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5 जुलाई 2011

कार्यशाला- १६ समीक्षात्मक टिप्पणी - यश मालवीय

हिन्दी नवगीतों में पलाश प्रारम्भिक दौर से ही एक संघर्ष मुद्रा के प्रतीक के रूप में आता रहा है, जिजीविषा, जीने की जद्दोजहद, मूल्य बोध, उत्सवधर्मिता, जिंदगी के टेढ़े मेढ़े रास्ते, साँसों की आवाजाही, रोजमर्रा की कशमकश, आम आदमी का चेहरा... इन सारी रंग रेखाओं से आज के हिन्दी नवगीत ने अपनी एक सार्थक शक्ल अख्तियार की है। कह सकता हूँ कि मैं पलाश की उँगली पकड कर बडा हुआ हूँ मेरे सामने २३ नवगीत हस्ताक्षरों के विविधवर्णी, बहुरंगी गीतों के पृष्ठ खुले हैं, मुझे बरबस कवि पिता स्व. उमाकांत मालवीय जी की याद आ रही है, उनके नवगीत संग्रह का नाम ही है "सुबह रक्त पलाश की" यह संग्रह भरी इमरजेन्सी में प्रकाशित हुआ था और अपनी व्यंजित चेतना से इसने सामान्य आदमी के संघर्ष की ही बात की थी, तभी तो नवगीतकार कह पाया था -

सुबह रक्त पलाश की
तुमको निवेदित
ओ प्रतीक्षित

यह पलाश सही अर्थो मे हमारे जीवन में घुला हुआ है, इसने नवगीत को नवगति नव लय, ताल, छंद का नया आकाश दिया है। इस रचनात्मक यात्रा में हमारे साथ कुमार रवीन्द्र, नचिकेता, निर्मला जोशी, बृज श्रीवास्तव, पं गिरि मोहन जी जैसे सहयात्री है-

गिरि मोहन गुरू का यह गीत बहुत पास से आकर जैसे छू लेता है, वो कहते हैं-

मन हो रहा पलाश

पीछे पीछे दौड़ रहा अनुराग
नाम का नाग
जंगल जंगल आग लगी है
भाग सके तो भाग

खाली नहीं लाशघर कोई
कहाँ रखेगा लाश


यह वास्तव में यथार्थ की पराकाष्ठा का शिखर बिन्दु है, मन भीतर से काँप जाता है, इस कंपित मन के साथ जब हम आगे बठते है और जीवन शुक्ल के नवगीत ‘तन गुलाब का मन पलाश का’ के पास जाते हैं तो जैसे कोई हमारे जख्मों पर मरहम रख देता है जीवन जी कहते हैं-
मुझे दोष देने से पहले
दर्पन तो देखो
तन गुलाब का मन पलाश का
मुझे बुलाता है।


नवगीत वस्तुतः लोकोन्मुखी काव्य विधा है जिसने जन सरोकारों को केन्द्र में रखते हुए अपने समय और समाज को अभिव्यक्ति के स्वर दिये हैं, इस अभिव्यक्ति में पलाश किसी मुस्तैद सिपाही की तरह छाया बन कर उसके साथ रहा है, इस छाया में हमारे विगत की परछाई होती है तो आगत की आहट भी होती है, बृजनाथ जी का यह गीतांश देखें -

वासंती समझौते
दस्तख़त पलाश के।

गंधों के दावों का
एक बाग फूला
आँखों ने कलियों पर
डाल दिया झूला
कहाँ रहे कोयल के
आज मन हुलास के।


कोयल के मन की हुलास के लिए तड़पता नवगीत का मन लेकर जब हम और आगे बढ़ते हैं तो हमारे सामने निर्मला जोशी की एक अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति झिलमिला जाती है -

जिस दिन पलाश
जंगल में दहके
तुम आ जाना!

नववर्ष हर्ष उत्कर्ष
बहारों ने नापे!
हलदी वाले हाथों ने
दरवाजे छापे!

जिस दिन मौसम की गायक
कुहु कुहु कुहुके
तुम आ जाना!

