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23 सितंबर 2009

१७- कलयुग की इस धारा में

कलयुग की इस धारा में
इन्सान बिखरा पड़ा है

बाँट ली धरती अब अम्बर की बारी है
धुप के टुकड़े कर दिए क्या ये जीत तुम्हारी है
मंदिर के हैं दिए उदास मज्जिद में अजान
खुद से खुद की खो रही देखो अब पहचान
टूट गया कुछ ऐसा के भगवान बिखरा पड़ा है
कलयुग की इस धारा में
इन्सान बिखरा पड़ा है

गर्भ में दी मौत सुनी न चीख उसकी
जिन्दा जला दिया ,है ये भूल किसकी
इंसानों में हैवान इस कदर घुल गए
मानवता के धागे क्यों रेशे रेशे खुल गए
चुभती हैं किरचें इनकी ईमान बिखरा पड़ा है
कलयुग की इस धारा में
इन्सान बिखरा पड़ा है

--रचना श्रीवास्तव

१६- गरबा की रात में

गरबा की रात है
थिरकते हैं बदन
और नाचती है गोरियां
दमकते रूप की
भभकती आंच में
हुस्न बिखरा पड़ा है

बच्चों का झुंड
और उनकी चिल्ल-पों में
डूबा मेरा मन
उनकी इस मासूमियत में
मुझे लगे जैसे मेरा
बचपन बिखरा पड़ा है

छलकते जाम खनकती बोतलें
मदिरा के उस नशे में
साकी के महकते इतर में
हलके गहरे धुंए में
टूटे कांच के टुकडों में
मेरा वजूद बिखरा पड़ा है

बारिश नहीं, एक और अकाल
प्यासी धरती की दरारों में
बूढी धंसी आँखों में
दमे की खुल्ल-खुल्ल में
बिवाई से रिश्ते मवाद में
मेरा भारत बिखरा पड़ा है

--शैलेष मंगल

१५- यादों की गली में

यादों की गली में
बिखरा सब पड़ा है

धार में
अँसुवन की जो बह भी न पाया
बातें थीं स्वजन की तो
कह भी न पाया
मन की कली कोमल
काँटा सा गड़ा है

वह था
तेरा अहम या मेरा अभिमान
दरकता था दर्पण या
छूटा सम्मान
सोचते थे दोनो
जिद पे क्यों अड़ा है

--वंदना सिंह

१४- भारत एकीकरण

जब देश आजाद हुआ, काम था कठिन और बड़ा
कैसे एक हो भारत, जो था टुकडो में बिखरा पड़ा

सबको लग रही थी चिन्ता बड़ी भारी
सरदार पटेल को सोपी ये जिम्मेदारी
पटेल जी ने तुंरत समस्या सिर धारी
जीत उसका लक्ष्य हार भी उससे हरी

सीना तान के एकीकरण को लोह्पुरुष निकल पड़ा
जब देश आजाद हुआ, काम था कठिन और बड़ा

साम दाम दंड भेद जो भी बन पड़ा अपनाया
सब देशी राजाओं को घर घर जाकर मनाया
जो नहीं माना उसको डंडे का बल दिखलाया
सबको भारत में मिलकर वृहत भारत बनाया

सरदार पटेल ने सबको एक मंच पर किया खडा
जब देश आजाद हुआ, काम था कठिन और बड़ा

विमल कुमार हेडा

18 सितंबर 2009

१३- पावस प्रातः

ले सीली सी ताप
औ हलकी सी भाप
पावस प्रातः बिखरी पड़ी है

बादल से न बोलूं आज
फिर छितराऊ रश्मि का राज
नग-शिखर पर टिका कर कोहनी
भोर-नवोढा विचर रही है
झील-झील की बूँद-बूँद में
पावस प्रातः निखरी पड़ी है

नील गगन का कोना कोना
पाखी संग बतरस में खोना
नग-शिखर पर सुला कर रोहणी
अरुण-सुषमा छितर रही है
क्षण-क्षण की मोह-माया में
पावस प्रातः पिघली पड़ी है

--स्वाती भालोटिया

17 सितंबर 2009

१२- वो रात फिर आ गई

वो रात फिर आ गई

घनघोर तम
निस्तेज तन
अनुपम छटा
हर ओर छा गई
नेह के मोती पिरोती
वो रात फिर आ गई

बिखरे पड़े
घन‍‍‌‍‍‍ केश
घुल रहा
संताप है
प्रेम के नवगीत गाती
वो रात फिर आ गई

अलसित धरा
ताके गगन
बस में नही
चंचल मन
अम्बर धरा के मिलन की
वो रात फिर आ गई

--दीपा जोशी

16 सितंबर 2009

११- रिश्तों के आँगन में

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है।

प्रेम की अलमारी में, कब से इसे बंद किया था,
हर नाते की चाप को, मुस्कुरा के सह लिया था,
संबंधों की गठरी से, टुकडा-टुकडा कर गिर पड़ा है,
रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है।

