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7 मई 2011

प्रतिक्रिया- कार्यशाला-१५

नवगीत पाठशाला- १५ में शामिल मेरे दोनों नवगीतों को जिस स्नेह से कवि-बन्धुओं ने स्वीकारा-दुलारा, उसके लिए मैं उन सभी का आभारी हूँ। 'अभिव्यक्ति-अनुभूति' परिवार का भी आभार, जिन्होंने मेरी कविताओं को सबके लिए सुलभ बनाया। नवगीतों की इस पाठशाला में नये कथ्य और उसकी कहन की कई नई बानगियों से परिचय हुआ। कुछ रचनाओं को छोड़कर अधिकांश ने प्रभावित किया। मेरा एक विनम्र निवेदन है पाठशाला के संयोजक-संपादकों से कि वे विषय तो दें, किन्तु इसे समस्या-पूर्ति की तरह किन्हीं शब्दों या वाक्यांशों से बाँधें नहीं। संभवतः कई समर्थ और स्थापित नवगीत-रचनाकार इसी बंदिश की वज़ह से पाठशाला से जुड़ने में संकोच करते हैं और उनकी प्रेरक एवं समृद्ध कहन से नये रचनाकार वंचित रह जाते हैं। साथ ही इससे एक प्रकार के रीतिकालिक काव्य-विधान को भी बल मिलता है। आज की कविता सहजता की हिमायती है और उसकी स्वाभाविकता ही उसकी पहचान है।

स्नेह-नमन सहित
आपका
कुमार रवीन्द्र

2 मई 2011

२९. बस इतना सा समाचार है

बस इतना सा समाचार है

घूरे पर बैठा बच्चा
खाने को कुछ भी बीन रहा है
लगता है बिधना से लड़कर
अपना जीवन छीन रहा है
क्या इसको भी जीना कहते
आता मन में यह विचार है
बस इतना सा समाचार है

अपने बालों के झुरमुट से
जाने क्या वो खींच रही है
बूढ़ी दादी गिने झुर्रियाँ
गले मसूढे भींच रही है
जीने की इच्छा तो मृत है
मरने तक ज़िंदगी भार है
बस इतना सा समाचार है

बिटिया की शादी सर पर है
कैसे बेड़ा पार लगेगा
कुछ दहेज़ तो देना होगा
वरना सब बेकार लगेगा
रिश्तेदार कसेंगे ताने
अपनी बिटिया बनी भार है
बस इतना सा समाचार है

अब की बार फसल अच्छी हो
तो कुछ घर में काम कराऊँ
टपक रही झोपडी इसे भी
नए प्लास्टिक से ढंकवाऊँ
कई दिनों से खांस रहा हूँ
छोटी बिटिया को बुखार है
बस इतना सा समाचार है

शेषधर तिवारी
(इलाहाबाद)

28 अप्रैल 2011

२८. देश की हालत में अब सुधार है

अभी अभी मिला एक
अपुष्ट समाचार है,
देश की हालत में अब
कुछ कुछ सुधार है

भूखों को कहीं कहीं
अब रोटी हुई नसीब,
गरीबी नही बढी उनकी
जो पहले भी थे गरीब,
कुछ भ्रष्टों को सता रहा
अब स्वयं भ्रष्टाचार है,
देश की हालत में अब
कुछ कुछ सुधार है

पहले लगाते थे कुछ
शिष्ट सभ्य एक ’जी’
अब दो ’जी’, तीन ’जी’
पर भी लुटाने को हैं राजी
काली कमाई की खातिर
बढा ’जी’ शिष्टाचार है
देश की हालत में अब
कुछ कुछ सुधार है
 
(ओंम प्रकाश नौटियाल- वडोदरा , गुजरात)

