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10 अगस्त 2009

नवगीत की भाषा- गुज़रना एक अनुभव से

पाठशाला के सदस्य और सहयोगी संजीव गौतम ने नवगीत की भाषा के विषय में एक बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं संवेदनशील टिप्पणी कहिए या संस्मरण, लिखा है। यहाँ उसे एक पोस्ट के रूप में प्रस्तुत कर रही हूँ ताकि सभी इसे ध्यान से पढ़ लें। कहीं किसी से यह छूट न जाय। यह इसलिए आवश्यक है हम सब साहित्य के विद्यार्थियों के सामने इस तरह की कठिनाइयाँ आती हैं। इन कठिनायों के पार जाकर ही नवसृजन का रास्ता खुलता है। -- पूर्णिमा वर्मन
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मैं सबको नवगीत के विषय मैं अपने अनुभव से गुज़ारना चाहता हूं यदि आप इज़ाज़त दें-बात यूं है कि मैंने एम.एम.हिंदी से किया और उसके बाद कविताओं का चस्का लग गया। शुरूआत एक-दो मुक्तछ्न्द के बाद गीतों से हुई। चूँकि कविताओं से सही परिचय एम.ए. में ही हुआ था तो वही काव्य भाषा मन में समायी हुई थी। जैसे-
बस एक रश्मि स्वर्णवर्णी
हो स्फरित सविता दृगों से।
पैठ धरती में गयी उर में किसी के,
नव दीप्ति कर दी प्रज्ज्वलित।
और
नेहसिक्त कर स्पर्शों को
अश्रु से भीगे चक्षुओं को..आदि-आदि

इस छायावादी भाषा के साथ गीत लेखन लगभग तीन वर्ष तक किया। नये अच्छे संकलन ज़्यादा पढे नहीं थे, आगरा में सोम जी के अलावा नवगीत नाम से ही ज़्यादा परिचय नहीं था। गोष्ठियों में भी नवगीत नाम से कोई गीत नहीं सुनाता था। एक दिन भाई कुमार ललित ने बताया कि तीन संकलन पढने का मन है-
1-यश मालवीय जी का 'कहो सदाशिव',
2-कैलाश गौतम जी का 'सर पर आग' तथा
3-अतुल कनक जी का शायद 'पूर्वा'.

कुछ दिन बाद दिल्ली में 'कहो सदाशिव' संकलन मिल गया। पूरे संकलन की फोटोस्टेट करायी और संकलन ललित भाई को बेच दिया। संकलन को पढा। पढा क्या पूरा संकलन मन में इतने गहरे उतर गया कि एम. ए. की भाषा न जाने कहाँ गायब हो गयी एक दूसरी ही भाषा सामने थी। आप भी उस संकलन के कुछ गीतों के नमूने देखें-

तुम किताब से धरे मेज़ पर
पिछले सालों से....

तुम अलबम से दबे पांव जब बाहर आते हो....

यदा कदा वह डाँट तुम्हारी
मीठी सी.
घोर शीत में जग जाती है याद अंगीठी सी।

और
गीत को स्वेटर सरीखा बुन रहा हूं।
समय की पदचाप जैसे सुन रहा हूं।

एक और देखें-
सुबह सुबह की आपाधापी भाप भरा संवाद।
नरभक्षी मौसम के मुंह फिर लगा ख़ून का स्वाद।

ये देखें-
मां तो झुलसी फसल हो गयी।
कैसी अपनी नसल हो गयी।

इसे देखिये-
कितनी मुंहजोर हवा ढीठ घुडसवार सी।
फिर भी है मौन सदी गीली दीवार सी।
हल हुई समस्या के कोरे समझौते।
भाई चारा पहने सैकडों मुखौटे।
प्यार नहीं हिन्दी या उर्दू या फारसी।
बडे मुंह अंधेरे ही घटना-दुर्घटना।
घर आंगन बंटे हुए अमृतसर-पटना।
ट्रेन लडी कटनी या जबलपुर इटारसी।

और ये मासूम चित्र देखिये संवेदनाओं से भरा-
हिलते रहे हरे पत्तों से नन्हे हाथ तुम्हारे।
दफ़्तर जाना ही था पापा क्या करते बेचारे।

