कार्यशाला : ०५ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कार्यशाला : ०५ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

1 दिसंबर 2009

२०- इस बार दिवाली पर

इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

दिया जलेगा या बाती या तेल जलेगा
या मेरा दिल कोने में चुपचाप जलेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

रंगोली जब मेरे आँगन सज जाएगी
लक्ष्मी मेरे द्वारे आ कर रुक जाएगी
मैं तो हूँ परदेस में टीका कौन करेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

खुशियाँ तो आएगी मेरे दरवाज़े भी
गूँजेंगे घर में मेरे गाजेबाजे भी
पर मेरे घर गणपति पूजन कौन करेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

बैठी होगी कहीं ढूँढ़ करके वो कोना
उसका दिल होगा जाने कितना सूना
देश में उसकी रीति गागर कौन भरेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

-दिगंबर नास्वा

१९-अँधियारा हँसता है

दीप जलाते रहे अनगिनत
फिर क्यों अँधियारा हँसता है

माटी के सोने-चाँदी के
दीपों में घृत-तेल भरा था
और वर्तिका डुबो उसी में
अग्नि पुंज स्पर्श धरा था
किंतु भुला बैठे थे हम यह
दीपक तले तिमिर बसता है।


दीप जलाए थे जो भी सब
केवल तन की अभिलाषा थी
दीप शिखा में नहीं कहीं भी
दीपित मन की सद-आशा थी
इसीलिए दिन-रात जगत पर
अंधकार पंजा कसता है।


दीप और अँधियार लड़े जब
अँधकार ने यह पहचाना
दीप जलाकर भस्म करेगा
मुश्किल है मेरा बच पाना
दीपक की छाया बन बैठा
मान दीप का ही ग्रसता है।

-निशेष जार

१८-एक दीपक

जूझ कर कठिनाइयों से
कर सुलह परछाइयों से
एक दीपक रातभर जलता रहा

लाख बारिश आँधियों ने सत्य तोड़े
वक्त ने कितने दिए पटके झिंझोड़े
रौशनी की आस पर
टूटी नहीं
आस्था की डोर भी
छूटी नहीं

आत्मा में डूब कर के
चेतना अभिभूत कर के
साधना के मंत्र को जपता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा

जगमगाहट ने बुलाया पर न बोला
झूठ से उसने कोई भी सच न तौला
वह सितारे देख कर
खोया नहीं
दूसरों के भाग्य पर
रोया नहीं

दिन महीने साल निर्मम
कर सतत अपना परिश्रम
विजय के इतिहास को रचता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा

--पूर्णिमा वर्मन

१७-अब न जाने खील-सा

अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

गाँव का वह नीम टेढ़ा
याद आता है
पेड़ पीपल का अभी भी
छटपटाता है
बाग में चलते रहँट का
स्वर अनोखा-सा
खो गया जाने कहाँ
पर झनझनाता है।
रोशनी की फिर नुमायश
हो रही घर द्वार सबके

पर न जाने क्यों नहीं मन से गई भटकन।
अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

माँ बताशा खील दीपक
घर सभी के भेजती थी
वह अमिट दौलत
अभी तक खर्च करता आ रहा हूँ
रोशनी तो कैद कर ली है
हक़ीक़त है मगर यह
इस शहर की भीड़ में
अब तक सदा तनहा रहा हूँ।
ज्योति का यह पर्व
मन को गुदगुदा पाता नहीं है

प्रश्न रह रह उठ रहा है कौन-सा कारन!
अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

हम समय की बाँह थामे
चल रहे बस चल रहे हैं
ठीकरों की होड़ में हम
मनुजता को छल रहे हैं
भेड़ियों की भीड़
बस्ती में पनपती जा रही फिर
संदली वन आस्थाओं के
निरंतर जल रहे हैं।
है समय का फेर
या अँधेर चाहे जो समझ लो

नाश होता है हमेशा वक्त का रावन!
अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

-डॉ. जगदीश व्योम

१६- यादें तेरी भर आँचल में

यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है|

विरह-व्यथा में भिगो-डुबो कर, वर्ष भर रखी मन की बाती,
यादों की माचिस से जल, फिर भभक उठी है मेरी छाती,
पीड़ा का तूफान समेटे रात अँधेरी घिर आई है,
यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है,

थीं मुस्काती फुलझड़ियों सी, घर में फिरती थी चरखी सी,
तेरी पायल की छुन-रुन-झुन, लगती थी मीठी गुझिया सी,
जब गुस्सा करती तो लगता तू ऐटम-बम की भी माई है,
यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है|

फीकी लगती है ये गुझिया, घर-आँगन-देहरी रोते सब,
दीप मुझे आँखों में चुभते, झालर साँपों सी डँसती अब,
चीख पड़ा है देखो रॉकेट, छुरछुरिया भी चिल्लाई है,
यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है|