27 अप्रैल 2011

२७. सुनें समाचार, बंधु

राजा के
घर में है
हर दिन त्योहार, बंधु
सुनें समाचार, बंधु

विपदाएँ सारी ही
परजा के भाग बदीं
राजा का दोष नहीं
नदियाँ हैं कीच-लदीं

चढ़ा प्रजा के
सिर पर
कर्ज़े का भार, बंधु
सुनें समाचार, बंधु

रामराज रहा सिर्फ
पुरखों के किस्से में
आया वनवास सदा
सीता के हिस्से में

लक्ष्मण जा बसे
-खबर -हैं
सागर-पार, बंधु
सुनें समाचार, बंधु

शहज़ादा चतुर बड़ा
गली-गाँव घूम रहा
सबके घर भरें-पुरें
उसने हर जगह कहा

जहाँ गया
वहीं सभी
उजड़े घर-बार, बंधु
सुनें समाचार, बंधु

--कुमार रवीन्द्र

26 अप्रैल 2011

२६. बस इतना सा समाचार है

जितना अधिक पचाया जिसने
उतनी ही छोटी डकार है
बस इतना सा समाचार है

निर्धन देश धनी रखवाले
भाई चाचा बीवी साले
सबने मिलकर डाके डाले
शेष बचा सो राम हवाले
फिर भी साँस ले रहा अब तक
कोई दैवी चमत्कार है
बस इतना सा समाचार है

चादर कितनी फटी पुरानी
पैबन्दों में खींचा-तानी
लाठी की चलती मनमानी
हैं तटस्थ सब ज्ञानी-ध्यानी
जितना ऊँचा घूर, दूर तक
उतनी मुर्ग़े की पुकार है
बस इतना सा समाचार है

पढ़े लिखे सब फेल हो गये
कोल्हू के से बैल हो गये
चमचा, मक्खन तेल हो गये
समीकरण बेमेल हो गये
तिकड़म की कमन्द पर चढ़कर
सिद्ध-जुआरी किला-पार है

जन्तर-मन्तर टोटका टोना
बाँधा घर का कोना-कोना
सोने के बिस्तर पर सोना
जेल-कचेहरी से क्या होना
करे अदालत जब तक निर्णय
धन-कुनबा सब सिन्धु-पार है

मन को ढाढस लाख बधाऊँ
चमकीले सपने दिखलाऊँ
परी देश की कथा सुनाऊँ
घिसी वीर-गाथायें गाऊँ
किस खम्भे पर करूँ भरोसा
सब पर दीमक की कतार है

-अमित
(इलाहाबाद)

25 अप्रैल 2011

२५. समाचार है

समाचार है आज नेता शर्माने वाला है
सावधान रह जनता, भूकंप आने वाला है
मन मलीन कुल कुलीन भरमाने वाला है

लूट भर लिये घर अपने तोड़ जनतन के सपने
अब नये स्वप्न नये कलेवर में, सुनाने वाला है
मन मलीन कुल कुलीन भरमाने वाला है
समाचार है आज नेता शर्माने वाला है

हर वक्त इस जुगाड़ में शक्ति रहे सदा पास में
कपटी गोधुली बेला में सज्जित आने वाला है
मन मलीन कुल कुलीन भरमाने वाला है
समाचार है आज नेता शर्माने वाला है

जनार्दन का रुप धरकर शैतान चला तेरे पथ
कर सत्कार रख मन विकार, तरसाने वाला है
मन मलीन कुल कुलीन भरमाने वाला है
समाचार है आज नेता शर्माने वाला है
-विनोद बिस्सा
(रायपुर)

24 अप्रैल 2011

२४. ताजा समाचार यह भाई

ताज़ा समाचार यह भाई,
प्रकृति आज जिद पर आई,

समुद्र देवता भये क्रुद्ध,
प्रकृति हुई ऐसी विरुद्ध,
भूचाल के लगे झटके,
फूं फूं शेषनाग सर पटके,
सुनामी महाकाली आई--
ताज़ा समाचार यह भाई,

भूमि थर थर रही कांपने,
कुपित समुद्र लगा हांफने,
परमाणु दानव ने हुंकारा
लगा सुनामी का फुंकारा
हजारों मानव चट कर गई
ताज़ा समाचार यह भाई,

सुनो समाचार घोटालों का,
स्वदेश को बेचने वालों का,
कलमाड़ी, हसन, ए.राजा,
देशको लूट के ही खा जा,
राजनीति पैसा हजम कर गई
ताज़ा समाचार यह भाई,

'ओनर किल्लिंग' की परम्परा,
बनी समाचारों की संपदा,
नहीं सुरक्षित सडक पर नारी,
महिलाओं को स्वतंत्रता भारी,
बाहर जायें तो मौत है आई,
ताज़ा समाचार यह भाई...

