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12 मई 2012

कार्यशाला-२१ समीक्षात्मक टिप्पणी

नवगीत की पाठशाला का निरंतर चलते रहना इस बात का प्रमाण है कि नवगीत को पसंद किया जा रहा है और नये लोग नवगीत सीखना चाहते हैं। नवगीत में नई कविता का कथ्य लयात्मकता की रेशमी डोर में आवद्ध कर जब प्रस्तुत किया जाता है तो वह अपना ऐसा प्रभाव छोड़ता है कि पाठक या श्रोता को ठीक उसी तरह से सम्मोहित होने लगते हैं  जैसे हरसिंगार का पुष्प अपनी सघन जादुई गंध से मन को मोह लेता है।
कार्यशाला २१ के लिए हरसिंगार विषय दिया गया था, जिस पर २१ नवगीत प्रकाशित किये गए। कुमार रवीन्द्र का पाठशाला में सक्रिय रहना बहुत बड़ी बात है, उनके नवगीत न जाने कितनों को सीखने की प्रेरणा देते रहते हैं। वे नवगीत लिखते हैं तो लगता है कि सीधे-सीधे बात कर रहे हैं-
"उधर रूपसी धूप
नदी पर तैर रही है
इधर हवा ने
छुवन-पर्व की कथा कही है

साँस सुखी है -
कौंध जग रही कनखी के पहले दुलार की "

             -कुमार रवीन्द्र

हमारे समाज में हरसिंगार तो खिल रहे हैं पर उसकी सुगंध को गली कूँचों तक फैलने से रोके जाने के असफल प्रयास स्वार्थवश सदा से होते रहे हैं, इसी की एक झलक यहाँ देखी जा सकती है--
" सहमी दूब
बाँस गुमसुम है
कोंपल डरी-डरी
बूढ़े बरगद की
आँखों में
खामोशी पसरी
बैठा दिए गए
जाने क्यों
गंधों पर पहरे ।"
और जब गंधों पर पहरे बैठाने जैसी हरकतें की जाती हैं तब स्वाभाविकता प्रभावित होती ही है--
" वीरानापन
और बढ़ गया
जंगल देह हुई
हरिणी की
चंचल-चितवन में
भय की छुईमुई
टोने की ज़द से
अब आखिर
बाहर कौन करे "

-डा० जगदीश व्योम

संजीव सलिल जीवन की खुरदरी जमीन पर हरसिंगार के खिलने का तब अहसास कर लेते है जब जीवन संगिनी खिलखिलाती दिख जाती है--

" खिलखिलायीं पल भर तुम
हरसिंगार मुस्काए
पनघट खलिहान साथ,
कर-कुदाल-कलश हाथ
सजनी-सिन्दूर सजा-
कब-कैसे सजन-माथ?
हिलमिल चाँदनी-धूप
धूप-छाँव बन गाए"

-संजीव सलिल

जयकृष्ण राय तुषार हरसिंगार के मादक फूलों की अनुभूति प्रिय के प्रेमपगी चितवन में कर लेते हैं-

" बाँध दिए
नज़रों से फूल हरसिंगार के
तुमने कुछ बोल दिया
चर्चे हैं प्यार के
बलखाती
नदियों के संग आज बहना है
अनकहा रहा जो कुछ आज वही कहना है
अब तक हम दर्शक थे नदी के
कगार के

- जयकृष्ण राय तुषार

डा० राजेन्द्र गौतम के नवगीत अपनी अलग पहचान रखते हैं, उनके पास लोक जीवन के अनुभव का अद्भुत खजाना है, बोलचाल की भाषा में वे जो कह देते हैं उससे कहीं अन्दर तक छुअन और अनुभूतिजन्य सिहरन का अहसास होने लगता है, स्मृतियों के बन्द कपाट जब खुलते हैं तो मन मृग न जाने कहाँ कहाँ तक कुलाँचे मारता हुआ पहुँच जाता है--

"यद्यपि अपनी चेतनता के
बन्द कपाट किये हूँ
पलकों में वह साँझ शिशिर की
फिर भी घिर-घिर आती

पास अँगीठी के बतियाती
बैठी रहतीं रातें
दीवारों पर काँपा करती
लपटों की परछाई
मन्द आँच पर हाथ सेंकते
राख हुई सब बातें
यादों के धब्बों-सी बिखरी
शेष रही कुछ स्याही
आँधी, पानी, तूफानों ने
लेख मिटा डाले वे
जिनकी गन्ध कहीं से उड़ कर
अब भी मुझ तक आती

