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16 अक्टूबर 2010

२९. सूर्य बंद कमरे से झाँके

पायल पहिन बिजुरिया नाचे
प्रेमगीत दादुरिया बाँचे
तबला मेघ बजे
राग मल्हार सजे

झर-झर-झर-झर झरने झरते
लगते गिटार से
तेज हवा से झंकृत होते
पत्ते सितार से
आनंदित हो मोर-मोरनी
निकले सजे-धजे

पर्वत अविचल सौम्य शांत है
योगी सिद्ध हुआ
सूर्य बंद कमरे से झाँके
लगता वृद्ध हुआ
नदियाँ हुई सभी अनियंत्रित
सब तटबंध तजे
--
शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

15 अक्टूबर 2010

२८. सतरंगी धनुष के संग

मोरनी सुन यह धुन
लगे जैसे
घन बजे

मन मयूर नाचे वन
सुन बूँदों की रुनझुन
दादुर, झींगे, महोख
राग पैजनि
पग बजे

है मखमली घास में
लिपटी धरा मोहती
खेत मे हैं खेतिहर
हर कहीं पर
हर सजे

आसमाँ में लग गई
चित्रकला प्रदर्शनी
सतरंगी धनुष के संग
अश्व हाथी
रथ सजे
--
उत्तम द्विवेदी

14 अक्टूबर 2010

२७. उमड़-घुमड़ कर छाये बादल

आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
श्वेत-श्याम से
नजर आ रहे मेघों के दल

कही छाँव है कहीं घूप है
इन्द्रधनुष कितना अनूप है
मनभावन रंग-
रूप बदलता जाता पल-पल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल

मम्मी भीगी, मुन्नी भीगी
दीदी जी की चुन्नी भीगी
मोटी बून्दें
बरसाती निर्मल-पावन जल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल

हरी-हरी उग गई घास है
धरती की बुझ गई प्यास है
नदियाँ-नाले
नाद सुनाते जाते कल-कल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल

बिजली नभ में चमक रही है
अपनी धुन में दमक रही है
वर्षा ऋतु में
कृषक चलाते खेतो में हल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.

13 अक्टूबर 2010

२६. उस तरफ कमरे के बाहर

रात-भर होती रही बारिश
खिड़कियों के उस तरफ कमरे के बाहर

और मैं चुपचाप तन्हा बौखलाया
सुन रहा था बादलों का शोर
भीगी-भीगी-सी हवा का एक टुकड़ा
जागती आँखों में लिखने लग गया था भोर
मुस्कुराकर नींद मेरी
सो रही थी उस तरफ कमरे के बाहर
रात-भर होती रही बारिश
खिड़कियों के उस तरफ कमरे के बाहर

मोटी-मोटी पुस्तकों के भारी-भरकम शब्द
बेवजह मुझको चिढ़ाने लग गए थे कल
धीरे-धीरे बिछ रही थी खालीपन की एक परत
कसमसाने लग गया था प्यार का संबल
हाथों की अनमिट लकीरें
जाने किसको ढूँढ़ती थीं उस तरफ कमरे के बाहर
रात-भर होती रही बारिश
खिड़कियों के उस तरफ कमरे के बाहर
--
सिद्धेश्वर सिंह

12 अक्टूबर 2010

२५. अंतस में हूक उठे

टप्-टप्-टप् बूँद गिरे
अंतस में हूक उठे
मेघ बजे

आमों की बगिया मॆं
मस्ती बौराई है
बरसेंगे गरज-ग‌रज‌
सूचना यह आई है
मत बरसो, मत बरसो
कौन कहे

झरनों की हर-हर पर‌
रीझ-रीझ जाता मन‌
गुन-गुन करते हँसते
हरे-हरे वन-उपवन
सर-सर-सर चले पवन
विटप हिले

सावन की रातों में
सजना बिन घर सूना
दिवस ढोए काँधों पर‌
रातों का दुख दूना
मन के दीपक लगते
बुझे-बुझे
--
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
१२ - शिवम् सुंदरम् नगर, छिंदवाड़ा (म.प्र.)