तकिया से मन को, कभी सराहने पे दबा लेता,
बिछौना बना ज़िन्दगी के पलंग पे कभी बिछा लेता,
आज ये ख्वाहिशों की लाठी बन, मुझसे लड़ चला है,
रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है।

हाथ हैं की, मजबूरियों की जेब में पड़े हैं,
मन के टुकडों को, हम कुचल के चल पड़े हैं,
अंजान प्रेयसी सा, मुँह फेर के पड़ा है,
रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है।

---मीत (हितेश कुमार)

13 सितंबर 2009

१०- बिखरा पड़ा है

सँवरते हैं केश,चिन्तन किस तरह बिखरा पड़ा है
चेहरा जगमग हुआ भीतर यहाँ कीचड़ भरा है

प्रतियोगिता सौंदर्य की, भाग लेने को सदा
सभा में निर्वस्त्र होती, यह भला कैसी अदा
स्वातन्त्र्य का झंडा उठा कर देह तक को बेचती
मुस्कुराहट छलनी दिल पर,किस तरह की आपदा !

आवरण से झांकता मवाद तो बिखरा पड़ा है
चेहरा जगमग हुआ भीतर यहाँ कीचड़ भरा है

नचाने निकली कभी तो बन गई खुद ही खिलौना
शस्त्र सुन्दरता बनी तो हो गई नर का बिछौना
परिवार की जंजीर तोड़ी, हक की टेड़ी चाल में
बनने चली थी डेढ़ तो व्यक्तित्व बचता आध-पौना

ध्वस्त रिश्तों का महल, मलबा यहाँ बिखरा पड़ा है
चेहरा जगमग हुआ भीतर यहाँ कीचड़ भरा है

दूल्हे राजा सँवर कर तलवार हाथों में लिये
चाँद तारे भूमि पर, शृंगार क्या सजधज किये!
जल मरी पहली दुल्हन उसके लहू की आँच ने
दूसरी शादी-हवन की आग को शोले दिये

दर्द फैला आसमां में, खून तक बिखरा पड़ा है
चेहरा जगमग हुआ भीतर यहाँ कीचड़ भरा है।

--हरिहर झा

10 सितंबर 2009

९- रूप रंग निखरा पड़ा है

चांदी की थाली सरीखा
रूप रंग निखरा पड़ा है

फेंक रजनी की चदरिया
आस की बांधे गठरिया
भूल-बिसरा कर विगत को
दे रहा नूतन खबरिया

शिशु सा हंसता उजाला
दूर तक छितरा पड़ा है
चांदी की थाली सरीखा
रूप रंग निखरा पड़ा है

दहकता है वो अनल सा
ठिठुरता है ठंडे जल सा
प्यास माटी की बुझाने
बावले अम्बर सा बरसा

पुष्प-पातों में कभी फिर
गंध सा पसरा पड़ा है
चांदी की थाली सरीखा
रूप रंग निखरा पड़ा है

सुख -सागर सा घुमड़ता
पीर की घाटी उतरता
मौन सा भारी लगे है
कहकहे सा भी मचलता

स्मृति की रेत सा पल
चतुर्दिक बिखरा पड़ा है
चांदी की थाली सरीखा
रूप रंग निखरा पड़ा है

--प्रवीण पंडित

9 सितंबर 2009

८- टूट गया दिन

टूट गया दिन
बिखरा सब संध्या तक आते।

सूना आँगन फैली किरचें।
डरे बसेरा घुप्प अँधेरा।
हाथ लकीरें किसे दिखाएँ?
सिहरी देहरी चुभते हैं पिन।
टूट गया दिन

झीनी साड़ी खड़े दुशासन।
ठंडा चूल्हा चौका बासन।
छज्जे तक आ गई रूलाई।
कटती पाखें नहीं बताई।
साँसें चलतीं पल-पल को गिन।
टूट गया दिन

धुँधला धुँधला आर पार तक।
उलझ गए हैं चौराहों पर।
बिखरे रिश्ते बिखरे नाते।
बिखरे बिखरे से हैं तन मन।
कौन समेटे बैठा है जिन।
टूट गया दिन