-डॉ. राजेन्द्र गौतम


महानगरों के अतिरिक्त व्यामोह ने गाँव की संस्कृति को कुचल कर रख दिया है, अब हरसिंगार उगायें भी तो कहाँ उगायें ? कल्पना रामानी ने इस अभावजनक अनुभूति को नवगीत में सीधे सरल शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है-

" अब न रहा वो गाँव न आँगन,
छूट गया फूलों से प्यार।
छोटे फ्लैट चार दीवारें,
कहाँ उगाऊँ हरसिंगार।
खुशगवारयादों का साथी,
बसा लिया मन उपवन में "

-कल्पना रामानी

जीवन की क्षणभंगुरता ही जीवन का सत्य है, इसका अहसास हमें होना ही चाहिए, महेन्द्र भटनागर हरसिंगार के फूल की क्षणभंगुरता के माध्यम से सचेत करते हैं कि थोड़े समय में जैसे हरसिंगार सुगंध लुटाकर मन मन में बस जाता है तो फिर हम भी वही करें--
" जीवन हमारा
फूल हरसिंगार-सा
जो खिल रहा है आज,
कल झर जायगा "

-महेन्द्र भटनागर

शशि पाधा अपने देश से बाहर रहकर यहाँ की सांस्कृतिक सुगंध को मन्द नहीं होने देना चाहती हैं, उन्हें लगता है कि हरसिंगार के फूलों की गंध में माँ का प्यार कहीं छिपा हुआ है-

" घर अँगना फिर हुआ सुवासित
तुलसी -चौरा धूप धुला
ठाकुर द्वारे चन्दन महके
देहरी का पट खुला-खुला
आशीषों के
शीतल झोंके
आँचल बाँध के लाई माँ "
-शशि पाधा

त्रिलोक सिंह ठकुरेला नवगीत की प्रकृति को बहुत करीब से पहचानते हैं, वे कुछ ऐसा प्रस्तुत करते हैं कि उनका नवगीत गुनगुनाने का मन हो ही उठता है, सकारात्मक सोच और संघर्षों से जूझने की प्रेरणा से युक्त ठकुरेला जी के नवगीत बहुत प्रभावित करते हैं--

" मन के द्वारे पर
खुशियों के
हरसिंगार रखो.
जीवन की ऋतुएँ बदलेंगी,
दिन फिर जायेंगे,
और अचानक आतप वाले
मौसम आयेंगे,
संबंधों की
इस गठरी में
थोडा प्यार रखो "

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

शारदा मोंगा ने हरसिंगार के फूलों का मदिर गंध बिखराना और मन्द गति से उनका झरना, मालिन का बीन बीन कर डलिया भरना .......... नवगीत में पिरोकर दृश्य बिम्ब उपस्थित कर दिया है--
" गंध मदिर बिखरे
रात भर हरसिंगार झरे

श्वेत रंग की बिछी चदरिया,
शोभित हरी घास पर हर दिन
चुन चुन हार गूँथ कर मालिन,
डलिया खूब भरे,
रात भर हरसिंगार झरे "
-शारदा मोंगा

वरिष्ठ नवगीतकार डा० भारतेन्दु मिश्र हरसिंगार का मुट्ठी से छूट जाना एक भरम का टूट जाना भर मानते हैं-
" चलो यार
एक भरम टूट गया
मुट्ठी से हरसिंगार छूट गया

पीतल के छल्ले पर
प्यार की निशानी
उसकी नादानी
ठगी गयी फिर शकुंतला
कोई दुष्यंत उसे लूट गया"

-डॉ. भारतेन्दु मिश्र

डा० राधेश्याम बंधु अपने नवगीतों में संस्कृति को सुरक्षित रखने की चिन्ता के साथ साथ जीवन में प्यार और विश्वास को बनाये रखने का आवाहन करते रहते हैं, उनके पास जीवन्त भाषा तो है ही उनकी प्रस्तुति ऐसी है कि नवगीत सहज ही मन के किसी कोने में बैठ जाता है--

" फिर फिर
जेठ तपेगा आँगन,
हरियल पेड लगाये रखना,
विश्वासों के हरसिंगार की
शीतल छाँव
बचाये रखना।
हर यात्रा
खो गयी तपन में,
सड़कें छायाहीन हो गयीं,
बस्ती-बस्ती
लू से झुलसी,
गलियाँ सब गमगीन हो गईं।
थका बटोही लौट न जाये,
सुधि की जुही
खिलाये रखना ..."