--धर्मेन्द्र सिंह सज्जन

१५-फिर दिवाली आई है

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है

न हो छल विषाद मनों में अब
द्वेष हटा प्रेम में हों लीन सब
बुराई का विनाश कर अच्छाई छाई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

तिमिर मार रोशन हो जग अब
सब के मन से मिटे कालिमा अब
रावण मार रामजी ने कैसी लीला रचाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

उजला हो मन सब का अब
दीप जला जागो इन्सान अब
सौहार्द औ प्रेम की छटा चहुँ ओर छाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

--अरविन्द चौहान

१४- दीप घर के

दीप घर के ही जलाते रहे
घर अक्सर

आँख में विश्वास की
देकर चमक
नमक खाकर न
निभा पाये नमक
प्यार से निज अंक लेते
और देते पर कतर

किरण की सौगन्ध खाते
तम उगल
जिन्दगी को मानते
केवल शगल
भाईचारा को समझ चारा
चतुर बनकर रहे चर

--अखिलेश गुरु

25 नवंबर 2009

१३- सूना-सूना घर का द्वार

सूना-सूना घर का द्वार
मना रहे
कैसा त्यौहार?

भौजाई के बोल नहीं
बजते ढोलक - ढोल नहीं
नहीं अल्पना-रांगोली
खाली रिश्तों की झोली
पूछ रहे: ''हाऊ यू आर?''
मना रहे
कैसा त्यौहार?
*
माटी का दीपक गुमसुम
चौक न डाल रहे हम - तुम
सज्जित हुआ विदेशी माल
कुटिया है बेबस-बेहाल
श्रमजीवी रोता बेजार
मना रहे
कैसा त्यौहार?
*
हेलो!, हाय!! मोबाइल ने
हमें न गले दिया मिलने
नातों को जीता छल ने
लगी चाँदनी चुप ढलने
'सलिल' न प्रवाहित नेह-बयार.
मना रहे
कैसा त्यौहार?

--संजीव सलिल

१२- दीप दान

दीपक दान
करें....

दीपक का आलोक
लोक में बांटें.
गहन टहनियाँ
अंधकार की छांटें.
खुद का जीवन दीप समान
करें....

बिना चाह के मिली
किसे हैं राहें.
आलस वालों के
हिस्से में आहें.
ज्योति पर्व है ज्योतिर्प्राण
करें...

पं० गिरिमोहन गुरु

११- दीप जलें इस बार

दीप जलें इस बार, जहाँ हो सबसे ज्यादा तम यारों|

जहाँ जल रहे बल्ब, ट्यूबलाइट, झालर और हैलोजन हैं,
वहाँ उपेक्षित सा ही जलता-रहता दीये का तन-मन है,
दीपक फबता, जहाँ रोशनी होती सबसे कम यारों,
दीप जलें इस बार, जहाँ हो सबसे ज्यादा तम यारों|

बेमन से जैरमी करैं जो, उनसे क्या बोलें-बतियाएँ,
हाय, हेलो, हाऊ डू यू डू, बहुत हुई औपचारिकताएँ,
उनसे बाँटो खुशी, जिन्हें हो सबसे ज्यादा गम यारों,
दीप जलें इस बार, जहाँ हो सबसे ज्यादा तम यारों|

गुझिया, पापड़, पूड़ी, सिंवई और कचौड़ी हो आलू की
लड्डू, पेड़ा, बर्फी, पेंठा औ’ खाओ साही-बालू की
उन्हें न भूलो पर जिनको मिलता यह सबसे कम यारों
दीप जलें इस बार, जहाँ हो सबसे ज्यादा तम यारों|

डायनामाइट के ढेरों ने अमन-चैन को आग लगाई
कुछ लोगों के स्वार्थ-घृणा ने, दिल में दीवारें उठवाईं
आओ ये दीवारें तोड़ें, मार पटकुआ-बम यारों,
दीप जलें इस बार, जहाँ हो सबसे ज्यादा तम यारों|

- धर्मेन्द्र कुमार सिंह ’सज्जन’

१०- चिरागों के दिल में

चरागों के दिल में उजाला जो होता
नहीं उसके तल में अंधेरा ये होता

बुझते नहीं, तेल बाती के दीये
हँसते यहाँ अपनी माटी के दीये
छोटी न होती, मेहनत की रोटी
बेईमान का बोलबाला न होता

आती नहीं ऐसी रातें शहर में
लगती नहीं तन की हाटें शहर में
मासूम सपने बिखरते न ऐसे
अपने पराये का पाला न होता

किसने लिखा है किस्मत का लेखा
दुनिया हुई है नजरों का धोखा
फ़ानूस इतने बनाए हैं, जिसने
उसे भी मयस्सर उजाला ये होता