दरअसल नवगीत हिन्दी गीत की जय यात्रा का ही एक उजला पक्ष है, नवगीत ने नई कविता के सामानांतर चल कर नई काव्य संवेदना को विस्तृत फलक पर दर्ज किया है, नवगीत के ही ‘एक्सटेंषन’ के रूप में नवगीत को देखता हूँ , जनवादी गीतकार नचिकेता की मूल चेतना भी नवगीत से ही प्राण वायु लेती है, वह कहते हैं-

फूले फूल पलाश कि सपने पर फैलाए रे

फिर मौसम के लाल अधर से
मुस्कानों की झींसी बरसे
आमों के मंजर की खुशबू पवन चुराए रे

जब हम नचिकेता की गीत चेतना के गलियारे से गुजरते हैं तो बरबस डा. जगदीश व्योम का नवगीत ‘हम पलाश के वन’ हमारी संवेदना को झंकझोर देता है, हम अपने आप को ही पलाश का वन समझने लगते हैं, जगदीश जी कहते हैं-

ये कैसी आपाधापी है
ये कैसा क्रंदन
दूर खड़े चुप रहे देखते
हम पलाश के वन

हम जो नवगीतों में जीवन का ही अनुगायन करने के पक्षधर रहे हैं वह बडी वेदना के साथ कुमार रवीन्द्र के शब्दों में यह कह उठते हैं -

आबोहवा धरा की बदली
बेमौसम होते हैं पतझर
जो पलाश.वन में रहते थे
महानगर में हैं वे बेघर
महाहाट से
सपने साहू कब लायेंगे
पता नहीं

इस प्रकार कह सकते हैं कि नवगीत को अपनी एक भरी पूरी जिंदगी समर्पित कर चुके नवगीतकार कुमार रवीन्द्र से लेकर शेषधर तिवारी जैसे ताजा हस्ताक्षरों तक नवगीतकारों ने नएपन का परचम लहराया है और इस परचम को पलाश ने अपनी आत्मा का रंग दिया है, पलाश ऐसी स्थिति में केवल एक फूल ही नहीं हमारी संवेदनाओं का संवाहक भी बन जाता है। आज जब पूरी की पूरी संस्कृति ही हाशिये पर चली जा रही है, एसे प्रतीकों और बिम्बों का उठाना वास्तव में मानीखेज है और यहीं पर आकर नबगीत की कार्यषाला एक सार्थक सिद्धि के रूप में परिणत हो जाती है, नचिकेता, और जीवन शुक्ल जैसे रचनाकारों को बार बार पढ़ना एक नया अस्वाद दे जाता है।

नए नवगीतकारों की रचनात्मकता भी आश्वस्त करती है उनके पास कथ्य का एक बड़ा आसमान तो है पर शायद वह शिल्प पर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे हैं यदि उनके गीतों में शिल्प शिथिल न पड़े तो नवगीत के भविष्य के प्रति और आश्वस्ति हो सकती है, शायद यही नवगीत की कार्यशाला आयोजित करने का एक सर्जनात्मक उद्देश्य भी है, गीत प्रथमतः गीत होना चाहिए, नवगीत होना उसका अगला सोपान है, इसलिए नवगीत को भी गीत के ही छंद की तरह कसा होना चाहिए, नवगीत की कार्यशाला में पलाश विषय के अन्तर्गत ज्यादातर नवगीत इस निकष पर खरे उतरते हैं।

निश्चित ही पूरी ताकत के साथ हिन्दी नवगीत अपनी पहचान बनाने में सक्षम हो रहा है, राही जी, धर्मेद्र कुमार, प्रभुदयाल, रचना श्रीवास्तव, श्याम बिहारी के नवगीत अलग से ध्यान खींचते हैं

- यश मालवीय
इलाहाबाद

27 जून 2011

२३. दिन टेसू के फूलों वाले


दिन
टेसू के फूलों वाले कब आयेंगे
पता नहीं

सूरज-चंदा से हमजोली
नहीं रही अब अपने बस की
देह बुढ़ाई -
इच्छाएँ भी हुईं अपाहिज
दरस-परस की
आम-गुलमोहर
चैती-आल्हा कब गायेंगे
पता नहीं

आबोहवा धरा की बदली
बेमौसम होते हैं पतझर
जो पलाश-वन में रहते थे
महानगर में हैं वे बेघर
महाहाट से
सपने साहू कब लायेंगे
पता नहीं