- राधेश्याम बंधु

कार्यशाला के अन्य नवगीतों में हरसिंगार के माध्यम से जीवन के तमाम प्रसंगों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया, इनमें - श्री अनिल वर्मा , श्री धर्मेन्द्र कुमार सिंह, डॉ. मधु प्रधान, श्री क्षेत्रपाल शर्मा, श्रीकान्त मिश्र 'कान्त', सुश्री रचना श्रीवास्तव, श्री परमेश्वर फुंकवाल, श्री अश्विनी कुमार विष्णु के नवगीत अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने में सफल रहे हैं। जिन नवगीतकारों ने कार्यशाला में सहभागिता की और इस बहाने नवगीत रचकर पोस्ट किया उन सभी का पाठशाला के पाठकों की ओर से आभार और जिन पाठकों ने पाठशाला के हरसिंगारी सुगंध से युक्त नवगीतों को पढ़ा और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाएँ लिखीं उन सभी का कार्यशाला के नवगीतकारों की ओर से तथा पाठशाला के संयोजकों की ओर से बहुत बहुत आभार।

प्रस्तुति-

डा० जगदीश व्योम



9 अप्रैल 2012

२१. घटनाएँ हरसिंगार की

गंध-हार की
भीनी-भीनी हैं घटनाएँ हरसिंगार की

उधर रूपसी धूप
नदी पर तैर रही है
इधर हवा ने
छुवन-पर्व की कथा कही है

साँस सुखी है -
कौंध जग रही कनखी के पहले दुलार की

पारिजात का बिरछ
हमारे आँगन में भी
फूल झरे हैं रात
खिले हैं कुछ मन में भी

साखी देतीं
पीतबरन तितलियाँ सुबह के खुले द्वार की

इक पिडुकी का जोड़ा रहता
हरसिंगार पर
वहीं पंछियों के देवा का
है पूजाघर

पत्ते-पत्ते ताल दे रहे
लय-धुन मीठी है बयार की 

कुमार रवीन्द्र
हिसार

8 अप्रैल 2012

२०. हरसिंगार झरे

सारी रात
महक बिखराकर
हरसिंगार झरे ।

सहमी दूब
बाँस गुमसुम है
कोंपल डरी-डरी
बूढ़े बरगद की
आँखों में
खामोशी पसरी
बैठा दिए गए
जाने क्यों
गंधों पर पहरे ।

वीरानापन
और बढ़ गया
जंगल देह हुई
हरिणी की
चंचल-चितवन में
भय की छुईमुई
टोने की ज़द से
अब आखिर
बाहर कौन करे ।

सघन गंध
फैलाने वाला
व्याकुल है महुआ
त्रिपिटक बाँच रहा
सदियों से
पीपल मौन हुआ
चीवर पाने की
आशा में
कितने युग ठहरे ।

डा० जगदीश व्योम
नौयडा

7 अप्रैल 2012

१९. हरसिंगार मुस्काए

खिलखिलायीं पल भर तुम
हरसिंगार मुस्काए

अँखियों के पारिजात
उठें-गिरें पलक-पात
हरिचंदन देह धवल
मंदारी मन प्रभात
शुक्लांगी नयनों में
शेफाली शरमाए

परजाता मन भाता
अनकहनी कह जाता
महुआ तन महक रहा
टेसू रंग दिखलाता
फागुन में सावन की
हो प्रतीति भरमाए

पनघट खलिहान साथ,
कर-कुदाल-कलश हाथ
सजनी-सिन्दूर सजा-
कब-कैसे सजन-माथ?
हिलमिल चाँदनी-धूप
धूप-छाँव बन गाए

संजीव सलिल
जबलपुर

6 अप्रैल 2012

१८. फूल हरसिंगार के

बाँध दिए
नज़रों से फूल हरसिंगार के
तुमने कुछ बोल दिया
चर्चे हैं प्यार के

मौसम का
रंग-रूप और अधिक निखरा है
सैलानी मन मेरा आसपास बिखरा है
आज मिला कोई बिन चिट्ठी,
बिन तार के

उतरे हैं
पंछी ये झुकी हुई डाल से
रिझा गया कोई फिर नैन, नक्श, चाल से
टीले मुस्तैद खड़े जुल्फ़ को
संवार के

बलखाती
नदियों के संग आज बहना है
अनकहा रहा जो कुछ आज वही कहना है
अब तक हम दर्शक थे नदी के
कगार के