शंभु शरण मंडल
धनबाद झारखंड

९- आराधन

दीप देहरी का कहलाऊँ
बनूँ प्रीत प्रतीक मुस्काऊँ
बाहर भीतर ज्योत जगाकर
पथ भटकों को राह दिखाऊँ
तेरी बगिया का फूल बनूँ
रागों से आह्लाद जगाऊँ
तोड़े मसले चाहे कोई
सिर्फ नेह सुगंध फैलाऊँ
वंशी का स्वर यदि मैं पाऊँ
हृदय हृदय तरंग भर जाऊँ
छेड़ छेड़ नवीन ताने में
मर्म सभी का छू पाऊँ
जीवन चाहे जो भी पाऊँ
समर्पित देश को कर जाऊँ
हो तेरा आराधन यूँ ही
दुखियों के काम मैं आऊँ

वन्दना सीकर राजस्थान

८- जलता दिया

जलता दिया
जलाये जिया
पास नहीं जब होते पिया
जलता दिया...

दीवाली की रौनक
करे मन को बेकल
कैसे सँभालूं मैं
उठती जो हलचल,
जब देखूं ये जगमग
तो तड़पे हिया
जलता दिया...

चमकीली लड़ियों ने
है जादू बिखेरा
विरह की घड़ियों ने
मगर मुझको घेरा,
अंगारों सी पल-पल
जले है उमरिया
जलता दिया...

पूछे है मुझसे ये
अनारों का मौसम
ऐसे में होते क्यों
परदेसी हमदम,
फुलझरियां क्या जाने
जो मैंने जिया
जलता दिया...

निर्मल सिद्धू

18 नवंबर 2009

७- एक दीप जलाएं

एक दीप जलाएं नव आगंतुकों के नाम।
जिनकी किलकारियों से जीवन मिल।
इस खंडहर घर को।।

एक दीप जलाएं भाई-बहन के रिश्तों की।
जिसमें बहन के प्रेम और समर्पण के साथ
शामिल हो भाई का स्नेह भी।।
जो आलोकित हो सहोदर सा प्रकाशवान बनकर।
ताकि मिट जाए मन के अमावस का अंधकार।।

एक दीप जलाएं बंधुत्व की रौशनी से सराबोर,
जो सजा हो सखी के अपनत्व से।
भावों के जाने-अनजाने अर्थ से।।
जीवन के हर मोड़ पर जो
साथी बनकर राह दिखाए।
चिर-प्रसन्न लौ की भांति,
दुःख के झंझावत में भी मुस्काए।।

एक दीप जलाकर तरुणाई की बेला में,
दाम्पत्य का उजास भरें।
जो साक्षी बने जीवन के हर क्षण का।
जय-पराजय का स्वार्थ भावन से परे,
निःस्वार्थ मन का।।
जहां शब्द मौन हो जाते हैं रिश्तों की परछाई में।
न्यौछावर कर प्रेम-सुधा भावों की अंगनाई मे।।

जलाएं एक दीपशिखा
घर के बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद से आलोकित।
क्योंकि यही तो हैं वो प्रकाश-पुंज
जिनकी स्नेहमयी छत्रछाया में फलते हैं रिश्तों के फूल।।
जो अपनी चिर मुस्कान को
सर्वदा सहेजकर रखते हैं।
ताकि उसकी आभा से
परिवार के हर सदस्य का जीवन खुशियों से दमकता रहे।।

और अंत में एक दीपक रौशन करें
महाप्रयाण की मंगलयात्रा पर।
क्योंकि खुद को होम करना ही तो
जीवन-तप कहलाता है।।
हर आहुति के साथ ये जीवन
प्रभू की पावन ज्योति में विलीन हो जाता है।
और तब अंतर का तम सारा उजियारे से भर जाता है।।

नियति वर्मा, जयपुर

14 नवंबर 2009

६- बहुत दीप हमने जलाये धरा पर

बहुत दीप हमने जलाये धरा पर
मिटा किन्तु पाये न मन का अंधेरा।

गलित कुप्रथाओं की शापित अहिल्या
है पाषाण बंधन में अब भी बंधी सी
मनुष्यत्व जग में प्रतिष्ठित हुआ कब
रही जाति पंथों की बेड़ी पड़ी सी
कहाँ हैं नई चेतना के दिवाकर
कहाँ हैं वो समता-क्षितिज का सवेरा।

सुलभ हैं अंधेरे सभी को हमेशा
हुआ रश्मियों का ही वंध्याकरण है
जिन्हे सौंप कर घर, हुआ गर्व हमको
उन्होने ही उसका किया अपहरण है
भटक कर के यह सार्थ पहुँचा वहाँ पर
जहाँ पर पड़ा था लुटेरों का डेरा।