-निर्मला जोशी

8 सितंबर 2009

७- बिखरा पड़ा है

कल तक था जो सिमटा-सिमटा
आज वो सब-कुछ बिखरा पड़ा है
लगता था जो
अपना - अपना
जग सारा वो बिखरा पड़ा है

सूरज से अब किरनें रूठीं
दिखती चाँद में नहीं चाँदनी
सावन से बरखा है भागी
छोड़ गई गीतों को रागिनी
मगर विचारों के
सागर में
आज भी देखें जोश बड़ा है

घर शासक के मिले न शासन
वहाँ तो रहता अब दु:शासन
सभी उड़ाते हैं बेपर की
कौन बचाये देश का दामन
मत वो भूलें
जन-मानस में
आज भी गांधी ज़िन्दा खड़ा है

फोन की घंटी रेल का गर्जन
शाम-सवेरे भागता यौवन
लैपटॉप है पास में फिर भी
लायें कहां से फ़ुरसत के क्षण
ऐसे में अब
कौन ये सोचे
जीवन प्यारा शहद-घड़ा है

--निर्मल सिद्धू

6 सितंबर 2009

६- बिखर पड़ा मन

सिमट गए दायरे
बिखर पड़ा मन
बगियाँ के सामने
ठिठक खड़ा वन।

बरगद है गमले में
कुण्‍डी में जामुन
सुआ है पिंजरे में
बिल्‍ली है आँगन
छाँव गंध नायरे
पसर गया डर
सिमट गए दायरे
बिखर पड़ा मन।

चूल्‍हा ना चौका है
जीमण ना झूठा
ऑवन में बर्गर है
फ्रीजर है मोटा
माँ न रही साथ रे
बिसर गया अन्‍न
सिमट गए दायरे
बिखर पड़ा मन।

बूढ़ी सी आँखे हैं
आँगन में झूला
परिधी में जैसे है
बेलों का जोड़ा
कोई नहीं हाय रे
झुलस रहा तन
सिमट गए दायरे
बिखर पड़ा मन।

श्रीमती अजित गुप्‍ता

५- कितना कुछ बिखरा पड़ा है

ले के बैठी जो सजाने
चीज़ें करीने से लगाने
जाने कितने तितली से दिन
और जुगनु की सी रातें
बिखर गईं ...

ले समेटूँ दौड़ कर वो
सब जो यूँ छितरा पड़ा है

जो सजाने थी चली मैं
काँच की नाज़ुक सी यादें
पाँव में पायल की रुनझुन
मां की गोदी तुतली बातें
छितर गईं...

उलटूँ पलटूँ चाव से मै
पास जो टुकड़ा पड़ा है

नई पुरानी पुस्तकों में
जाने पहचाने से चेहरे
झाँकते शब्दों के माने
कुछ सुरों के साज़ गहरे
बिखर गये...

बाँध दूँ इक तर्ज़ में अब
सब जो कुछ उधड़ा पड़ा है...

कितना कुछ बिखरा पड़ा है...

--मानसी

4 सितंबर 2009

४-कैसे बीनूँ

कैसे बीनूँ , कहाँ सहेजूँ
बाँध पिटारी किसको भेजूँ
मन क्यों इतना बिखरा पड़ा है?

खोल अटरिया काग बुलाऊँ
पूछूँ क्या संदेसा कोई?
बीच डगरिया नैन बिछाऊँ
पाहुन का अंदेसा कोई?
कैसे बंदनवार सजाऊँ
देहरी-आँगन बिखरा पड़ा है।

कोकिल गाए, आस बँधाए
भीनी पुरवा गले लगाए
किरणें छू कर अँग निखारें
रजनी गन्धा अलक बँधाए
कैसे सूनी माँग संवारूँ
कुँकुम-चन्दन बिखरा पड़ा है।

इक तो छाई रात घनेरी
दूजे बदरा बरस रहे
थर-थर काँपे देह की बाती
प्रहरी नयना तरस रहे
कैसे निंदिया आन समाए
पलकन अंजन बिखरा पड़ा है।

--शशि पाधा

3 सितंबर 2009

३- जीवन मेरा बिखरा पड़ा है

जोड़ दे आ के मुझे, जीवन मेरा बिखरा पड़ा है।

शब्द बेतरतीब हैं, बिखरी हुई है भावना
कल्पना का साथ छूटा, और टूटी कामना
स्वप्न बिखरे, यादें बिखरीं, मन मेरा बिखरा पड़ा है
जोड़ दे आ के मुझे, जीवन मेरा बिखरा पड़ा है।

