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18 मार्च 2010

३१- लो वसंत आ गया : अरविंद राज

मौसम के नाम लिखे,
तरुओं ने जब अपने
नवपत्र खोले,
कजरारी कोयलिया
उनको पढ़ बोले -
लो वसंत आ गया!

हंसदल कमलयुक्त
तालों की लहरों से
कर रहे किलोलें,
अभिगुंजन करते
भँवरे ख़ुश हो डोलें,
लो वसंत आ गया!

मलयज के संग-संग
महक रहे खेतों पर
पंछी पर तोलें,
फागुन के स्वागत में
ऋतु ने रंग घोले,
लो वसंत आ गया!

--
अरविंद राज
शाहजहाँपुर (उ.प्र.)

17 मार्च 2010

३०- आँगन में बासंती धूप : अजय गुप्त

शिखरों से घाटी तक सोना सा बिखर गया,
आँगन में बासंती धूप उतर आई है।

खेतों से पनघट तक
कोहरा ही कोहरा था,
कहीं नहीं हलचल थी
सब ठहरा-ठहरा था।
हिम निर्मित चोली के बटन सभी टूट गए,
मधुऋतु ने कुछ ऐसी ले ली अँगड़ाई है।

प्रकृति, पुरुष सब पर ही
बिखर गया रँग-अबीर,
मस्ती में डूब चुका
है युग चेता कबीर।
लपटों ने भून लिए नर्म चने के बिरवे,
बौराए आमों की बस्ती पगलाई है।

तने हुए तेवर
अलसाई पतवारों के,
अब बिस्तर बाँध रहे
काफ़िले सिवारों के।
तट हैं जागे-जागे सूनी सरिताओं के,
लहरों पर हलचल है, काँप रही क्यारी है।

गतिविधियों के पीछे
भाग रही हैं आँखें,
कोटि-कोटि चेहरों पर
जाग रही हैं आँखें।
मौसम की गर्माहट कर रही प्रमाणित यह,
अब नहीं कहीं सीली कोई दियासलाई है।

--
अजय गुप्त
शाहजहाँपुर (उ.प्र.)

16 मार्च 2010

२९- भेजता ऋतुराज : शिवाकांत मिश्र विद्रोही

गंध के हस्ताक्षर
भेजता ऋतुराज
किसलय-पत्र पर
इंद्रधनुषी रंग वाले
गंध के हस्ताक्षर!

झूमते हैं खेत
वन-उपवन
हवा की ताल पर
थिरकते
बंसवारियों के अधर पर
फिर वेणु के स्वर

विवश होकर
पंचशर की छुअन से
लग रहे उन्मत्त
सारी सृष्टि के ही चराचर!

आज नख-शिख
फिर प्रकृति के
अंग मदिराने लगे,
और निष्ठुर
पत्थरों तक
सुमन मुस्काने लगे

पिघलता है पुनः
कण-कण का हृदय
हर कहीं पर अब चतुर्दिक
फागुनी मनुहार पर!

--
शिवाकांत मिश्र विद्रोही

15 मार्च 2010

२८- दिल हुआ बाग बाग : विमल कुमार हेडा


पिया देखो तो -
कैसा मौसम आया है?
दिल हुआ बाग बाग, मन भी हर्षाया है!

मन करता है -
कलियों संग झूमूं मैं,
फूलों की
मुस्कान को चूमूं मैं,
पर तितलियों ने मुझको बहकाया है!
पिया देखो तो------

मन करता है,
सरसों संग लहराऊँ मैं,
ओढ़ चुनरिया
पीली इठलाऊँ मैं,
पर पवन ने आँचल मेरा उड़ाया है,
पिया देखो तो -

मन करता है -
फागुन गीत सुनाऊँ मैं,
मधुर राग गा
तुझको रिझाऊँ मैं,
पर कोयल ने मेरा कंठ चुराया है,
पिया देखो तो -

मन करता है,
पंछी बन जाऊं मैं,
वन उपवन
उड़ान भर आऊं मैं,
पर पतंगों ने मुझको लुभाया है,
पिया देखो तो -

मन करता है,
बयार बन जाऊं मैं,
तितली संग
डोलूँ-लहराऊँ मैं,
पर भंवरों ने मुझको बहुत डराया है,
पिया देखो तो -

मन करता है -
सतरंगी बन जाऊं मैं,
तुझ संग फागुन
रंग रमाऊं मैं,
पर ऋतुराज बसंत ने मुझको रिझाया है,
पिया देखो तो -

मन करता है,
फूलवारी बन जाऊं मैं,
खुशबू से
जीवन महकाऊँ मैं,
पर तेरे प्यार ने पागल मुझको बनाया है,
पिया देखो तो -
--
विमल कुमार हेडा
रावतभाटा, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)

14 मार्च 2010

२७- अब बसन्त आया है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"


उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!