इसे दोष देना, उसे दोष देना
विफलता पे अपनी, प्रथा है पुरानी
वहीं आके फिर से खडे़ हो गये हम
जहाँ से शुरू की गयी थी कहानी
सभी दुर्ग ढहते रहे चरमराकर
व्यवस्था ने बस, अपने आसन को घेरा।

बहुत दीप हमने जलाये धरा पर
मिटा किन्तु पाये न मन का अंधेरा॥

--अमित

12 नवंबर 2009

५- दीपक जलाती ही रही

दीपक जलाती ही रही
हर साल

दिनरात पिसती बुदबुदाती
विवशता की मूर्ति वह
पीर ओढ़े देह पर
कर्ज में डूबी हुई
उपवास रखती पर्व पर
लक्ष्मी कब पास फटकी
जिंदगी बेहाल
दीपक जलाती ही रही
हर साल

काँच सी खंडित पड़ी संभावनाएँ
किर्च किर्च हो गई हैं आशाएँ
पर मरती नहीं संवेदनाएँ
मधुबन का सलोना स्वप्न
मरुथल हो गया
रह गया केवल सवाल
जिंदगी बेहाल
दीपक जलाती ही रही
हर साल

वह कहानी बनी आँसुओं में तैरती
प्रश्न केवल पूछती
कब छँटेगा यह अँधेरा
कब जलेगा यह दलिद्दर
प्रश्न तो बस प्रश्न बन रह गए
दे न पाया आज तक कोई जवाब
जिंदगी बेहाल
दीपक जलाती ही रही
हर साल

--निर्मला जोशी

10 नवंबर 2009

४- जगत के अज्ञान तम में

जगत के अज्ञान तम में
दीप अभिनन्दन तुम्हारा...

यदि तिमिर से जूझने का
प्रण लिये हो
ज्योति जल में डूब
अवगाहन किये हो
तो असंख्यक बार है
वन्दन तुम्हारा...

आखिरी दम तक दमन
तम का किया हो
जग किया आलोकमय
न भ्रम दिया हो
तो ॠणी है देश का
कण कण तुम्हारा...

--विपन्नबुद्धि

7 नवंबर 2009

३- साँझ का दीप

रोक नहीं सकती हूँ नभ से
सूरज का अवसान कभी
गोधूली की वेला में मैं
साँझ का दीप जलाती हूँ


कोई दुख अमावस जैसा
कभी किसी को घेरे रहता
कभी कहीं कोई आँसू का कण
अँखियों के कोरों से बहता

सरस स्नेहिल गीतों से मैं
सब का धीर बँधाती हूँ
मैं मंगल वाद्य बजाती हूँ


नीले अम्बर की थाली में
तारक दीप जलाता कोई
उल्काओं की फुलझड़ियों से
दिशा-दिशा सजाता कोई

सतरंगी रंगोली से मैं
सब का द्वार सजाती हूँ
मैं ज्योति पर्व मनाती हूँ


सुख सुषमा की बाँधूं गठरी
जग में अलख जगाऊँ आज
अँजली भर-भर बाँटूं खुशियाँ
ले लूँ सारी पीर -विषाद


उदयाचल के शिखरों से मैं
भोर नयी ले आती हूँ
किरणों की लौ बिखराती हूँ


हर साँझ दीप जलाती हूँ

-- शशि पाधा

3 नवंबर 2009

२- एक गहरी श्‍वांस लेकर

एक गहरी श्‍वांस लेकर!
मैं अंधेरे में खड़ा था, रोशनी की आस लेकर।

मिट गया गहन-तिमिर
जल गया जब दीप कोई।
दे गया मोती धवल
पड़ा तट पर सीप कोई।
उतर आए लो! सितारे झील में आकाश लेकर।

मन कहीं उलझा हुआ था,
मकड़ियों सा जाल बुनकर।
झँझड़ियों की राह आती
स्वर्ण किरण एकाध चुनकर।
उठा गहरी नींद से मैं, इक नया विश्‍वास लेकर।

छोड़ दी बैसाखियाँ जब
चरण ख़ुद चलने लगे।
हृदय में नव सृजन के
भाव फिर पलने लगे।
भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
समय देहरी पर खड़ा है हाथ में मधुमास लेकर।

--मनोज कुमार

2 नवंबर 2009

कार्यशाला-5

कार्यशाला-5 में दीपावली के अवसर पर केवल 6 रचनाएँ आई हैं। इसलिए इसकी तिथि बढ़ाकर 15 नवंबर कर रहे हैं। जिन सदस्यों ने अपनी रचनाएँ नहीं भेजी हैं वे अपने नवगीत 15 नवंबर तक भेज सकते हैं।- पूर्णिमा वर्मन