- जयकृष्ण राय तुषार
इलाहाबाद

5 अप्रैल 2012

१७. डार फिर बहुरि गई हरसिंगार की

वेला सकाल की सोनई भई,
दूर खर औखर, जुत गए खेत
सुर और लय में बयार बही
नवराते गुनगुनाए तितलियों समेत
सुधि आई दशमी, जीत दीप-हार की,

डार ....
काँस फाँस से ये नोंक से बबूल
कट गए,ॠतु बदल रही
लाड़लों को भाए निर्माण का संकल्प
जड़ता कटुता के ओरे सी नींव ढही
हरसाई धान और धरती पियार की

डार...
पोटरी हैं गंध की ये डंठ
कंद है मकरंद
कभी जड़ और चेतन कहीं
प्रकृति है अचरजभरी औ स्वच्छंद
पर्व रूपी रस गंध के शृंगार की
डार...फिर महक

क्षेत्रपाल शर्मा
अलीगढ़

4 अप्रैल 2012

१६. शेफाली से सुमन न झरते

यद्यपि अपनी चेतनता के
बन्द कपाट किये हूँ
पलकों में वह साँझ शिशिर की
फिर भी घिर-घिर आती

पास अँगीठी के बतियाती
बैठी रहतीं रातें
दीवारों पर काँपा करती
लपटों की परछाई
मन्द आँच पर हाथ सेंकते
राख हुई सब बातें
यादों के धब्बों-सी बिखरी
शेष रही कुछ स्याही
आँधी, पानी, तूफानों ने
लेख मिटा डाले वे
जिनकी गन्ध कहीं से उड़ कर
अब भी मुझ तक आती

बजती थी कुछ दूर बाँसुरी
चीड़ों के घन वन में
जिसकी अनुगूँजें उठतीं थीं
कुहराई घाटी में
सीमान्तों की चुप्पी अंकित
जिसके मधुर क्वणन में
मोती ढरकें रात-रात भर
दूबों की पाटी में
पर किस शीशमहल में बन्दी
अब वे सब झंकृतियाँ
जिनकी गूँज कहीं से
मेरे कानों में भर जाती

दरवाजों से या खिड़की से
घुसने को व्याकुल-सी
दूरागत उस वृद्ध हवा की
थकी-थकी आलापें
शेफाली से सुमन न झरते
ठिठकी वह आकुल-सी
गलियारे में नहीं चहकतीं
मौसम की पगचापें
सूखी वे रंगीन पँखुरियाँ
पड़ीं धूल में होंगी
उनकी छुवन अकेलेपन में
अब भी क्यों सिहराती

-डॉ. राजेन्द्र गौतम
नई दिल्ली

2 अप्रैल 2012

१४. हरसिंगार से रिश्ते

पावन हरसिंगार से रिश्ते
टूटे न ये प्यार के रिश्ते

धरती के
आँचल पर जरदोजी रचते
डोली चढ़ पवनों की मंद मंद हँसते
ऋतुओं खिले बहार के रिश्ते

आँगने के
हाथों में सजते हैं ऐसे
मूँगे और मोती के कंगन हो जैसे
सावन मिले फुहार के रिश्ते

पेड़ों के छज्जे
से उचक उचक गिरते
घर की दिवारों में रंग कई भरते
अम्मा की मनुहार के रिश्ते

रचना श्रीवास्तव
यू.एस.ए.

1 अप्रैल 2012

१३. कहाँ उगाऊँ हरसिंगार

बचपन में पौधा रोपा था,
भीगे भीगे सावन में।
बरसों बाद खड़ी हूँ फिर से,
यादों के उस आँगन में।

पारिजात का पौधा है यह,
माँ ने यही बताया था,
मुरझाएगा,बार बार मत,
छुओ,यही समझाया था।
सुनी अनसुनी कर देती थी,
सहलाती थी क्षण-क्षण में।

नन्हा पौधा बड़ा हो गया,
कलियों से गुलजार हुआ।
सारा आलम लगा महकने,
हर दिन हरसिंगार हुआ।
तना हिलाती ढेरों पाती।
भर लेती थी दामन में।

स्वर्ग लोकसे भू पर भेजा,
इसे कौन से दाता ने,
श्वेत पंखुरी, केसर डांडी,
कैसे रचाविधाता ने।
रात को सोता कली रूप में,
सुबह जागता यौवन में।

अब न रहा वो गाँव न आँगन,
छूट गया फूलों से प्यार।
छोटे फ्लैट चार दीवारें,
कहाँ उगाऊँ हरसिंगार।
खुशगवारयादों का साथी,
बसा लिया मन उपवन में।

-कल्पना रामानी
मुंबई

31 मार्च 2012

१२. जीवन हमारा फूल हरसिंगार-सा

जीवन हमारा
फूल हरसिंगार-सा
जो खिल रहा है आज,
कल झर जायगा !