कुछ समय बाद जब इलाहाबाद यश जी के घर पर उनसे मुलाकात हुई तो लगभग दो घंटे बाद जब नीचे उतर कर आये तो उन्होंने अपनी माताजी से मिलवाते हुए कहा अम्मा ये संजीव हैं इन्हें कहो सदा शिव के सारे गीत याद हैं! उसके बाद फिर तो ढूंढ कर नवगीत संकलन पढे-
दादा नईम-पंख झुलसाकर गिरा सम्पाती धरा पर आंख सूरज से मिलाने का नतीज़ा है. श्रद्धेय माहेश्वर तिवारी, विद्यानन्दन राजीव, भारत भूषण. कैलाश गौतम, उमाकांत मालवीय, वसु मालवीय, सुधांशु उपाध्याय, वीरेन्द्र मिश्र, मुकुट बिहारी सरोज,देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, सोम ठाकुर,नचिकेता, कुमार रवीन्द्र, महेन्द्र नेह, शम्भु नाथ सिंह आदि-आदि के नवगीतों को पढने और सुनने का अवसर मिला।

मेरा ये सब लिखने का आशय सिर्फ़ इतना कहना था कि जो बात बडे-बडे लेख, आलेख, निबन्ध, विद्वान नहीं समझा पाते वो सब उदाहरण समझा जाते हैं। अपने भीतर कुछ नया समाहित करने के लिये उससे सम्बन्धित पुराने से मोह का त्याग करना पडता है। अगर पहले से ही मान लें कि हमारी मुट्ठी तो भरी है तो नया फिर किसमें समेंटंगे। नयी धूप और ताज़ी हवा के लिये घर की खिडकियां और रौशनदान तो खोलने हीं होंगे। नहीं तो-
खिडकियां देर से खोली बडी भूल हुई,
मैं ये समझा था कि बाहर भी अंधेरा होगा।

मात्रा गिराने के नियम के विषय में पूछने का मक़सद इतना सा था कि मैं तो मात्राएँ गिरा लेता हूँ नियम की जानकारी नहीं है। मैंने नवगीत से सम्बन्धित आलेख लगभग शून्य ही पढे हैं क्योंकि मुझे लगता है कि नवगीत लिखने के लिये नवगीत पढना ज़रूरी है और समीक्षक बनने के लिये आलेख पढना।
--संजीव गौतम

9 अगस्त 2009

एक प्रतिक्रिया और उसका उत्तर विस्तार में

इस पत्रोत्तर को विस्तार से इसलिए दिया जा रहा है ताकि अन्य सदस्य भी इससे लाभ उठा सकें और इसके आधार पर अपनी अपनी रचनाओं को नवगीत की दृष्टि से देख सकें। यह पोस्ट आलोचना या समीक्षा नहीं है, बल्कि नवगीत को ठीक से समझने के लिए एक बहस मात्र है। प्रवीण पंडित जी सुप्रसिद्ध कथाकार तो हैं ही कविता, निबंध,गीत और रंगमंच के सिद्ध हस्ताक्षर भी हैं। नवगीत की पूरी टीम उनके प्रति गहरा आदर रखती है। वे नवगीत के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, उनके सुखद पदार्पण और विनम्र पत्र का सादर अभिनंदन करते हुए उनके पूछे गए प्रश्नों का हम उत्तर दे रहे हैं। इस आशा से कि अन्य सदस्य भी लाभान्वित होंगे।

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पत्र

जड़मति से सुजान बनने का रास्ता लांघ कर तय करने जैसा नहीं ही होता। अभी तो पहला क़दम ही है , वो भी लटपटाता सा।
लेकिन चलते रहना है-- निरंतर।
आप राह दिखा ही रहे हैं ।
अनुरोध - निम्न पंक्तियां नवगीत की श्रेणी में आती हैं क्या?--कृपया बताएं ।
दरिया मे पानी ,
पानी को खूब रवानी दे।

ओठों पर मुस्कान
थिरकती गाती हो हरदम,
गीतों को दे बोल और
बोलों को मानी दे।
दुल्हन के माथे को
ढ़कती चूनर धानी दे


फ़सल को पक्कापन ऐसे
ज्यों सिद्धि तपसी को
खेतों को दे बीज और
बीजों को पानी दे

दुल्हन के माथे को
ढ़कती चूनर धानी दे
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उत्तर

नमस्ते प्रवीण जी, आप अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित जानेमाने कवि और लेखक हैं। आपकी विनम्रता को और रचना धर्मिता को प्रणाम। सुंदर रचना के लिए बधाई। जो सुझाव दिए जा रहे हैं वे नवगीत की दृष्टि से हैं। उन्हें वैकल्पिक समझकर ही स्वीकारें यानि मनःस्थिति ऐसी रखनी चाहिए कि जो अच्छा लगे वो अपना लो जो बुरा लगे वो जाने दो।