-शारदा मोंगा
(ऑकलैंड, न्यूजीलैंड)

23 अप्रैल 2011

२३. खोल देते पिटारे

खोल देते पिटारे
अपठनीय होते
पठनीय हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

दुनियाँ की दौड़-धूप में
उलझे-उलझे सुलझे
गाँव महानगरों में सिमटे
खोल देते पिटारे
मौन के स्वर हैं
गूँजते हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

हैं सम्बन्धों के शत्रु-मित्र
शंकाओं के बीज, और
दौड़ते रहते अहर्निश
युगों से कितने समर्पित-
गगन से झाँकते
सूर्य के हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

मुखौटे झूठे-सच्चे
चेहरा दिखाते, दर्पण हैं
दुनिया को मुट्ठी में रखते
बड़े विचित्र, बड़े विशाल -
पकड़ में न आते
अपरिचित हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

- निर्मला जोशी
(भोपाल)

22 अप्रैल 2011

२२. ताजे समाचार हैं नए समाचार हैं

ताजे समाचार हैं नए समाचार हैं

अति विचित्र सृष्टि की माया
देख समंदर क्यों उफनाया
अतिक्रमण अब नहीं सहेगा सागर भी तैयार है
ताजे समाचार अब नए समाचार हैं

धर्म-कर्म और न्यायशीलता
सच्चाई ईमान साथ में
जा पहुँचे फिर शब्दकोष में कर रहे विहार हैं
ताजे समाचार हैं नए समाचार हैं

कविगण छंदमुक्त के कायल
बंधन करते सबको घायल
पिंगल के पचड़े को छोड़ो मुक्त छंद भरमार हैं
ताजे समाचार हैं नए समाचार हैं


--अम्बरीष श्रीवास्तव
(सीतापुर)

21 अप्रैल 2011

२१. हर सुबहा के समाचार में

हर सुबहा के समाचार में

हर सुबहा के
समाचार में
ख़बर यही बस एक रही

कितनी हत्याएँ और चोरी
कहाँ डकैती आज पडी
बलात्कार से कितनी सड़कें
फिर से देखों आज सडीं
मानवता रो रही अकेली
नयनों में लग गयी झड़ी
भरे चौराहे खडी द्रोपदी
अंतर विपदा रहे खडी

कोर नयन की
भीगी भीगी
सुबह से ही जगी रही

खार हुए वो प्रेम प्रेम के
खेतों की फसलें सारी
क्यूँ अग्नि में झोंकी जाती
वो ममता मूरत प्यारी
भाई चारा दिखे कहीं ना
एक पंक्ति भी मिले नहीं
कैसी है ये पीड़ा मन की
बन जाती नदिया खारी

मन के बरगद
धूप पसरती
छैय्याँ मन की ठगी रही

समाचार को हुआ है क्या
कौन किसे समझायेगा,
फिर वो ही पनघट की बातें
औ चौपालें लायेगा
बुझे हुए हर मन के अंदर
जला आस्था की ज्योति
मुस्कानों के फूल खिलाता
हर एक द्वारे जाएगा

मन मंदिर है
प्रेम का मीते !
बात यही मन सगी रही

-गीता पंडित
दिल्ली ( एन सी आर )

20 अप्रैल 2011

२०. समाचार के बाजे बजते

ढोल पीट कर
पोत लीप कर
समाचार के बाजे बजते
सच के कोई मूल्य न बचते

बिके मीडिया के महामहिम
टीवी पर हावी है पश्चिम
जश्न हो रहा है सातों दिन
चमक दमक में भूले रहकर
आम जनों के कटें न दुर्दिन

फिल्म दिखा कर
क्रिकेट खिला कर
दुख पर मरहम पट्टी रखते
दर्द देश के जरा न घटते

अपनी भाषा लगी ठिकाने
अपने सारे पर्व बिराने
अपनों से ही गए ठगाने
हम तो केवल कठपुतली है
गाते हैं अँगरेजी गाने

खाल खींच कर
आँख मीच कर
डालर को जेबों में भरते
स्वाभिमान के चिथड़े करते

-पूर्णिमा वर्मन
(शारजाह, संयुक्त अरब इमारात)

१९. समाचार में हमने ढूँढा

खाली पेट
दम तोड़ गए जो
फुटपाथों पर
लेख विधि ने
था लिख क्या बाँचा
उन हाथों पर
समाचार में हमने ढूँढ़ा

