पीपल पर लिक्खूँ
ऐसा हुक्म हुआ।
कई दिनों से कलम पढ़ रही
मंतर और दुआ।

कुंद पड़े भावों पर
तन्मयता की सान गढी
चिन्तन किया हाय! पर
बासी उबली नहीँ कढ़ी।
कुंठित मन अब हरियाली पर
रमता नहीँ मुआ।

सुनूँ उसी के मुँह से
उसकी लम्बी काल-कथा
बैठ गया जाकर छाया में
करके व्यक्त व्यथा।
और पितामह! कैसे हो?
कह अंगद चरण छुआ।

गहरी ठंडी साँस
नैन में भरकर गंगाजल
बोला-इमली गूलर पाकड़
आम बेल कटहल।
बंधु बाँधव चले गये
चिलबिल बरगद महुआ।

खाली मशकें लिये पुरंदर
कैसे हो तर्पण
टूटे नीड़ मौन कलरव
शाखों पर संकर्षण।
अँधियारे अब पीपल खाता
न गीदड़ ठलुआ।

- रामशंकर वर्मा
लखनऊ

१. पीपल की छाँव

आपस में यूँ
जब से बिखरा है गाँव
कुछ उदास रहती है
पीपल की छाँव

खटिया से टूट गयी
खटिया की गोई
तपती दोपहरी की
चहल–पहल खोई
बिना नींव के ही
हैं खड़े मनमुटाव

मीठी बोली से भी
हुई बदसलूकी
बरसों से टहनी पर
कोयलें न कूकीं
बची रही कौओं की
सिर्फ काँव–काँव

कब तक चल पायेगी
ऐसी नादानी
है मनुष्य आखिर तो
सामाजिक प्राणी
कभी फिर बढ़ेगा
सद्भावों का भाव

–रविशंकर मिश्र
प्रतापगढ़ (उ.प्र.)

6 मई 2014

कार्यशाला- ३३ पात पीपल का

यह कार्यशाला विशेष है- इस अर्थ में कि इसे पहले अनुभूति में प्रकाशित किया गया और बाद में पाठशाला में लाया गया। रचनाकारों और पाठकों के बीच नई नई परंपराओं को बदल बदल कर लाने का प्रयत्न सदा रहा है। समूह में नवगीत को प्रकाशित करना, फिर ठीक करना, फिर अनुभूति में प्रकाशित करना, यह क्रम नये रचनाकारों के लिये बना रहा है। सीधे अनुभूति में गीत प्रकाशित करने का निश्चय इसलिये लिया गया ताकि नये रचनाकारों को अपने आप बिना सहायता के नवगीत रचने का आत्मविश्वास बने और अस्वीकृति का अनुभव कैसा होता है उसकी भी जानकारी मिल सके। एक रचनाकार की एक ही रचना वाले नियम के चलते विशेषांक में कुछ अच्छे नवगीत भी प्रकाशित होने से रह गए थे। उन्हें  भी यहाँ स्थान मिलेगा। साथ ही जिनके नवगीत देर में तैयार हुए थे उन्हें भी यहाँ प्रकाशित किया जा सकेगा।
- टीम नवगीत की पाठशाला