सबसे पहले तो यह गीत है या नवगीत यह संशय मन से निकाल दें। गीत ही अचानक नवगीत हो उठते हैं।
सुझाव इस प्रकार हैं-
अंतरा केवल एक पंक्ति का है इसमें कम से कम एक पंक्ति और जोड़ देना अच्छा रहेगा। देखें-
ओठों पर मुस्कान
थिरकती गाती हो हरदम,
यहाँ ऊपर वाली पंक्ति से मिलती हुई एक पंक्ति और होनी चाहिए उदाहरण के लिए-
जन जन की पीड़ा पर नेह लगाती हो हरदम (या जो आप चाहें)
गीतों को दे बोल
और बोलों को मानी दे।
(इसके बाद की पंक्तियाँ सुंदर है पर मुखड़े से मिलने के लिए दो नई पंक्तियाँ देना गीत के लिए उचित नहीं है। अंतरा हमेशा मुखड़े से बड़ा होना चाहिए। मुखड़ा बार बार दोहराया जाता है इसलिए उसका छोटा रहना गीत में कर्णप्रिय लगता है। इस दृष्टि से मुखड़े से मिलती बाकी दो पंक्तियों की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद स्थाई की पंक्तियाँ दोहराई जा सकती हैं।

दूसरे अंतरे में
फ़सल को पक्कापन ऐसे
ज्यों सिद्धि तपसी को
यहाँ कुल मात्राएं तो सही हैं पर कुछ असंतुलन सा है। पहले पद में लघु ज्यादा हैं और दूसरे पद में दीर्घ। मेरे विचार से संतुलन को बनाने के लिए इस प्रकार लिखा जाना बेहतर होगा-
फ़सलों को पक्कापन यों
ज्यों सिद्धि तापसी को
यहाँ एक पंक्ति और जोड़ना ठीक रहेगा -
चौपालों को न्याय कि जैसे
रूप आरसी को
इसके बाद ये पंक्तियाँ जोड़ी जा सकती हैं।
दुल्हन के माथे को
ढकती चूनर धानी दे

खेतों को दे बीज और
बीजों को पानी दे यह पंक्ति बहुत सुंदर है पर इसके बाद पहली पंक्ति या मुखड़ा फिर से आएगा जिसमें पानी देने की बात कही गई है तो शायद दोहराव उचित नहीं रहेगा। मेरे विचार से इसमें नवगीत के तत्त्व उपस्थित हैं। स्थायी की रचना आँचलिकता से मेल खाती है और छंद की दृष्टि से नवीन है। नई उपमाओं का प्रयोग है और प्रस्तुति में नवीनता है। --दरिया में पानी, पानी को खूब रवानी दे-- इस प्रकार एक ही शब्द का दो बार अलग अलग पंक्तियों में प्रयोग बहुत आकर्षक है। एक और विचार भी आ रहा है। अगर यह प्रयोग आगे भी बढ़ता जैसे --गीतों को दे बोल, बोल में गहरा मानी दे-- तो क्या बात होती। इस परिपाटी का प्रयोग दूसरे अंतरे में भी हो जैसे-- बीजों में दे शक्ति, शक्ति से भर गुड़धानी दे... ऐसा कुछ हो सकता तो मज़ा आ जाता। इसी प्रकार के प्रयोग एक गीत को नवगीत बनाते हैं।

इस बातचीत के बाद पूरा तैयार गीत इस प्रकार होगा-

दरिया मे पानी,
पानी को खूब रवानी दे।

ओठों पर मुस्कान
थिरकती गाती हो हरदम,
जन जन की पीड़ा पर
नेह लगाती हो हरदम

गीतों को दे बोल,
बोल में गहरा मानी दे।
दरिया मे पानी,
पानी को खूब रवानी दे।

फ़सलों को पक्कापन यों
ज्यों सिद्धि तापसी को
चौपालों को न्याय कि जैसे
रूप आरसी को

बीजों में दे शक्ति,
शक्ति से भर गुड़-धानी दे
दरिया मे पानी,
पानी को खूब रवानी दे।