11 अक्टूबर 2010

२४. अमृतधारा-सा पानी

पानी-पानी-पानी
अमृतधारा-सा पानी
बिन पानी सब सूना-सूना
हर सुख का रस पानी

पावस देख पपीहा बोले
दादुर भी टर्राए
मेह आओ, ये मोर बुलाए
बादऱ घिर-घिर आए
मेघ बजे, नाचे बिजुरी
और गाए कोयल रानी
पानी-पानी-पानी

रुत बरखा की प्रीत सुहानी
भेजा पवन झकोरा
द्रुमदल झूमे, फैली सुरभि
मेघ बजे घनघोरा
गगन समंदर ले आया
धरती को देने पानी
पानी-पानी-पानी

बाँध भरे, नदिया भी छलकीं
खेत उगाए सोना
बाग-बगीचे हरे-भरे
धरती पर हरा बिछौना
मन हुलसे, पुलकित तन झंकृत
खुशी मिली अनजानी
पानी-पानी-पानी
--
आकुल
(कोटा, राजस्थान)

10 अक्टूबर 2010

२३. फिर भी है कींच

इंद्रधनुष की डोरी नभ में
सूरज आज रहा है खींच
धोबन-बदली इस धरती के
मैले वसन रही है फींच
बरस रहा है झरझर-झरझर
स्वच्छ नीर, फिर भी है कींच

चश्मे की छतरी के नीचे
बैठी आँखें इतराती हैं
आँतें आँतों को डकारकर
ना जाने क्या-क्या गाती हैं
गंगा-तट पर बैठा बगुला
दबा रहा मछली की घींच
बरस रहा है झरझर-झरझर
स्वच्छ नीर, फिर भी है कींच

रात-भर अँधेरे को पूज चुके
लोगों को नींद आ रही है
फोड़ चुकी कौवी के अंडों को
कोयल अब मुस्करा रही है
सुन लेते हैं गीत अवांछित भी
सब अपनी आँखें मींच
बरस रहा है झरझर-झरझर
स्वच्छ नीर, फिर भी है कींच
--
रावेंद्रकुमार रवि

9 अक्टूबर 2010

२२. बहके बादल-नीलगगन

घिरघिर बरसे घनघोर घटा
ढोल सम बजने लगे हैं घन
धरती पर झरनों के धारे
बहक रहे बादल-नीलगगन

लिखें हल भूमि नवऋचाएँ
अंकुर हुलसित पेंग बढाएँ
धानी चूनर ओढ़े धरती
कृषकों के खिल रहें हैं मन

मेघों ने तबले सँभाले
कविता गाएँ नदिया-नाले
मस्त होकर नाचे मयूरा
विजन वन लगने लगे नंदन

बूँदे रच रहीं छंद मन में
आशाएँ सिंचित जनगण में
टहनी चंचल बनी हिंडोला
बन बचपन किलक रहा यौवन
--
वंदना सिंह
(सीकर, राजस्थान)

8 अक्टूबर 2010

२१. मेघ बरसे

काली घटाओं के साए
बादल फिर लहराए
सुशुप्त धरा के आँगन में
उमड़–घुमड़ मेघ बरसे

तरु के बल कारवट लेती
पुष्पमुख मुस्कुराती
सरोज सरोवर में अँगड़ाई लेकर
नदिया–का आँचल लहराती
मौन सिंदूरी के आँगन में
उमड़–घुमड़ मेघ बरसे

हरियाली का वस्त्र पहन
स्वर्ण मौक्तिक शृंगार किया
विहंगम कलरव के साज पर
ऋतु आरंभ का उत्सव किया
आभूषित बाला के आँगन में
उमड़–घुमड़ मेघ बरसे
--
हेमेंद्र जर्मा

7 अक्टूबर 2010

२०. इतना मत तरसा :

इतना मत तरसा
यार, कुछ बूंदें तो बरसा

इतनी गरमी हाय पसीना
दिन बदरंग हो गया कारी
टेर रहा है मोर और
लगी सूखने है फुलवारी
कुछ भीगेंगे कुछ नाचेंगे
कहरवा, कजरी को हरसा

दृष्टि जहाँ तक सृष्टि हँसेगी
डाल-डाल पर झूले
दिन की बारहमासी
रातोंरात मल्हारें छूले
मत टँग आसमान में मैले
झर तू झर-झर-सा

धूल बनोगे या एक मोती
या वारिधि का संग
सब कुछ भला-भला-सा होगा
आओ, जैसे गंग
घर से निकले हो तो
मन में ऐसा क्यों डर-सा
--
क्षेत्रपाल शर्मा
(नई दिल्ली)

6 अक्टूबर 2010

१९. मेघ बजे रे : संजीव सलिल

मेघ बजे, मेघ बजे
मेघ बजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे

सोई थी सलिला
अंगड़ाई ले जगी
दादुर की टेर सुनी
प्रीत में पगी
मन-मयूर नाचता
न वर्जना सुने
मुरझाये पत्तों को
मिली ज़िंदगी
झूम-झूम झर झरने
करें मजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे

कागज़ की नौका
पतवार बिन बही
पनघट-खलिहानों की
कथा अनकही
नुक्कड़, अमराई
खेत, चौपालें तर
बरखा से विरह-अगन
तपन मिट रही
सजनी पथ हेर-हेर
धीर तजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे

मेंहदी उपवास रखे
तीजा का मौन
सातें-संतान व्रत
बिसरे माँ कौन
छत्ता-बरसाती से
मिल रहा गले
सीतता रसोई में
शक्कर संग नौन
खों-खों कर बऊ-दद्दा
राम भजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे
--
संजीव सलिल

5 अक्टूबर 2010

१८. आ गया दालान तक पानी : डॉ.सुभाष राय

मेघ आए
हम चलें भीगें कि
अपना घर बचाएँ
नींव है कमजोर
डर है ढह न जाए

प्यास से जब कंठ सूखे
गाँव के, बरसे न ये घट
आदमी जैसे भरोसा
खो चुके हैं नीर के नट
हो गए हैं अर्थ
ऋतुओं के निरर्थक
जिंदगी के गीत रूठे
किस तरह गाएँ

आ गया दालान तक
पानी गली को पारकर
एक चादर थी, हुई गीली
न सोया हारकर
बिस्तरे, बर्तन हुए हैं
नाव, आँगन ताल
डूबकर इसमें जिएँ
या डूब जाएँ

दर्द के झूले, अभावों ने
रची कजरी हमारी
जेठ सावन पर हमेशा
ही पड़ी है भूख भारी
जागना जिनको वही
सोए हुए हैं तानकर
मेह बरसे आग
शायद जाग जाएँ

बहुत गहरे एक बादल
गरजता मेरे हृदय में
उठ रहा तूफान बनकर
हौसले जैसा प्रलय में
बाढ़ दुख की बह चली तो
रोक पाएगा न कोई
और कब तक हम सहें
वे जुल्म ढाएँ
--
डॉ. सुभाष राय
ए-१५८, एम आई जी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा (उ.प्र.)
फ़ोन-०९९२७५००५४१

4 अक्टूबर 2010

१७. मन में आग लगाए रे : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"

चौमासे में आसमान में
घिर-घिर बादल आए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे


उनके लिए सुखद चौमासा
पास बसे जिनके प्रियतम
कुण्ठित हैं उनकी अभिलाषा
दूर बसे जिनके साजन
वैरिन बदली खारे जल को
नयनों से बरसाए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे


पुरवा की जब पड़ीं फुहारें
ताप धरा का बहुत बढ़ा
मस्त हवाओं के आने से
मन का पारा बहुत चढ़ा
नील-गगन के इन्द्रधनुष भी
मन को नहीं सुहाए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे


जिनके घर पक्के-पक्के हैं
बारिश उनका ताप हरे
जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं
उनके आँगन पंक भरे
कंगाली में आटा गीला
हर-पल भूख सताए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308

3 अक्टूबर 2010

१६. धूल भरी राहों में : निर्मला जोशी

धूल-भरी राहों में तपते
भूले पल-छिन अपने को
कजरारे बादल अम्बर पर
ले आए फिर सपने को

सुधियों को जैसे सुध आई
अकुलाकर पीछे देखा
खिंच गई तभी अन्तर में
वह खोई स्वर्णिम रेखा
कोरा कागज निखरा जैसे
रंग-तरंगें छपने को

शीतल संदेशों से नभ की
भर आई फिर गागर है
धड़कन में उतर गया रस का
लहरों वाला सागर है
जाग उठी हैं सोई सासें
जीवन–जीवन जपने को

बन्द अधर पर चुम्बन-जैसी
अमृत की उपमाओं की
विजय पताकाएँ फहरातीं
मुरझाई तृष्णाओं की
रिमझिमवाली चकाचौंध से
बेसुध आँखें झपने को
--
निर्मला जोशी

2 अक्टूबर 2010

१५. ओ बदरा रे, मेघा रे : शारदा मोंगा

बन-बन, डार-डार, मेघा रे
ओ बदरा रे, मेघा रे

उमड़-घुमड़कर बदरा बरसे
बिजुरी चमके, दामिनी दरसे
दादुर, मोर, पपीहा बोले
मनवा डोले होले-होले
गड़-गड़ गरजे, रिमझिम बरसे
इन्द्रधनुष सतरंगी रे
ओ बदरा रे, मेघा रे

कारी घटा घन फिर उमड़ावत
पपीहा बोले मन घबरावत
लरज-लरज बदरिया बरसे
हिय में सुधि प्रियतम की सरसे
मेघ, मल्हार, बजे बंसुरिया
राधा सँग नाचे साँवरिया
ओ बदरा रे, मेघा रे
--
शारदा मोंगा