वृन्दावनवासी देवा भी
बैठे भौंचक सिंधु-किनारे
आने वाले पोत वहीं हैं
जिनसे बरसेंगे अंगारे
बरखा के
शीतल-जल मेघा कब छायेंगे
पता नहीं

- कुमार रवीन्द्र

25 जून 2011

२२. हम पलाश के वन

ये कैसी आपाधापी है
ये कैसा क्रंदन
दूर खड़े चुप रहे देखते
हम पलाश के वन

तीन पात से बढ़े न आगे
कितने युग बीते
अभिशापित हैं जनम-जनम से
हाथ रहे रीते
सहते रहे ताप, वर्षा
पर नहीं किया क्रंदन
हम पलाश के वन

जो आया उसने धमकाया
हम शोषित ठहरे
राजमहल के द्वार, कंगूरे
सब निकले बहरे
करती रहीं पीढ़ियाँ फिर भी
झुक-झुक अभिनंदन
हम पलाश के वन

धारा के प्रतिकूल चले हम
जिद्दीपन पाया
ऋतु वसंत में नहीं
ताप में पुलक उठी काया
चमक दमक से दूर
हमारी बस्ती है निर्जन
हम पलाश के वन

-डा० जगदीश व्योम

24 जून 2011

२१. हुए क्यों पलाश रंग रंगत विहीन

हुए क्यों पलाश
रंग रंगत विहीन
उपवन का हृदय ज्यों
दग्ध हत मलीन

चंदा क्यों कुम्हलाया
सूरज क्यों मौन है
रजनी का तमस द्वार
खोलता वो कौन है
कहो किन सवालों में
हुये हो निलीन

बोलो पलाश
क्या बात तुम्हें पता है
आज सत्य कहना भी
जुर्म और खता है
छल कपट मक्कारी
मूल्य हैं नवीन

ऋतुचक्र बदला है
बदल गई सोच
जिसके जो समाने है
रहा वही नोच
इसने ही
लालिमा ली मुझसे छीन

कौवे उलूक बाज
हुये श्वेतपोश
शुक पिक मयूर हंस
हो गए खामोश
घोंघा सिंहासन पर
हुआ है आसीन

विषधर खूँखार बड़े
विचर रहे वक्ष खोल
निर्धन निरीह नम्र
बजा रहे बस कपोल
अश्वसेन तक्षक ही
आज के कुलीन

नागफनी भटकटैया
उग आए सभी ओर
दिन वसंत के गए
ग्रीष्म मार रहा जोर
फूल सभी कंटकों के
हो गए आधीन

-रामकृष्ण द्विवेदी मधुकर

23 जून 2011

२०. फूल ये पलाश के

लाए हैं पुन: दिवस आस के, विश्वास के
फूल ये पलाश के

सज गया धरा का धरातल विशेष तौर पर
अलि-पिक के मधुर स्वर आज आम्रबौर पर
लताएँ सब लिपट गई हैं,
सन्निकट स्वगाछ से

पीतपत्र झड. गए, छा गए नवल-नवल
स्वच्छ जल के दर्पणों में,रूप देखते कमल
कुमुदिनी के रात-दिन,
हो गए सुहास के

पर्णहीन सेमलों में फूल-फूल रह गए
फूल भी तो शीघ्र ही एक-एक झड़ गए
पल्लवित-फलित हुए,
देख दिन विनाश के

दिक्-दिगन्त में छटा है छा गई वसन्त की
बांधती स्वपाश में हैं,टोलियाँ अनंग की
देखो,दिन ये चार ही हैं,
मधुर मधुरमास के

-राममूर्ति सिंह 'अधीर'

21 जून 2011

१९. खिलते हुए पलाश

खिलते हुए पलाश

बिन तुम्हारे होलिका त्यौहार
था इक कल्पना भर
हाट में बाक़ायदा
तुम स्थान पाते थे बराबर

अब कहाँ वो रंग
वो रंगीन भू-आकाश
खिलते हुए पलाश

मख अगन सा दृष्टिगोचर
है तुम्हारा यह कलेवर
पर तुम्हारे पात नर ने
वार डाले बीडियों पर

पर न हारे तुम तनिक भी
औ हुए न हताश
खिलते हुए पलाश

- नवीन चतुर्वेदी

20 जून 2011

१८. बहुत कुछ हम पा गए

भीड़ में गुम हो गई
अपनी तलाशों से
बहुत कुछ हम पा गए
मिल कर पलाशों से

सुर्ख धधका हुआ चेहरा
रास आया फिर
जूझने का वही जज्बा
पास आया फिर
सध गए हम संधि से
जुड कर समासों से
बहुत कुछ हम पा गए ...