सदस्यों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। --पूर्णिमा वर्मन

नवगीत की भाषा

नवगीत की भाषा स्पष्ट है हिंदी ही होती है। लेकिन नवगीत के लिए कैसी हिंदी का प्रयोग किया जाय यह बहुत कुछ कवि की व्यक्तिगत रुचि पर निर्भर करता है। हर कवि का अपना शब्दकोश होता है जिसमें से वह भाव के अनुरूप शब्द निकालता है और प्रयोग करता है। उसकी अपनी पसंद नापसंद होती है, उसका अपना व्यक्तित्व भी होता जिसे वह कविता में व्यक्त करता है। ये सब मिलकर नवगीत के गीतकार की भाषा बनाते हैं।

व्यापक शब्दकोश वाला कवि स्वाभाविक सी बात है भावों को बेहतर व्यक्त कर सकेगा। लेकिन एक अच्छा कवि भाषा को विषयवस्तु के अनुसार सुंदरता से ढालते हुए कविता में सौंदर्य भरता है। नवगीत के लिए हमें ऐसी ही भाषा की आवश्यकता होती है जो विषय के अनुरूप सुंदर, सहज और अर्थपूर्ण हो। उदाहरण के लिए डॉ. अश्वघोष का यह गीत भारतीय संस्कृति को लाजवंती धारणाओं और पश्चिमी प्रभाव को पछुआ हवाओं के रूपक में बाँधते हुए लिखा गया है। विषय गंभीर है तो उसके अनुरूप ही संस्कृत की ओर झुकाव रखने वाली सहज शब्दावली का प्रयोग करते हुए नवगीत को बड़ी सुंदरता से रचा गया है।

लाजवंती धारणाएँ

लाजवंती धारणाएँ
पढ़ रहीं नंगी कथाएँ

नीतियाँ बेहाल हैं
आदर्श की धज्जी उड़ी है,
रीतियाँ होकर
अपाहिज
कोशिशों के घर पड़ी है,
पुस्तकों में
कैद हैं नैतिक कथाएँ

मूल्य सारे
टूटकर बिखरे पड़े हैं,
प्रचलन को
स्वार्थ,
अब ज़िद पर अड़े हैं,
तेज होती जा रहीं
पछुआ हवाएँ

नवगीत में आँचलिक भाषा के प्रयोग की परंपरा रही है। यह नवगीत को सौंदर्य तो प्रदान करती ही है मिट्टी से जोड़े रखने में भी मदद करती है जो नवगीत की एक बड़ी आवश्यकता है। आँचलिकता ऐसी हो जो सबको छू जाए, जो नवगीत में उस विशेष वातावरण का सृजन कर दे जिसे हम प्रस्तुत करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए डॉ. हरीश निगम का यह गीत देखें-
बिखरे हैं पर

खाली पिंजरा
डोल रहा ओसारे में!

चला गया सुगना
बिखरे हैं पर
टीसों के मौसम
गए हैं ठहर

फ़र्क न लगता
शाम-सुबह अंधियारे में!

फेरे हैं दिन-भर
परछाईं के
आए ना झोंके
पुरवाई के

टोना-सा है
अमलतास कचनारों में!
यहाँ ओसारे, सुगना, टीस, टोना आदि आँचलिक शब्द अन्य सामान्य शब्दों के साथ मिलकर पाठक के मन पर अनमने ग्रामीण परिवेश का टोना रचने में सफल सिद्ध होते हैं। कुशल नवगीतकार अपने गीत की भाषा को नवगीत के परिवेश, विषय वस्तु और संवेदनाओं को सही ढंग से व्यक्त करने के लिए बदलता रहता है।

इससे पहले वाले लेख में हमने नईम का एक नवगीत उर्दू की ओर झुकाव वाला पढ़ा था। इसी तरह अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग भी नवगीतों में खूब हुआ है। यश मालवीय मुंबई का वर्णन करते हुए कहते हैं-
मुंबई

साँस साँस
बस अपने लिए तरसना होता है
सुबह हुई
जूते के फीते कसना होता है

लेनी पड़ती होड़ बसों से
लोकल ट्रेनों से
फूल फूल सपनों की लाश
न उठती क्रेनों से
गर्दन तक गहरे दलदल में
धँसना होता है

बार जुआघर होटल
डिस्को पार्टी रोशन होते
होटों पर जलती सिगरेट
पर बुझे बुझे मन होते
पीकर पागल सा
रोना या हंसना होता है