दोपहर की धूप बिखरी, शान्ति बिखरी रात की
छंद बिखरे प्रीति के, लाली है बिखरी प्रात की
एक ठोकर से तेरी, कन कन मेरा बिखरा पड़ा है
जोड़ दे आ के मुझे, जीवन मेरा बिखरा पड़ा है।

तन की है दीवार टूटी, और छूटी अर्चना
आत्मा तू ले गयी, कैसे करूँ मैं वन्दना
तोड़ कर जब से गयी तू, दिल मेरा बिखरा पड़ा है
जोड़ दे आ के मुझे, जीवन मेरा बिखरा पड़ा है।

साँस की है ड़ोर टूटी, और बिखरी आस भी
प्रेम की अनुभूति छूटी, झूठ सी ये जिंदगी
छोड़ कर जब से गयी तू, प्राण ये बिखरा पड़ा है
जोड़ दे आ के मुझे, जीवन मेरा बिखरा पड़ा है।

धर्मेन्द्र कुमार सिंह `सज्जन'

2 सितंबर 2009

२- रिश्तों का व्याकरण

अनुकरण की
होड़ में अन्तःकरण चिकना घड़ा है
और रिश्तों का पुराना व्याकरण बिखरा पड़ा है।

दब गया है
कैरियर के बोझ से मासूम बचपन
अर्थ-वैभव हो गया है सफलता का सहज मापन
सफलता के
शीर्ष पर जिसके पदों का हुआ वन्दन
देखिये किस-किस की गर्दन को दबा कर वो खड़ा है।
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

शृंखलात्मक
नाटकों में समय अनुबंधित हुआ है
परिजनो से वार्ता-परिहास क्रम खंडित हुआ है
है कुटिल
तलवार अंतर्जाल का माया जगत भी
प्रगति है यह या कि फिर विध्वंस का खतरा बड़ा है।
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

नग्नता नवसंस्कृति
की भूमि में पहला चरण है
व्यक्तिगत स्वच्छ्न्दता ही प्रगतिधर्मी आचरण है
नई संस्कृति
के नये अवदान भी दिखने लगे अब
आदमी अपनी हवस की दलदलों में जा गड़ा है
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

--अमित

1 सितंबर 2009

१- भर भुजाओं में भेंटो

बिखरा पड़ा है, बने तो समेटो
अपना खड़ा,
भर भुजाओं में भेंटो

समय कह रहा है, खुशी से न फूलो
जमीं में जमा जड़, गगन पल में छू लो
उजाला दिखे तो तिमिर को न भूलो
नपना पड़ा, तो सचाई न मेटो
अपना खड़ा,
भर भुजाओं में भेंटो

सुविधा का पिंजरा, सुआ मन का बंदी
उसूलों की मंडी में छाई है मंदी
सियासत ने कर दी रवायत ही गंदी
सपना बड़ा, सच करो, मत लपेटो
अपना खड़ा,
भर भुजाओं में भेंटो

मिले दैव पथ में तो आँखें मिला लो
लिपट कीच में मन-कमल तो खिला लो
'सलिल' कोशिशों से बिगड़ता बना लो
सरहद पे सरकश न छोडो, चपेटो
अपना खड़ा,
भर भुजाओं में भेंटो

- संजीव सलिल

14 अगस्त 2009

कार्यशाला-४


बहुत दिनों से आलेख का मौसम है। सदस्यों ने बहुत कुछ नया पढ़ा-गुना है और प्रतिक्रियाओं से लगता है कि सब कार्यशाला के लिए तरसने लगे हैं तो अगली कार्यशाला का विषय यहाँ प्रस्तुत है- इस बार एक वाक्यांश को नवगीत में लाना है- बिखरा पड़ा है।

यह पंक्ति मुखड़े में हो, पूरी पंक्ति इन्हीं शब्दों की हो या बार बार इन शब्दों की आवृत्ति हो यह ज़रूरी नहीं। पूरे नवगीत में कहीं एक स्थान पर ये हों तो भी ठीक है।

क्या बिखरा पड़ा है वह सदस्य रचनाकारों को अपने आप सोचना है। सामान बिखरा पड़ा है, घर बिखरा पड़ा है, दिन बिखरा पड़ा है या कुछ और...। देखें कल्पना और रचनाशीलता रचनाकारों को कहाँ-कहाँ तक ले जाती है। नवगीत दो तीन अंतरों से अधिक लंबा न हो।

रचना भेजने की अंतिम तिथि हैं 30 अगस्त 2009। पता है- navgeetkipathshala(at)gmail.com