1 अक्टूबर 2010

१४. बरखा हौले-हौले आओ : डॉ.त्रिमोहन तरल

छत पर
टीन पुरानी, उसको
तड़-तड़ नहीं बजाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

मज़दूरन माँ
हाड़ तोड़कर
थोड़ा-बहुत कमा लाई है
रूखा-सूखा
खिला-पिला
मुन्नी को अभी सुला पाई है
ख़ुद जग लेगी
पर उसकी
गुड़िया को नहीं जगाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

गुड़िया का
बापू भी यों तो
ज़्यादा नहीं कमा पाता है
उसी पुरानी
छत से, बापू
के बापू तक का नाता है
टीन बदलवाकर
यादों से
रिश्ता मत तुड़वाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

बूँदा-बाँदी
में तो काफी
काम यहाँ चलते रहते हैं
निपट दिहाड़ी
मज़दूरों के
बच्चे भी पलते रहते हैं
तेज़ बरसकर
बेचारों का
काम नहीं रुकवाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

उपवन में
धीरे-धीरे
आना भी तो आना होता है
कोमल कलियों
को हलके
हाथों से सहलाना होता है
जितना सहन
कर सकें कलियाँ
उतना प्यार लुटाओ
बरखा! हौले-हौले आओ
--
डॉ.त्रिमोहन तरल

30 सितंबर 2010

१३. मेघ बरसो रे : कमलेशकुमार दीवान

मेघ बरसो रे
प्यासे देश
वहाँ सब रीत गए
ताल-तलैया-नदियाँ सूखीं
रीता हिया का नेह
मेघ बरसो रे
पिया के देश
वहाँ सब बीत गए

कुम्हलाए हैं
कमल-कुमुदनी
घास-पात और देह
उड़-उड़ टेर लगाए पपीहा
होते गए विदेह
मेघ हर्षो रे
प्यासे देश
यहाँ सब रीत गए
--
कमलेशकुमार दीवान

28 सितंबर 2010

१२. मेघ डाकिया : पं.गिरिमोहन गुरु

ले आया पावस के पत्र
मेघ डाकिया

मौसम ने धूप दी उतार
पहन लिए बूँदों के गहने
खेतों में झोंपड़ी बना
कहीं-कहीं घास लगी रहने
बिना पिए तृषित पपीहा
कह उठा पिया-पिया-पिया

झींगुर के सामूहिक स्वर
रातों के होंठ लगे छूने
दादुर के बच्चों का शोर
तोड़ रहे सन्नाटे सूने
करुणा प्लावित हुई घटा
अंबर ने क्या नहीं दिया
--
पं.गिरिमोहन गुरु

26 सितंबर 2010

११. हर ओर जिया हरसाए रे : शंभु शरण "मंडल"

मेघ बजे घनघोर सखी
हर ओर जिया हरसाए रे
पहली-पहली बार पिया
ज्यों घूँघट-पट अलगाए रे

करधर के करतल धुन सुनके
ताल नदी करछाल करे
पनसोई लहरों पर नाचे
सुतल आस जगाए रे

हरियाई मुरझाई छाती
बूदों की पाती पढ़के
बुलबुल बाँचे बैठ रुबाई
कोयल कजरी गाए रे

बौछारों की डोर में बंधके
वर अंबर धरती गोरी
साखी में बादल बिजुली के
फेरे सात लगाए रे

घट-घट पनघट छलके जैसे
नैनन से मनुहार करे
बनपाती बन जाए घाती
देख मुझे बउराए रे

प्रेमपचीसी खेले झींसी
गालों से ढलके हलके
मन फूले वनफूल बदन
संतूर हुआ अब जाए रे
--
शंभु शरण "मंडल"
धनबाद (झारखंड)

24 सितंबर 2010

१०. बहुत हुआ पानी : सिद्धेश्वर सिंह

बहुत हुई बारिश, बहुत हुआ पानी
खत्म करो बादल जी, अब ये कहानी

धँस रही हैं सड़के
दरके पहाड़
हरियाये खेतों में
आ गई है बाढ़
इंद्रदेव वापस लें, ऐसी मेहरबानी
खत्म करो बादल जी, अब ये कहानी

बंद हुए बच्चों के
सारे स्कूल
कैद हो घरों में
खेल गए भूल
जल से है त्रस्त अब, हर एक प्राणी
खत्म करो बादल जी, अब ये कहानी

कवियों को प्यारा है
पावस का मास
किन्तु अतिवॄष्टि ने
छीना उल्लास

मेघ बजें, पर न आयें बरखा महारानी
खत्म करो बादल जी, अब ये कहानी
--
सिद्धेश्वर सिंह