यहाँ क्रेन, लोकल ट्रेन, होटल, पार्टी, बार, डिस्को, सिगरेट आदि अनेक शब्द अँग्रेज़ी के होने के बावजूद गीत के बहाव में कमी नहीं आई है। न ही यह दुरूह बना है, बल्कि कवि जो कहना चाहता और उसको कहने में ये शब्द सहायक बन गए हैं।

कुल मिलाकर यह कि नवगीत की भाषा विषय, स्थान और अभिव्यक्ति के अनुरूप होनी चाहिए। हमारी भाषा गीत की लय में बह जाए और जो हम कहना चाहते हैं उसे सहजता से कह जाए, ऐसी होनी चाहिए। खूब नवगीत पढ़ना अच्छे नवगीत लिखने में सहायक होता है। जिस परिवेश में हम रहते हैं उसे अच्छी तरह समझने और उसके शब्दों को अपनी संवेदना में शामिल करते रहने से इन शब्दों का नवगीत में ढल जाना आसान होता है। किसी शब्द से जबरदस्ती अच्छी नहीं उसे सहज आने दें। ठीक लगे तो रखें अन्यथा बदल दें। नवगीत की दुनिया में बस इतना ही काफ़ी है।

--पूर्णिमा वर्मन

6 अगस्त 2009

नवगीत का मुक्तछंद

नवगीत में छंद का बंधन नहीं है। लेकिन इसमें छंद होता है। यहाँ दो शब्दों का अर्थ ठीक से समझ लेना चाहिए- छंदमुक्त और मुक्तछंद।
1- छंदमुक्त का अर्थ है जिसमें छंद की उपस्थित ही न हो। जैसे नई कविता में पंक्तियाँ बदलते हुए इच्छानुसार अपनी भावनाओं के अनुसार आगे बढ़ते जाते हैं।
2- मुक्त छंद- जिसमें छंद तो है पर छंद कैसा रखना चाहते हैं उसकी स्वतंत्रता है।
नवगीत मुक्तछंदवाली रचना है। इसमें पारंपरिक छंदों का प्रयोग नहीं करते हैं। छंद नया बनाने के लिए यह भी ज़रूरी है कि छंद और मात्राओं की जानकारी हो। मात्राएँ कैसे गिनी जाती हैं यह शास्त्री जी ने दाहिने स्तंभ में नीचे बताया है। उसको ध्यान से पढ़ लेना चाहिए। किस पंक्ति में कितनी मात्राएँ रखी जाएँ यह कवि को ही निश्चित करना होता है। स्थाई में कितनी मात्राएँ हों, अंतरे में कितनी मात्राएँ हों और अंतरे की अंतिम पंक्ति का कैसा स्वरूप हो जो वह स्थाई के साथ ठीक से जुड़ सके यह कवि को खुद निश्चित करना होता है। उदाहरण के लिए सुप्रसिद्ध नवगीतकार नईम का एक गीत है-

चिट्ठी पत्री ख़तो किताबत के मौसम फिर कब आएंगे?
रब्बा जाने,सही इबादत के मौसम फिर कब आएंगे?

चेहरे झुलस गये क़ौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा
इससे बदतर किसी कयामत के मौसम फिर कब आएंगे?

इसमें देखें कि स्थाई दो पंक्तियों का बनाया गया है। दोनो की मात्राएँ समान हैं। अंतरा फिर दो पंक्तियों का है दोनों पंक्तियाँ स्थाई से काफ़ी छोटी हैं। तीसरी पंक्ति अंतरे की पंक्ति के समान मात्राओं वाली है लेकिन उसमें तुक नहीं रखी गई है जब कि अंतिम पंक्ति को स्थाई के बराबर रखा गया है ताकि पहली पंक्ति के साथ आसानी से घुल जाए। यह पूरी तरह से एक नया छंद है।
इस प्रकार अनगिनत छंद बनाए जा सकते हैं और उनको सुविधानुसार पंक्तियों में बाँटा जा सकता है। उदाहरण के लिए इस गीत को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-

चिट्टी पत्री
ख़तो किताबत के मौसम
फिर कब आएंगे?
रब्बा जाने,
सही इबादत के मौसम
फिर कब आएंगे?

चेहरे झुलस गये क़ौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
फिर कब आएंगे?