अनकहा था जो कि
वो भी सामने आया
एक साया बाँह
अपनी थामने आया
बात खुल कर हुई
अपने अनुत्प्रासों से
बहुत कुछ हम पा गए ...

सुबह आई और
अपनी हो गई फिर से
लहर सी कोई उठी
तालाब में फिर से
खिल गई ताज़ा हवा
गहरी उसासों से
बहुत कुछ हम पा गए...

--यश मालवीय

19 जून 2011

१७. फागुन में टेसू बन जाऊँ

फागुन में टेसू बन जाऊँ,
सावन मेघ मल्हार
भरी दुपहरिया जेठ में शीतल छाया क्यार

ऋतु बसंत में
हवा बसंती, पूरबा की पुरवाई
बनकर खेलूं आंख-मिचौली घर, आंगन, अमराई
भादो की काली रातों में
दीप जलाऊँ द्वार

पूस-माघ की
बाहों में 'चांद' जले जब रातों को
दिल ढूँढे फिर, फूल 'पलाश' के रंग-रंगे जज्बातों को
बन बदरा, घनघोर घटा, तन पर
बरसाऊँ 'प्यार'

--नियति वर्मा

१६. पलाश-गीत


ढाक के तीन पात थे
वो भी अब खो गये
पसई के चाउर से
सपने हम बो गये ।

जंगल का बिरवा था
बस्ती ने खा लिया
आग को पानी की
मस्ती ने पा लिया
उजड़े वीराने तो
शहरों के वंश बढ़े
पेड़ों में नव पलाश
जागे थे, सो गये ।


निर्धन की आँखों में
टेसू सा सपना है
दहक रहे सूरज से
उपवन का दहना है
डालों पर अंगारे
आँखों में सूरज है
जेठ के अंधड़ में
सपने सब खो गये ।

लाल से अधरों पर
पीली सी वंशी है
ढाक की गोद में
किरनों का अंशी है
गाँव के बाहर भी
सावन जी लेता है ।
फूलों के पाहुन भी
फागुन से हो गये ।

--डा० जीवन शुक्ल

18 जून 2011

१५. चितवन फूल पलाश

हँसी तुम्हारी चंदा जैसी,
चितवन फूल पलाश
बातें झरना यथा ओसकण
तारों भरा उजास

गुन-गुन
भौंरों जैसे गाना,
और शरारत से मुस्काना
हौले-से,
ही हमें चिढ़ाना
वादा कर फिर हाथ न आना
चमकाती लेकिन फिर भी हो
एक किरन की आस


जो भी
दिन है साथ बिताए,
जस फूलों की घाटी घर
नोंक-झोंक
विस्मृति-स्मृति में,
एक क्षीरमय सुन्दर सर
मिलना तुम से तीरथ जैसा,
भूला - बिसरा रास

- क्षेत्रपाल शर्मा

17 जून 2011

१४. खिलता हुआ पलाश

प्रथम मिलन के साथ
मिला था,
हँसता हुआ पलाश
रूप रंग खिल उठे
दिखा जब
खिलता हुआ पलाश

तुम भेटी
ज्यों नवल वल्लरी
मैं बिरवा था वन का
छुअन अधर की
मिलन हुआ था
तपित देह का मन का
खिले फूल
मुसकाया उपवन
दर्शक बना पलाश

गंधाई थी
मदन मालती
हुए सिंदूरी गाल
अंग अंग सिमटे लाजों से
झरते रहे गुलाल
होली गाता रंग लुटाता
नर्तक लगा पलाश

फागुन आया
वासंती का
लेकर नव संदेश
भौंरों ने सुलझाए उलझे
कचनारों के केश
हमें बहकता देख रहा था
तट पर खड़ा पलाश

