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7 फ़रवरी 2014

७. तिर रहा आँखों में जल


तिर रहा आँखों में जल
इस पार भी ,उस पार भी
किन्तु दोनों पार की
भाषा अलग है

हैं उधर अगुवाई में
आतुर खड़े सपने
और इधर देते विदा
सपने कई अपने

स्वप्न व्याकुल से खड़े
इस पार भी उस पार भी
किन्तु दोनों की ही
अभिलाषा अलग है

वायदे कुछ हैं बंधे
कुछ नेह के अनुबंध
कुछ बंधे उपदेश
आँचल से लिए शुभ गंध

प्रीति के उपहार हैं
इस पार भी उस पार भी
किन्तु उपहारों की
परिभाषा अलग है

-सीमा अग्रवाल
कोरबा, छ.ग.

6 फ़रवरी 2014

६. शुभ मुहूरत

घर सजे हैं,
शुभ मुहूरत आ रहा।
शहनाईयाँ,
बजने का मौसम आ रहा।

प्यार से नजरें मिली,
कुछ कह गई।
स्वप्न में फिर,
डूबती सी खो गई।
मन युवा,
होकर सयाना आ रहा।

पसन्द अपनी,
पीढ़ियोँ पर थोपते थे।
और इसको ही,
सही वे बोलते थे।
रूढ़ियों का,
क्रम पुराना जा रहा।

बैण्ड के स्वर,
लोकगीतों में घुले।
चिर पुरातन और नूतन,
ध्रुव मिले।
सबको मिश्रित,
सोच का स्वर भा रहा।

आवरण बदला,
मगर स्पंदन वही है।
दो दिलों की चाहतें,
अब भी वही हैं।
एक चिन्तन ,
ले नयापन आ रहा।

-सुरेन्द्रपाल वैद्य।
मंडी हि.प्र.

5 फ़रवरी 2014

५. शुभ विवाह का अवसर

शुभ विवाह का उत्सव अपना
कैद हो गया होटल में
ढोलक नहीं सुनाई देती
बाजे के कोलाहल में

घर द्वार सजाये जाते
होते थे मंगल गीत
सब जगह बुलावा जाता
आते थे अपने मीत
अब उत्सव ऐसे सिमट गया
जैसे सागर बोतल में

लुप्त हो रही अब रस्में
चमक-दमक ने घेर लिया
हल्दी उबटन केशर से
गोरी ने मुख फेर लिया
अम्मा भी अब चलीं पार्लर
चहक उठीं कौतूहल में

बाबू जी भी मान गये
अब आया नया जमाना
नयी पुरानी रस्मों में
अब तो है मेल कराना
बाबा-दादी संग–संग पहुँचे
सज-धज करके होटल में

अमित दुबे ‘वागर्थ’
इलाहाबाद

4 फ़रवरी 2014

४. बस प्यार तुम्हारा

घूमूँगा बस प्यार तुम्हारा
तन मन पर पहने
पड़े रहेंगे बंद कहीं पर
शादी के गहने

चिल्लाते हैं गाजे बाजे
चीख रहे हैं बम
जेनरेटर करता है बक बक
नाच रही है रम

गली मुहल्ले मजबूरी में
लगे शोर सहने

सब को खुश रखने की खातिर
नींद चैन त्यागे
देहरी, आँगन, छत, कमरे सब
लगातार जागे

कौन रुकेगा, दो दिन इनसे
सुख दुख की कहने

शालिग्राम जी सर पर बैठे
पैरों पड़ी महावर
दोनों ही उत्सव की शोभा
फिर क्यूँ इतना अंतर

मैं खुश हूँ, यूँ ही आँखो से
दर्द लगा बहने

-सज्जन धर्मेन्द्र
बिलासपुर हि.प्र.

3 फ़रवरी 2014

३. सपन सलोने

सपन सलोने,
नैनो में
जिया भ्रमर सा डोला है

हँसी ठिठोली, मंगल-गीत
गूँज रहे है घर, अँगना
हल्दी, उबटन तेल, हिना
खनके हाथों का कंगना

खिला शगुन के,
चंदन से
चंचल मुखड़ा भोला है


छेड़ें सखियाँ, थिरक रही
फिर, पैरों की पैंजनिया
बालों में गजरा महके
माथे झूमर ओढ़निया

खुसुर फुसुर की
बतियों ने
कानो में रस घोला है

-शशि पुरवार
जलगाँव (महाराष्ट्र)

2 फ़रवरी 2014

२. देवता जागे

देवता जागे, सजे मंडप, बजीं
शहनाइयाँ।

झिलमिलाते वस्त्र, आभूषण
निकल बाज़ार से,
चल पड़े हैं तन सजाने वर-वधू
का प्यार से।
प्रेम का ले रंग उभरेगी
हथेली पर, हिना।
हँस रही हल्दी, शगुन पूरा
नहीं उसके बिना।
सात फेरे फिर रहे, लेते हुए
अँगड़ाइयाँ।

हो रहे दूल्हे विकल, सेहरे
सजाकर शीश पर,
दंग दर्पण तक रहा है दुल्हनों
को भर नज़र।
चल पड़े हैं बैंड-बाजे, संग
बाराती स्वजन।
भाँवरों के साथ होगा, वर-वधू
का चिर मिलन।
दूर होंगी दो दिलों को दूर
करती खाइयाँ।

स्नेह-मय सहभोज, न्यौते, भव्य
आयोजन सभी,
आदि से कायम प्रथाएँ हैं
हमारे देश की।
ये नहीं केवल दिखावा, गूढ़तम
संस्कार हैं,
गाँठ रिश्तों की न हो ढीली, यही
बस सार है।
निहित हैं इन रीतियों में भावमय
गहराइयाँ।

-कल्पना रामानी
मंबई

1 फ़रवरी 2014

१. शादी रंगा–रंग

आँगन बजता गाजा –बाजा
सजा सजीला घर दरवाजा
गलियाँ रस्ते तंग
 सुनो जी! शादी रंगा-रंग।

दुल्हा लगता खासा लाला
होठों पे रख पान मसाला
पिएँ बाराती भंग
सुनो जी शादी रंगा-रंग।

चले पटाखे आगे-आगे
डर-डर घोड़ी पीछे भागे
दुल्हन रह गई दंग
सुनो जी शादी रंगा-रंग।

परिधानों की होड़ लगी जी
पकवानों की धाक जमी जी
मेहमानों में जंग
सुनों जी! शादी के ये रंग।

रिश्तेदारी चहुँदिशाएँ
किसे भुलाएँ, किसे बुलाएँ
न्योता था बेढंग
सुनो जी! शादी थी बेरंग।

-शशि पाधा
(यू.एस.ए.)

16 जनवरी 2014

कार्यशाला-३२ शादी उत्सव गाजा बाजा


 
शादी उत्सव गाजा बाजा हमारी संस्कृति के विशेष अंग है। परिवार में शादी की तैयारियों की अपनी रौनक होती है। इतनी तैयारी जैसे शादी के दो-तीन दिनों में जीवन के सारी राजसी ठाठ पूरे हो जाएँगे। विवाह के दिनों में महूरत और रस्मों की को निभाते हुए आयोजन में खुशियों की बाढ़ आ जाती है। कभी यह संवेदनाओं को गहराई से छूती है तो कभी उत्सव के बाद खर्च की दीवानगी कर्जों के बोझ को ढोती दिखाई देती है। इन्हीं सब पर आधारित है हमारी अगली कार्यशाला। रचना भेजने की अंतिम तिथि है ३१ जनवरी और पता है-
navgeetkipathshala@gmail.com