कुहासे की चादर,
धरा से छँट गई।
फैली हुई धवल रुई,
गगन से हट गई।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!

सूर्य की
रश्मियों से,
दिवस प्रकाशित हैं।
वासन्ती सुमनों से ,
तन-मन सुवासित हैं।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!

होली का उल्लास है,
आँगन-चौराहों पर।
चहल-पहल नाचती है,
पगदण्डी-राहों पर।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!

गुनगुनी धूप ने,
मोर्चे सम्भाले हैं।
पर्वत भी छोड़ रहे,
बर्फ के दुशाले हैं।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
खटीमा, ऊधमसिंहनगर (उत्तराखंड)

13 मार्च 2010

२६- घर लौट आओ : श्याम सखा श्याम


आई बसन्त
जाड़ा उड़न्त
घर लौट आओ
प्रिय कन्त

लो जाड़े का
हठ टूटा
तन से ऊनी
केंचुल छूटा
बसन्त है ऋतुराज सुमन्त

कलियों की
फ़ूटी मुस्कान
तितली
मांग रही लगान
भौंरे भी आ गये तुरन्त

पगलाई फिर रही
बयार
ठूंठों पर
मचली बहार
बहके-महके से दिग-दिगन्त
--
श्याम सखा श्याम

12 मार्च 2010

२५- देखो सजी रंगोली : वंदना सिंह


अलियों का गुंजन, दस्तक दे फागुन!
रंग और खुशबू ले आया पाहुन!

गुलाब कहीं,
कहीं गुलदाउदी
साथ गेंदों के सरसों भी फूली
लाल पीली
नारंगी नीली
धरती पर देखो सजी रंगोली
बौर अमियों पर
महकाया मधुवन
अलियों का गुंजन, दस्तक दे फागुन!

चंपा चमेली
महके पराग
वैभव बिखराए कचनार पलाश
हँसता झरे
जब हारसिंगार
स्वागत को आतुर करता परिहास
बंशी कोकिल की
गूँजी वन प्रांगण
अलियों का गुंजन, दस्तक दे फागुन!

चहुंदिश फैली
इस उमंग में
ले चलें उधार कुछ तो फूलों से
आओ धरा पर
हम भी बॉंटे
सुवासित प्रेम से सजी मुस्कानें
संदेश नेह का
बरसे हर ऑंगन
अलियों का गुंजन, दस्तक दे फागुन!
--
वंदना सिंह

11 मार्च 2010

२४- फागुन आयो रे : निर्मल सिद्धू


दिल-दिल में
उल्लास बड़ा
उत्पात
मचायो रे,
फागुन आयो रे!

किरनों ने अब
धुंध को चीरा
मन्द-मन्द है
बहे समीरा,
बगिया में
भंवरा भी फिर से
घात लगायो रे!
फागुन आयो रे!

ऋतुओं की रानी
है फागुन
एक नहीं
बहुतेरे हैं गुन,
मिलजुल सारे
प्रेम की इक
अलख जगायो रे!
फागुन आयो रे!

दिवस बड़े और
रैना छोटी
चुहल करे
नयनों की गोटी,
सजन-सजनिया
होली में मिल
रंग जमायो रे!
फागुन आयो रे!