दीप द्वारे
धर बाट निहारी
पर रात हुई
चौखट पर
रुक पिंघला था मन
बरसात हुई
अश्रुधार में हमने ढूँढ़ा

नदी तट पर
हम आ पहुँचे थे
विश्वासों पर
बन्दिश मिली
हमको भी अपने
ही साँसों पर
मझधार में हमने ढूँढ़ा

-रामेश्वर कांबोज हिमांशु
(नई दिल्ली)

18 अप्रैल 2011

१८. सपने में जो देखा

कुदरत का यह लेखा
सपने में जो देखा
सुबह वही तो समाचार है

ताक-झाँक की थी पड़ोस में
’विकिलिक्स’ अखबार में छाये
टपकी लार बनी ईंधन तो
भट्टी खुद ही जलती जाये

लावा बहे दनादन
रीता घट रोता मन
छपी खबर का यही सार है

गाली मन में दबी पड़ी थी
गोली बन कर निकल पड़ी है
ख़्वाबों में जो लाश बिछाई
मौत सामने तनी खड़ी है

दिवास्वप्न तो दूर
अंतस् का दर्पण चूर
भीतर गहरा अंधकार है |

-हरिहर झा
(मेलबर्न, आस्ट्रेलिया)

१७. समाचार है

समाचार है
अच्छा मौसम आने वाला है
समाचार है
फिर से होने लगा उजाला है


धुप चटकती, इतराती है
छाँव थकी है, सुस्ताती है
तारकोल की महक उडी है
फुलमतिया भी वहीँ खड़ी है
सड़क किनारे
साडी वाला पलना डाला है


दौड़े खूब कचूमर निकला
दफ्तर दफ्तर भागे अगला
चाय पकौड़े दाना, पानी,
टेबल, कुर्सी सब मनमानी
खड़ा द्वार पर
जैसे कोई फेरी वाला है


फिर से छीने गए निवाले
सब के सब थे तकने वाले
आस उगी है ये बेहतर है
शायद उसका मन पत्थर है
या फिर वह
बाहर से गोरा भीतर काला है

-राणा प्रताप सिंह
जम्मू

17 अप्रैल 2011

१६. आज के यही समाचार हैं

द्वंद-द्वेष-दुख दुराचार हैं
भाँति भाँति के हहाकार हैं
आज के यही समाचार हैं

वोट दे रहे औ ठगा रहे
टेक्स भर रहे, कष्ट पा रहे
लीडरान से मात खा रहे
यूँ लगे कि ज्यूँ गुन्‍हागार हैं
आज के यही समाचार हैं

रौबदार सब कोट-टाइयाँ
लोकतंत्र की दे दुहाइयाँ
गल्फ़ में लड़ाते लड़ाइयाँ
निम्न, तेल से, रक्त-धार हैं
आज के यही समाचार हैं

डिग्रियाँ बनीं फाँस कंठ की
आज सब सुनें बात संठ की
लुप्त हो रही जाति लंठ की
सुप्तप्राय से सरोकार हैं
आज के यही समाचार हैं

-नवीन चतुर्वेदी
(मुंबई)

16 अप्रैल 2011

१५. खबर छपी अखबारों में

साहित्यिक गतिविधियाँ सारी
हुई लुप्त अंधियारों में
हत्या और बलात्-कर्म की
खबर छपी अखबारों मे

तानाशाही और मनमानी
चौथा खम्भा करता है
छँठे हुए इन पढ़े लिखों से
तन्त्र प्रजा का डरता है
तूती की आवाज़ दब गई
कर्कश ढोल-नगाड़ो में

कोकिल के मीठे सुर केवल
डाली तक ही सीमित है
गंगा जी की पावन धारा
मैली सी है-दूषित है
काग सुनाते बेढंगे स्वर
आँगन और चौबारों में

समाचार हैं घिसे-पिटे से
विज्ञापन से भरे पृष्ठ हैं
रोज-रोज वो ही छाये हैं
जो दुनिया में महाभ्रष्ट हैं
नाच रही है नग्न नर्तकी
सड़क और गलियारों में

-रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
(खटीमा, उत्तराखंड, भारत)