-श्याम बिहारी सक्सेना

16 जून 2011

१३. फूल टेसू के खिले हैं

फूल टेसू के खिले हैं

जोहती थी बाट जो
वो राह अब डसने लगी है
हाय! मेरी ढींठ अंगिया
मुझे ही कसने लगी है
राह हो, अंगिया हो,
लगता है, सभी के मन मिले हैं
समर्पण कैसे नहीं हो
फूल टेसू के खिले हैं


आम बौराये हुए
मदमत्त महुआ झूमता है
बांह फैलाए हुए
पगलाया भौंरा घूमता है
बने दुल्हन फूल,
मन के मीत कलियों को मिले हैं
नेह का पाकर निमंत्रण
फूल टेसू के खिले हैं


मैं बसन्ती आग में जल रही हूँ
प्रियतम! कहाँ हो
चिढाती अमराइयां,
कैसे हो? कुछ सोचो, जहाँ हो
मैं अकेली रुआंसी,
कलियों पे भौंरे दिलजले हैं
नियंत्रण कैसे रहेगा
फूल टेसू के खिले हैं


देख आ,
कोई तुम्हारी याद में यूँ गल रही है
छाँव भी अठखेलियाँ
अब धूप के संग कर रही है
तन तुम्हारा, मन तुम्हारा
स्वप्न में तो हम मिले हैं
मन नहीं लगता है प्रियतम
फूल टेसू के खिले हैं


चाह मन की मन में ही कब तक रखूँ मैं
ये बता दो
धैर्य रख लूंगी
अगर तुम चाह अपनी भी जता दो
जीत लो जब मन करे
तुझ पर निछावर सब किले हैं
आग मन मेंरे,
दहकते फूल टेसू के खिले हैं

-शेषधर तिवारी

15 जून 2011

१२. टेसू तुम क्यों लाल हुए


टेसू तुम क्यों लाल हुए?
फर्क न कोई तुमको पड़ता
चाहे कोई तुम्हें छुए

आह कुटी की तुम्हें लगी क्या?
उजड़े दीन-गरीब
मीरां को विष, ईसा को
इंसान चढ़ाये सलीब
आदम का आदम ही है क्यों
रहा बिगाड़ नसीब?
नहीं किसी को रोटी
कोई खाए मालपुए

खून बहाया सुर-असुरों ने
ओबामा-ओसामा ने
रिश्ते-नातों चचा-भतीजों ने
भांजों ने, मामा ने
कोशिश करी शांति की हर पल
गीतों, सा रे गा मा ने
नहीं सफलता मिली
'सलिल' पद-मद से दूर हुए

-संजीव सलिल

13 जून 2011

११. फूले फूल पलाश

फूले फूल पलाश कि सपने पर फैलाए रे

फिर मौसम के लाल अधर से
मुस्कानों की झींसी बरसे
आमों के मंजर की खुशबू पवन चुराए रे

पकड़ी के टूसे पतराए
फूल नए टेसू में आए
देवदार-साखू के वन लगते महुआये रे

धरती लगा महावर हुलसी
ठुमक रही चौरे पर तुलसी
हरी घास की हरी चुनरिया सौ बल खाए रे

धूप फसल का तन सहलाए
मन का गोपन भेद बताए
पेड़ों की फुनगी पर तबला हवा बजाए रे

वंशी-मादल के स्वर फूटे
गाँव-शहर के अंतर टूटे
भेद-भाव की शातिर दुनिया इसे न भाए रे।

-नचिकेता

12 जून 2011

१०. फूल पलाश के

जीवन के कोरे लम्हों पर
रचते फूल पलाश के
तितली के चंचल पंखों पर
सजते फूल पलाश के

सूरज
उतरे झरने में
मल मल खूब नहाये
हरसिंगार के फूल
चांदनी वेणी गूँथ सजाये
चाँद थाम ले हाथ अगर तो
खिलते फूल पलाश के

बादल
पहने पायल डोलें
पर्वत की चोटी पर
हौले खोल किवाड़ झाँकती
ऋतुएँ घर के अंदर
धरा सुन्दरी की चूनर में
टँकते फूल पलाश के

कुछ निशान
बनते जाते हैं
लहरों और हवाओं में
इनकी तो पहचान बसी है
फागुन की रचनाओं में
सखी आज ऋतु के स्वागत में
बिछते फूल पलाश के

-रचना श्रीवास्तव

11 जून 2011

९. जिस दिन पलाश जंगल में दहके

जिस दिन पलाश
जंगल में दहके
तुम आ जाना!