उलझा जग का
तानाबाना
कभी कोई
कभी कोई निशाना,
उजड़े लोगों में
दोबारा
आस जगायो रे!
फागुन आयो रे!
--
निर्मल सिद्धू

10 मार्च 2010

२३- आई बसंत ऋतु आई : रचना श्रीवास्तव

सर्दी ने समेटी ली चादर
रस से भरी
धरा की गागर
फूलों ने जो शौल हटाया
मंद सुगंध का
झोका आया
मौसम हँसा भरी अंगड़ाई
आई बसंत ऋतु आई

सूरज ने लिहाफ से झाँका
अम्बर बोला
बाहर आजा
झोले में भर सारा कोहरा
शिशिर चल दिया
ज़रा न ठहरा
धूप गुनगुनी हुई सुहाई
आई बसंत ऋतु आई

करने लगी धरा शृंगार
डाले गले
बसन्ती हार
क्यारी क्यारी फूल खिले
अंबर धरती
गले मिले
धानी चुनर उड़ी लहराई
आई बसंत ऋतु आई

--
रचना श्रीवास्तव

9 मार्च 2010

२२- धुँए और धूल में आया : रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

धुँए और धूल में आया
गाँव को भूल मैं आया
तरल नयनों की पुतली में
फूल तीसी के तिरते हैं
फूले तोड़िए के खेत-
तरल सुधियों में घिरते हैं
मुझे बिछुड़े हुए तुमसे
यूँ ही बीत गए बरसों

गवाँया बहुत,कम पाया
लगा -जीना नहीं आया
खोया नगर के बीहड़ में
मैं मृगछौने -सा पागल
खोई है उम्र वासन्ती
हुए हैं पाँव भी घायल
बचपन की सहेली-सी
लगी है आज भी सरसों

तपे माथे को सहलाकर
मुझे सीवान यूँ बोले -
उदासी की ये भारी -
पाग क्यों पहने हुए आए ?
चने के फूलों से लकदक
खेत तुमको नहीं भाए ?
कोयल के साथ तुम गाओ
पास जो, बाँट दो हरसो
झूम लो तितलियों जैसे
भौंर-गुंजार -से बरसो

--
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

8 मार्च 2010

२१- ऋतु वसंत तुम आओ ना : कमला निखुर्पा

ऋतु वसन्त तुम आओ ना
वासन्ती रंग बिखराओ ना
उजड़ रही आमों की बगिया
बौर नये महकाओ ना
सूनी वन -उपवन की डालें
कोयल को बुलवाओ ना।
नूतन गीत सुनाओ ना,
ओ वसन्त तुम आओ ना

ऊँचे -ऊँचे महलों में,
देखो जाम छ्लकते हैं
कहीं अँधेरी झोपड़ियों में
दुधमुँहे रोज बिलखते हैं
कुटिया के बुझते दीपक को , बनकर तेल जलाओ ना
भूखी माँ के आँचल में तुम, दूध की धार बहाओ ना
प्रिय वसन्त तुम आओ ना

कोई धोता जूठे बर्तन,
कोई कूड़ा बीन रहा।
पेट की आग मिटाने को,
रोटी कोई छीन रहा
काम पे जाते बच्चे के, हाथों में किताब थमाओ ना
घना अँधेरा छाया है, तुम ज्ञान के दीप जलाओ ना
प्रिय वसंत तुम आओ ना

भटक रहा अपनी मंजिल से,
मतवाला युवा नशे में गुम है
देख पिता की फट रही छाती,
माँ की आँखें हुईं नम है
बिखर रहे सपने घर-घर के, फ़िर से उन्हें सजाओ ना
बहुत उदास हैं सारे आँगन,तुम खुशबू बन जाओ ना
प्रिय वसन्त तुम आओ ना

पीली चूनर से सरसों ने
धरती यह सजाई है
पीले पात झर चुके तरु के
हर कोंपल मुस्काई है
आओ कली बन मानव मन में, प्रेम के फ़ूल खिलाओ ना
त्रिविध बयार बहाओ ना,ॠतु वसंत तुम आओ ना
प्रिय वसन्त तुम आओ ना

--
कमला निखुर्पा

7 मार्च 2010

२०-ठहरो ज़रा सँवरने दो : निर्मला जोशी

ठहरो ज़रा सँवरने दो
फिर जी भर कर
निरख लेना
बाँधूगी आँचल में मधुवन
मधु ॠतु को मुक्त लहरने दो
ठहरो ज़रा सँवरने दो