इसलिए, हर पल विरल
परिपूर्ण हो रस-रंग से,
मधु-प्यार से !
डोलता अविरल रहे हर उर
उमंगों के उमड़ते ज्वार से !

एक दिन, आख़िर,
चमकती हर किरण बुझ जायगी...
और चारों ओर
बस, गहरा अँधेरा छायगा !

मत लगाओ द्वार अधरों के
दमकती दूधिया मुसकान पर,
हो नहीं प्रतिबंध कोई
प्राण-वीणा पर थिरकते
ज़िन्दगी के गान पर !

जीवन हमारा
फूल हरसिंगार-सा
एक दिन उड़ जायगा सब ;
फिर न वापस आयगा !

-महेन्द्र भटनागर
ग्वालियर

30 मार्च 2012

११. झर कर भी

तारों सा
जीवन पाया है
सुबह हुई और बीत गए


जैसे झरते
झरने कल कल
रूप विरचते पल पल प्रतिपल
ऊँचाई बस रास न आई
सुंदरता
गिरकर ही पाई
पावन करते देवों के सर
झर कर भी वो जीत गए

प्रणय
निवेदन नभ का जैसे
धरती के होठों पर बिखरे
मोती ओस कणों के पहने
बोझिल पलकें
जागें निखरें
प्राजक्ता के फूल गा रहे
गाये जो ना गीत गए

सुबह के
आँचल में सिंदूरी
श्वेत वसन काया महकी सी
रजनी अपना रूप बदल कर
प्रेमगली
फिरती बहकी सी
गए नहीं मौसम बिरहा के
वर्षा, गर्मी, शीत गए

-परमेश्वर फुंकवाल
लखनऊ

29 मार्च 2012

१०. सपनों में हरसिंगार

रात उनींदी पलकों में
देखे थे खिलते हरसिंगार
सपनों में मिलने आई माँ

भोर किरण ने आकर चुपके
ऐसी छुअन लगाई अंग
पोर पोर सिहराए–काँपे
पात–पात सुनहरी रंग
झुकी–झरी थी
कोमल डार
चुनकर कलियाँ लाई माँ

घर अँगना फिर हुआ सुवासित
तुलसी –चौरा धूप धुला
ठाकुर द्वारे चन्दन महके
देहरी का पट खुला–खुला
आशीषों के
शीतल झोंके
आँचल बाँध के लाई माँ

गले मिली परदेसन बिटिया
नेह की बदरी बरस गई
बाँध तोड़ नयनों की नदिया
रेत किनारे सरस गई
भरी-भरी
अँखियों में फिर से
मूरत बनी समाई माँ

शशि पाधा
यू.एस.ए.

28 मार्च 2012

९. हरसिंगार रखो

मन के द्वारे पर
खुशियों के
हरसिंगार रखो.

जीवन की ऋतुएँ बदलेंगी,
दिन फिर जायेंगे,
और अचानक आतप वाले
मौसम आयेंगे,
संबंधों की
इस गठरी में
थोडा प्यार रखो.

सरल नहीं जीवन का यह पथ,
मिलकर काटेंगे ,
हम अपना पाथेय और सुख, दुःख
सब बाँटेंगे,
लौटा देना प्यार
फिर कभी,
अभी उधार रखो.

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
आबू रोड- ( राजस्थान )

27 मार्च 2012

८. हरसिंगार झरे

गंध मदिर बिखरे
रात भर हरसिंगार झरे

श्वेत रंग की बिछी चदरिया,
शोभित हरी घास पर हर दिन
चुन चुन हार गूँथ कर मालिन,
डलिया खूब भरे,
रात भर हरसिंगार झरे

सिंदूरी वृन्तों पर खिलती
छह छह श्वेत पंखुरी सुरभित
स्व सौंदर्य भार से गर्भित
औंधे मुँह गिरे
रात भर हरसिंगार झरे

-शारदा मोंगा
न्यूजीलैंड

26 मार्च 2012

७. एक भरम

चलो यार
एक भरम टूट गया
मुट्ठी से हरसिंगार छूट गया

पीतल के छल्ले पर
प्यार की निशानी
उसकी नादानी
ठगी गयी फिर शकुंतला
कोई दुष्यंत उसे लूट गया

आँखों की मछली ने
जाल कल बुने थे
इन्द्रधनु चुने थे
पानी मर गया धूप का
स्वर्णमुखी मंगलघट फूट गया

-डॉ. भारतेन्दु मिश्र
नई दिल्ली

25 मार्च 2012

६. मन हरसिंगार

तन उपवन
मन हरसिंगार

सरगम छेड़े पल-छिन
जलतरंग बाँह में
ऋतु ला बिछाए सब
रंग इसी छाँह में
करवट लिए मचला रहे
सिसके हँसे पीड़ा सहे
इस बाग़-वन
उस झील पार
हरसिंगार !