क्यों कि आजकल पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन छोटे छोटे कॉलम में किया जाता है इसलिए पंक्तियों छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट देना अच्छा रहता है। यह तो हुई बात कि नया छंद कैसे बनता है और कैसे लिखा जाता है पर इसके साथ साथ एक बात और भी जाननी चाहिए कि जब हमने एक स्थाई और एक अंतरा बना लिया तो पूरी रचना में उसी छंद का पालन होना चाहिए। तभी गीत में लय सध सकेगी। यह नहीं कि छंद की स्वतंत्रता है तो पहला अंतरा अलग छंद में और दूसरा अंतरा अलग छंद में। जो छंद एक बार बनाया गया है पूरे नवगीत में उसका पालन करना ज़रूरी है। उदाहरण के लिए इसी गीत का दूसरा अंतरा देखें-

ब्याह सगाई बिछोह मिलन के अवसर चूके
फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके
लगा अंगूठा कटवा बैठे नाम खेत से
जीने से भी
बड़ी शहादत के मौसम
फिर कब आएंगे?

ध्यान से देखें तो पाएँगे कि दूसरे अंतरे में पहले अंतरे की सभी नियमों का पालन किया गया है।

इससे पता चलता है कि नवगीत में हम मात्राओं, तुकों और विभिन्न भाषाओं के शब्दों के प्रयोग सभी के विषय में स्वतंत्रता प्राप्त करते हैं। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ ठीक से पता होना चाहिए। स्वतंत्रता का अर्थ स्व-तंत्र-ता अर्थात् अपने द्वारा बनाए गए तंत्र का पालन करना है न कि दिशाहीन होकर उच्छृंखल आचरण करना। इसलिए नवगीत के गीतकार को छंद तुक शब्दों के प्रयोग के सभी नियमों को ठीक से समझकर अपना नया रास्ता चुनना होता है।

गौतम राजरिशी ने एक बार पूछा था कि क्या गज़ल की तरह नवगीत में मात्राएँ गिराने की छूट है बाद में संजीव गौतम ने भी वह सवाल दोहराया था। गजल में भी किसी विशेष स्थान पर, किसी विशेष भाव को व्यक्त करने के लिए, लय खराब न करते हुए मात्रा गिराने की छूट होती है। उसी प्रकार नवगीत में भी सौंदर्य के लिए मात्रा घटाई या बढ़ाई जा सकती है। ऊपर के गीत में हम देखेंगे कि- ब्याह सगाई बिछोह मिलन के अवसर चूके - में बिछोह को बिछह पढ़ना पड़ रहा है। या बिछोह के छो को जल्दी से लघुरूप में पढ़ना पड़ता है। इसके स्थान पर विरह मिलन भी लिखा जा सकता था पर पूरे गीत में जैसा ग्रामीण परिवेश रचा गया है उसको देखते हुए शायद कवि ने बिछोह लिखा। अगर बिछह लिखते तो पढ़नेवाले के लिए अर्थ स्पष्ट न होता।

शास्त्री जी अपनी टिप्पणियों में बार बार सदस्यों को याद दिलाते हैं कि कहाँ मात्राएँ छूटी है और कैसे उन्हें भरना है। यह इसीलिए है कि सदस्य मात्राओं को ठीक से समझ लें। इस आशय का स्पष्टीकरण वे अपने एक लेख में पहले भी दे चुके हैं। अगर रचनाकार सदस्य को लगता है कि जानबूझकर विशेष अर्थ देने या प्रभाव उत्पन्न करने के लिए ऐसा किया गया है तो मात्रा के विषय में बात करनेवाले सदस्य या टिप्पणीकार से तर्क की आवश्यकता नहीं है। अगर सदस्य सचमुच कुछ पूछना या समझना चाहते हैं तो प्रश्नों का स्वागत है।

5 अगस्त 2009

गीत और नवगीत


नवगीत में गीत होना ज़रूरी है। यों तो किसी भी गुनगुनाने योग्य शब्द रचना को गीत कहने से नहीं रोका जा सकता। किसी एक ढांचे में रची गयीं समान पंक्तियो वाली कविता को किसी ताल में लयबद्ध करके गाया जा सकता हो तो वह गीत की श्रेणी में आती है, किन्तु साहित्य के मर्मज्ञों ने गीत और कविता में अन्तर करने वाले कुछ सर्वमान्य मानक तय किये हैं। छन्दबद्ध कोई भी कविता गायी जा सकती है पर उसे गीत नहीं कहा जाता। गीत एक प्राचीन विधा है जिसका हिंदी में व्यापक विकास छायावादी युग में हुआ। गीत में स्थाई और अंतरे होते हैं। स्थाई और अन्तरों में स्पष्ट भिन्नता होनी चाहिये। प्राथमिक पंक्तियां जिन्हें स्थाई कहते हैं, प्रमुख होती है, और हर अन्तरे से उनका स्पष्ट सम्बन्ध दिखाई देना चाहिये। गीत में लय, गति और ताल होती है। इस तरह के गीत में गीतकार कुछ मौलिक नवीनता ले आये तो वह नवगीत कहलाने लगता है।