यौवन के महके
मोहक क्षण
तन में मन में जग में पग में
रंग गंध घुल जाने तक
फागुन को
आज मचलने दो
होली के रंग
भिगोएँ तो
फिर जी भर कर
महक लेना
आजूंगी आखों में काजल
अलकें पलकों तक गिरने दो
ठहरो ज़रा सँवरने दो

यह फागुन है
घुल जाने दो
तन में मन में, मुझ में तुम में
रेशम रेशम हो जाने तक
सांसों को आज
मचलने दो
बाँहों में भर
तो लो अनंग
फिर जी भर कर
बहक लेना
बाचूँगी मौसम की पाती¸
रंगों में रंग निखरने दो
ठहरो ज़रा सँवरने दो

--
निर्मला जोशी

5 मार्च 2010

१९- रंग से भरे : धर्मेन्द्र कुमार सिंह ’सज्जन’

रंग से भरे
सुगंध से तरे
दिन ले के आए ऋतुराज रे।

सरसों ने पहनाया फूलों का पीतवस्त्र
परिमल ने दान किये हैं मादक अस्त्र-शस्त्र
कहता जय काम
बौराया आम
सजता है बन वसंत-ताज रे।

महुवे ने राहों में फूल हैं बिछा दिये
आँवलों ने धीरे से शीश हैं झुका लिये
मदन सारथी
चला महारथी
जीत लेने जन-गण-मन आज रे।

खेतों की रंगोली छू बसंत पद तरी
फागुन ने पाहुन के पैर महावर भरी
बोली होली
लाओ रोली
तिलक धरुँ माथे सरताज के।

कुहरे के चंगुल से धरती को मुक्त किया
जाड़े को मूर्च्छित कर पुनः उसे सुप्त किया
धरती अम्बर,
ग्राम, वन, नगर
करते हैं सब इस पर नाज रे।

--
धर्मेन्द्र कुमार सिंहसज्जन

4 मार्च 2010

१८- सखी बसंत आया : मानसी


सखी बसंत आया

कोयल की कूक तान
व्याकुल से हुए प्राण
बैरन भई नींद आज
साजन संग भाया
सखी बसंत आया

लागी प्रीत अंग-अंग
टेसू फूले लाल रंग
बिखरी महुआ की गंध
हवा में मद छाया
सखी बसंत आया

पाँव थिरके देह डोले
सरसों की बाली झूमे
धवल धूप आज छिटके
जगत सोन नहाया
सखी बसंत आया

अमुवा की डारी डारी
पवन संग खेल हारी
उड़े गुलाल रंग मारी
सुख आनंद लाया
सखी बसंत आया

--
मानसी

3 मार्च 2010

१७- फागुन रीता जाए ना : पूनम श्रीवास्तव


सुबह बसंती साँझ फागुनी
मौसम भीना भीना सा
इंतजार में तेरे साजन
फागुन रीता जाए ना

ऋतु बदली मलयानिल आई
सुबह शाम छाई तरुणाई
तेरे बिना एक पल भी अब
मेरे जी को भाए ना

संग सहेली इतराती हैं
मंद मंद होली गाती हैं
हँसी ठिठोली उनकी निसदिन
जबरन जिया जलाए ना

फगुनाहट की मधुर फुहारें
तन-मन पर कठिनाई वारें
भँवरा गुन गुन गुंजारों से
मन में तीर चुभाए ना।

--
पूनम श्रीवास्तव

2 मार्च 2010

१६- बसंत आ गया : महेन्द्र भटनागर

अंग-अंग में उमंग आज तो पिया,
बसंत आ गया!

दूर खेत मुसकरा रहे हरे-हरे,
डोलती बयार नव-सुगंध को धरे,
गा रहे विहग नवीन भावना भरे,
प्राण! आज तो विशुद्ध भाव प्यार का
हृदय समा गया!

अंग-अंग में उमंग आज तो पिया,
बसंत आ गया!

खिल गया अनेक फूल-पात से चमन,
झूम-झूम मौन गीत गा रहा गगन,
यह लजा रही उषा कि पर्व है मिलन,
आ गया समय बहार का, विहार का
नया नया नया!

अंग-अंग में उमंग आज तो पिया,
बसंत आ गया!