जुगनुओं की ज्योति पर
परीकथा लिखे
चरणामृत प्यास की
मरीचिका चखे
दौड़े थमे सँभले कभी
बिगड़े बने सँवरे कभी
तोड़े बुने
सपनों के हार
हरसिंगार !

-अश्विनी कुमार विष्णु
अकोला

५. आने वाले स्वागत

आनेवाले ! स्वागत !
जानेवाले ! विदा !
अगले चौराहे पर इन्तज़ार...
शुक्रिया !

ख़त लिखना- फागुनी बतास जब खुले !
हाँ, लिखना- दूध में गुलाल जब घुले !
लिखना जी : फूले जब हरसिंगार...
शुक्रिया !

बौर लगे आमों का हाल चाल भी लिखना !
मधु मासे बौने मन की उछाल भी लिखना !
लिखना : जब झुक-झूमे नीम-डार...
शुक्रिया !

लिखना : पोखर-तीरे हंस युग्म का होना ।
किरणों सिरहाने रखकर लहरों का सोना ।
लिखना : जब जलकुम्भी हो उधार...
शुक्रिया !

-शलभ श्रीराम सिंह

24 मार्च 2012

४. शीतल छाँव बचाए रखना

फिर फिर
जेठ तपेगा आँगन,
हरियल पेड लगाये रखना,
विश्वासों के हरसिंगार की
शीतल छाँव
बचाये रखना।

हर यात्रा
खो गयी तपन में,
सड़कें छायाहीन हो गयीं,
बस्ती-बस्ती
लू से झुलसी,
गलियाँ सब गमगीन हो गईं।
थका बटोही लौट न जाये,
सुधि की जुही
खिलाये रखना।

मुरझाई
रिश्तों की टहनी
यूँ संशय की उमस बढ़ी है,
भूल गये
पंछी उड़ना भी
यूँ राहों में तपन बढ़ी है।
घन का मौसम बीत न जाये,
वन्दनवार
सजाये रखना।

गुलमोहर
की छाया में भी
गर्म हवा की छुरियाँ चलतीं,
तुलसीचौरा
की मनुहारें
अब कोई अरदास न सुनतीं।
प्यासे सपने लौट न जायें,
दृग का दीप
जलाये रखना।

- राधेश्याम बंधु

22 मार्च 2012

३. हरसिंगार फूल से झरें

सिंदूरी सपने
पल-छिन
हरसिंगार फूल से झरें

झाँक गयी वातायन से
मंद-मंद बहती पुरवा
चुपके-चुपके जाने कब
खोल गयी पृष्ठ अनछुआ
बेटी की ओर ताकती
अम्मा का माँगना दुआ

होनी-अनहोनी
संभ्रम
अंतस में हूक सी भरें


जाड़े की बरखा में भी
छप्पर का टप-टप संगीत
श्रमिकों के चूल्हों पर ही
बढ़ती महँगाई की प्रीत
सड़कों से पगडंडी तक
गुमसुम हैं, रोटी के गीत
जीवन भर
आपाधापी
झरबेरी बेर सी फरें

- अनिल वर्मा
लखनऊ

21 मार्च 2012

२. फूल हँसी के

हरसिंगार हुआ जीवन

भागमभाग सुबह से मचती
रोज शहर में
हाट, सड़क, मंदिर, विद्यालय
घर, दफ़्तर में
दिनभर सब की कनपट्टी पर
समय रखे रहता है गन

देर शाम जब थककर सूरज
आया करता
चंदा तारों से घर जगमग
पाया करता
फिर जादू का काढ़ा पीकर
लौटे सूरज का बचपन

फूल हँसी के देर रात तक
महका करते
पर छूते ही पहली किरणें
सब हैं झरते
है अजीब इस युग का साँचा
पर ढलता जाता तन मन

धर्मेन्द्र कुमार सिंह
बिलासपुर