नववर्ष हर्ष उत्कर्ष
बहारों ने नापे!
हलदी वाले हाथों ने
दरवाजे छापे!

जिस दिन मौसम की गायक
कुहु कुहु कुहुके
तुम आ जाना!

सिल पर पिसते रंगत लाते
गहरे होते!
इंद्रधनुष जैसे
सपनो में ठहरे होते

जिस दिन मुंडेर पर
कोरी चूनर बहके
तुम आ जाना!

झरझर झरते रंग
झोंके रस गंधो के
जिस दिन ऊँची मेडों पर
किंशुक लहके
तुम आ जाना!

-निर्मला जोशी

10 जून 2011

८. जब होंगे फिर मन पलाश

जब होंगे फिर मन पलाश

भटक गए हैं
कालखण्ड में
रंग वसंती, केसू, केसर
आसक्ति का
नेह में तिरना
सुन्दरि का अन्तः निवास।

अपरिमेय
आनन्दिक अनुभव
संग - सहेली
स्मृति खोई
कब बोलेंगे ‘पिउ’ ‘पिउ’
बिखरेगी चहुँदिश सुवास।

रूप केतकी
ढीठ निगोड़ी
इठलाएगी छलना जैसी
रीझ उठेंगे
अनजाने ही
विस्मृत कर अपने संत्रास।

चंचल नदी
लहरता आँचल
अविरल कल-कल
मय निश्छल जल
लौटेंगे वे बीते दिन
जब होंगे फिर मन पलाश।

-हरीश प्रकाश गुप्त

8 जून 2011

७. दस्तखत पलाश के


वासंती समझौते
दस्तख़त पलाश के।

गंधों के दावों का
एक बाग फूला,
आँखों ने कलियों पर
डाल दिया झूला,
कहाँ रहे कोयल के
आज मन हुलास के।

आसमान छूने को
परचम लहराए,
कौवों ने सुबह-सुबह
काँव गीत गाए,
उगल रही तोती भी
शब्द कुछ भड़ास के।

तेज़ हुई आँधी में
डोलते बबूल,
डाल की गिलहरी भी
राह गई भूल,
टिड्डी दल पाले है
ख़्वाब कुछ विकास के।

-ब्रजनाथ श्रीवास्तव

६. रंग टेसू ने उड़ाए फाग के

सज गई हैं फिर
बहारें आम पर
लौट सूरज आ गया है
काम पर
फूल कर सरसों
बहुत इतरा गई
डालियाँ कचनार की
गदरा गई
झुरमुटों में कुहकतीं शहनाइयाँ।

चमक लौटी है
सुबह के भाल पर
किरन गुदने लिख रही हैं
गाल पर
रंग टेसू ने उड़ाए
फाग के
दिन बसंती
प्यार के अनुराग के
सिर चढ़ी सी हो गईं पुरवाइयाँ।

फागुनी दिन,
औऱ, महुआ पी गए
फाग-मस्ती-रूप के-
ठनगन नए
पाँव भारी
और
भरते रस कलश
खेत में सोना झरेगा
इस बरस
सपन लेते आँख में अंगडाइयाँ

-यतीन्द्रनाथ राही

6 जून 2011

५. टेसू के फूलों के भारी हैं पाँव

टेसू के फूलों के
भारी हैं पाँव


रूप दिया
प्रभु ने पर गंध नहीं दी
पत्ते भी छीन लिए
धूप ने सभी

सूरज मनमर्जी से
खेल रहा दाँव


मंदिर में
जगह नहीं मस्जिद अनजान
घर बाहर ग्राम नगर
करते अपमान

नहीं मिली छुपने को
पत्ती भर छाँव


औषधि हैं
बट्टे से पिसते ये रोज
फूलों सा इनका मन
भूले सब लोग

जंगल की आग कहें
सभ्य शहर गाँव

-धर्मेन्द्र कुमार सिंह