साठवें दशक के आसपास जब कविता- नई कविता के रूप में विकसित हो रही थी तब गीत- नवगीत के रूप में विकसित हुआ। नई कविता ने तुक और छंद के बंधन तोड़ दिये लेकिन नवगीत इन सबके साथ रहते हुए नवीनता की ओर बढ़ा। निराला ने अपनी एक रचना में इस ओर संकेत करते हुए कहा है- नव गति, नव लय, ताल, छंद नव। यही आगे चलकर नवगीत की प्रमुख प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ भी बनीं। इसके साथ साथ नवगीत में नया कथन, नई प्रस्तुति, प्रगतिवादी सोच, नए उपमान, नए प्रतीक, नए बिम्ब, समकालीन समस्याएँ और परिस्थितियाँ प्रस्तुत करते हुए इस विधा को नई दिशा दी गई। यही एक गीत को नवगीत बनाते हैं। आवश्यक नहीं कि एक नवगीत में इन सभी चीज़ों का समावेश हो लेकिन 3-4 होना ज़रूरी है। नवगीत में छंद आवश्यक है लेकिन वह पारंपरिक न हो, नया छंद हो और उसका निर्वाह भी किया गया हो। छंद में बहाव हो लय का सौंदर्य हो, ताकि गीत में माधुर्य बना रहे।

ऊपर के लेख में हमने देखा कि नवगीत के लिए आवश्यक तत्व क्या क्या हैं। अगले अंकों में एक एक कर के हम इनके विषय में विस्तार से बात करेंगे। सदस्यों के सुझावों और प्रश्नों का स्वागत है।

--पूर्णिमा वर्मन

26 मई 2009

कार्यशाला-१ की उपलब्धियाँ

कार्यशाला-1 में हमने दी गई पंक्ति पर नवगीत लिखना सीखा। हमने नए गीत बनाए और विद्वानों ने उस पर टिप्पणी की। हममें से बहुत कम लोग पहले से गीत लिखना जानते थे और नवगीत क्या है इसका भी ठीक अनुमान नहीं था। इस कार्यशाला में हमने नवगीत के आधारभूत ढाँचे के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। कार्यशाला में लिखे गए गीतों पर विद्वान गीतकारों की विस्तृत समीक्षा से हमें अपने नवगीतों को कैसे सुधारें इस विषय में भी जानकारी मिली। फिर भी हो सकता है कि सब कवियों का ध्यान इन महत्वपूर्ण टिप्पणियों की ओर न गया हो इसलिए यह पोस्ट विशेष रुप से-

पहली महत्वपूर्ण टिप्पणी शास्त्री नित्यगोपाल कटारे जी की मात्राओं के संबंध में, वे लिखते हैं-

गीत शब्द की उत्पत्ति " गै " धातु में भूत कालिक कृदन्त " क्त " प्रत्यय के संयोग से हुई है, जिसका अर्थ है ,जो गाया गया हो। अर्थात् गीत वही है जो गाया जा सकता हो। गाने के लिये स्वर और लय की प्राथमिक आवश्यकता होती है। संगीत शास्त्र के विद्वानों ने स्वर के नियन्त्रण के लिये विभिन्न रागों की, और लय के नियन्त्रण के लिये विभिन्न मात्राओं वाले तालों की रचना की है। गीत शब्दों की वह सुनियोजित रचना है,जो किसी राग का आश्रय लेकर लय को नियन्त्रित करने वाले किसी ताल में निबद्ध हो।

नवगीत में भी गीत तो है, इसलिए मात्राओं का ध्यान रखना आवश्यक है- वे आगे लिखते हैं-

नवगीत में यह छूट है कि आप चाहें तो एक पंक्ति ४ मात्रा दूसरी ८ मात्रा तीसरी १२ मात्रा और चौथी पंक्ति १६ मात्रा की बना सकते हैं पर लय तभी बनेगी जब आप ये गुणनखण्ड याद रखेंगे।