14 अप्रैल 2011

१४. ये है समाचार

संसद में सरकार
अदालत में तलवार
दोनों लाचार
ये है समाचार

मोहाली में हल्ला
सचिन का बल्ला
सोहैब बीमार
ये है समाचार

पाक से समीकरण
पी एम का निमंत्रण
गिलानी को स्वीकार
ये है समाचार

विकी लीक्स की मार
दोधारी तलवार
सब पर ही वार
ये है समाचार

- महेंद्र आर्य
(मुंबई)

13 अप्रैल 2011

१३. सुनो ! सुनो ! ये समाचार है

सूखे पर्वत घटा बिरानी
मौसम भी लाचार है
सुनो ! सुनो ! ये समाचार है

सड़क ओढ़
पगडंडी सोए
उस पर सत्ता काँटे बोए
ज़ख़्मी आँचल
सपने खोए
ममता सिसके आँसू रोए

दिन निकालकर घूँघट घूमे
रात बिकी बाजार है
सुनो ! सुनो ! ये समाचार है

शब्द खेलते गुल्ली डंडा
कलम सिसकती रोती है
सच जब घायल
हो जाता है
रूह दर्द में खोती है

अंधा बहरा हुआ न्याय जब
सुनता कौन गुहार है
सुनो ! सुनो ! ये समाचार है

रचना श्रीवास्तव
(डलास यू.एस.)

12 अप्रैल 2011

१२. समाचार है

समाचार है आज मंच से
रोटी बोलेगी
भरे पेट के भेद सभी
श्रीमुख से खोलेगी

भीत‌र‌ माल स‌त‌ह‌ से त‌ह‌ त‌क‌
भ‌रा ठ‌साठ‌स‌ है
तिन‌का भ‌र‌ भी र‌ख‌ पाने को
न‌हीं ज‌ग‌ह‌ अब‌ है
भानुम‌ती का अज‌ब‌ पिटारा
पेट‌ ब‌ना डाला
स‌च्चाई ईमान‌ स‌द‌ विचारों को
खा डाला
आज‌ प‌ते की बात‌ ह‌वा
क‌ण‌ क‌ण‌ में घोलेगी


खाने और अधिक खाने की
होड़ मची कैसी
सतयुग त्रेता द्वापर में भी
नहीं दिखी वैसी
लगता है कि आसमान
धरती को पा लेगा
अपनी निष्ठुर बाहों में
स‍पूर्ण‌ समा लेगा
रोटी अब‌ भी म‌न‌ ही म‌न‌
क्या अंसुअन‌ रो लेगी?


न‌दी दौड़्ती जाती है
साग‌र‌ से मिल‌ने को
डाल‌ डाल‌ प‌र‌ क‌लियाँ
दिख‌तीं उत्सुक‌ खिल‌ने को
प‌र‌म‌ पिता से मिल‌ने को
क‌ण‌ क‌ण‌ म‌त‌वाला है
आँखों प‌र‌ क्यों इंसानों ने
प‌र‌दा डाला है?
भ्रमित‌ आत्मा भ्रम‌ के
जंग‌ल‌ जंग‌ल‌ डोलेगी

-प्रभु दयाल
(छिंदवाड़ा)

११. अखबारों के भीतर

दादा जी की आँखें बूढ़ी होकर भी
अखबारों के भीतर गड़ती जाती हैं
समाचार में निहित भाव से हिलमिल कर
अंतरमन में जाने क्या बतियाती हैं

एक जमाना ऐसा था जब
खबर खुशनुमा आती थी
सुबह-सवेरे चाय की चुस्की
ज्ञान सुधा भर जाती थी

लेकिन आज समय है बे-कल
खबरों पर रफ्तार की दंगल
सेक्स, ग्लैमर, औ' खून-खराबा
खबर गई बस इतने में ढल

पैसों में बिकती है पाई जाती है
न्यूज रूम में खबर बनाई जाती है


शब्दों के व्यवहार हैं रूखे
समाचार हैं एड सरीखे
मालिक संपादक बन बैठे
कोई भला क्या इनसे सीखे

जो थे कभी ज्ञान की कुंजी
हावी वहाँ आज है पूँजी
सरस्वती पर लक्ष्मी भारी
माल-मुनाफे में सब धूँजी

खबरों से बेरूखी दिखाई जाती है
सिर्फ लाभ की बीन बजाई जाती है

नियति वर्मा
(इंदौर)