--
महेन्द्र भटनागर

1 मार्च 2010

१५- नाच उठा मन : प्रवीण पंडित

नाच उठा मन बाँध पैंजनी
ठुमक थिरक हुलसाया
काँधों पर फागुन को लादे
लो, बसंत आया

अधरों पर चुम्बन सा
आकर बैठा मधुरिम हास
बाँहें फैला कर उन्मादी
हठी हुआ उल्लास
मन के गली-गलिहारों को
बासंती रंगवाया

कलियों को अंगराग लगाता
गात गात में गंध
मन ही मन हुलसाता
तोड़े हौले हौले बंध
सूनी रेतीली वीथि में
फिर उमंग छाया

मन के मदिर मंजीरे
बोले मीठे मीठे बोल
नयनकोण में भाव रेशमी
करने लगे किलोल
तोड़े सारे फंद कहाँ
यह मन-तुरंग धाया

काँधों पर फागुन को लादे
लो ,बसंत आया

--
प्रवीण पंडित

28 फ़रवरी 2010

१४- मधुबसंत की खिली यामिनी : शारदा मोंगा

मधुबसंत की खिली यामिनी
चुपके चुपके आ जाना
बासंती संसार बना है
तन मन पर तुम छा जाना
मेरे मन के वृन्दावन में
मुरली मधुर बजा जाना

कोकिल पंचम तान सुनाये
ऊंचे स्वर में विरहा गाए
यह कैसी अलसित मधुरिमा
तन मन पर ऐसी है छाये
मधुबसंत की बन चन्द्रिका
पिय मिलन की आस जगाये

नव नभ में छिटकी चन्द्रिका
लिए पलाश की नवल रक्तिमा
उपवन उपवन फूल पुष्पिका
हो सुवासित मधुर मधुरिमा
मेरे तन मन के मंदिर में
मधुर मधुर मुस्का जाना

यह कैसी अलसित मधुरिमा
तन मन पर ऐसी छाई
मेरे प्राण मंदिर में जैसे
बजे प्यार की शहनाई
मधुबसंत की बन चन्द्रिका
चुपके से तुम आ जाना

कलिके मधुघट से तुहिनकण
मधु पी भ्रमर मदमत्त हुआ
तुम भी प्रेम प्याला ला संग
कमल हस्त से पिला देना
मधु बसंत की खिली यामिनी
चुपके चुपके आ जाना

--
शारदा मोंगा

27 फ़रवरी 2010

१३- प्रत्यंचा टूट गई : कैलाश पचौरी

प्रत्यंचा टूट गई
छूट गए फूलों के वाण
ऋतुओं के गंध कलश छलक गए

रेशमी हवाओं की
रस्सियाँ भाँजता
बटरोही वसंत
वन-बगीचों में झाँकता
कोयल के पैने संधान
अंध कूप में गहरे सरक गए

शहज़ादे सलीम-सा
बौराया आम
मेंहदी हसन-सी
ग़ज़ल पढ़ती है शाम
पहाड़ों पर नदी के पैतान
गुलमोहर निगाहों में करक गए

जंगल ने ओढ़ ली
खुशबू की चादर
धरती ने लगा ली
जैसे महावर
रंगों के तन गए वितान
गीत-क्षण शीशे-सा दरक गए

--
कैलाश पचौरी

25 फ़रवरी 2010

१२-महुए की डाली पर उतरा बसंत : अजय पाठक

संयम के टूटेंगे फिर से अनुबंध,
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
मधुबन की बस्ती में,
सरसिज का डेरा है।
सुमनों के अधरों तक,
भँवरों का फेरा है।
फुनगी पर गुंजित है, नेहों के छंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

किसलय के अंतर में,
तरुणाई सजती है।
कलियों के तनमन में,
शहनाई बजती है।
बहती, दिशाओं में जीवन की गंध।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

बौरों की मादकता,
बिखरी अमरैया में,
कुहु की लय छेड़ी,
उन्मत कोयलिया ने।
अभिसारी गीतों से, गुंजित दिगंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

सरसों के माथे पर,
पीली चुनरिया है।
झूमे है रह रहकर,
बाली उमरिया है।
केसरिया रंगों के, झरते मकरंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

बूढ़े से बरगद पर,
यौवन चढ़ आया है।
मन है बासंती पर,
जर्जर-सी काया है।
मधुरस है थोड़ा, पर तृष्णा अनंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

--
अजय पाठक