ताल के विषय में वे आगे बताते हैं-
विभिन्न प्रकार की तालों के अनुसार विभिन्न प्रकार के गीतों की रचना होती है । सबसे छोटी ताल है "कहरवा" ४ मात्रा, दादरा ६ मात्रा, रूपक ७ मात्रा, दीपचन्दी ८ मात्रा, झपताल १० मात्रा, एकताल १२ मात्रा, और तीन ताल १६ मात्रा। जब कोई गीत की रचना करें तो यह ध्यान रखें कि गीत की सभी पंक्तियाँ किसी एक ताल से नियंत्रित हों। जैसे आप ४ मात्रा वाली लय बनाते है तो सभी पंक्तियों में ४, ८, १२, १६, २० या २४ मात्राएँ होनी चाहिये। यदि दादरा की लय बनाना चाहते है् तो सभी पंक्तियों में ६, १२, १८, २४ या ३० मात्राएँ होनी चाहिये। इसी प्रकार यदि रूपक ताल की लय बानाना हो तो प्रत्येक पंक्ति में ७, १४, २१, या २८ मात्राएँ रखें। नवगीत में यह छूट है कि आप चाहें तो एक पंक्ति ४ मात्रा दूसरी ८ मात्रा तीसरी १२ मात्रा और चौथी पंक्ति १६ मात्रा की बना सकते हैं पर लय तभी बनेगी जब आप ये गुणनखण्ड याद रखेंगे।

आचार्य संजीव सलिल जी ने नवगीत के रूप से संबंध में एक और महत्वपूर्ण बात कही। वे कहते हैं-

नव गीत लिखते समय स्थाई की पंक्तियों की संख्या यथा संभव सामान हो तथा अंतरे की पंक्तियों की संख्या सामान हो। पंक्तियों का पदभार सामान होना गीत की शर्त है। नवगीत कुछ ढील देता है। पंक्तियाँ कुछ छोटी बड़ी हो सकती हैं पर कुल मिलाकर पद का पदभार संतुलित हो। शब्दों के पर्यायवाची बदल-बदलकर संतुलन लायें। अभ्यास हो जाने पर अपने आप सही शब्द आने लगेंगे।
नवगीत के संबंध में एक बहुत अच्छा नवगीत भी आचार्य जी ने प्रस्तुत किया है। जिसमें संक्षेप में नवगीत के मूल तत्वों की व्याख्या कर दी गई है। आज इस गीत को फिर से पढ़ते हैं-
गीत क्या?
नवगीत क्या है?
यह समझ लें,
फिर लिखें।
गीत संसद में
सभी से,
बेहतर ही
हम दिखें।
शब्द कम,
हों भाव ज्यादा।
न्यून सज्जा,
अधिक सादा।
शिल्प-बिम्ब
प्रतीक नव हों,
कलश कम हों,
नींव ज्यादा।
धरा से
ऊगे हुए
नव अंकुरों
जैसे दिखें।


इस कार्यशाला में हमने यह भी सीखा कि कविता, गीत और नवगीत में क्या अंतर है। अभी तक हमने मात्राएँ कैसे गिनें यह नहीं सीखा है तो अगली पोस्ट में यह सीखेंगे कि मात्राएँ कैसे गिने। बाएँ कॉलम में अगली कार्यशाला की घोषणा हो चुकी है। कुछ रचनाएँ हमारे पास पहुँच भी गई हैं। बाकी अनुसरणकर्ताओं की रचनाओं की प्रतीक्षा है।

कार्यशाला के जिन 6 गीतों को पाठशाला के अध्यापकों ने अनुभूति में प्रकाशन के लिए चुना है उनके रचनाकार हैं- संजीव गौतम, अनाम, मुक्ता पाठक, अर्बुदा ओहरी, मानसी और गौतम राजरिशी। छहों गीतकारों को बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ गीत अनुभूति में यहाँ पढ़े जा सकते हैं। लेख के अंत में शास्त्री के कुछ शब्द पुनः
नवगीत की पाठशाला के प्रथम मास की बहुत बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसमें १८ नवगीतों की रचना की गई जो आज की आवश्यकता है। मुझे अत्यन्त प्रसन्नता है कि सभी प्रतिभागियों ने बड़े मन से गीत लिखे । अगले विषयों पर भी गीत के नियमों को ध्यान में रखकर लिखेंगे। सभी को बहुत बहुत शुभकामना।
आप सबके विचार आमंत्रित हैं। -- पूर्णिमा वर्मन