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26 जुलाई 2012

कार्यशाला-२२ समीक्षात्मक टिप्पणी

ग्रीष्मकालीन नवगीत कार्यशाला-२२ में इस बार के विषय, "दिन गर्मी के' में २० प्रविष्टियों ने स्थान पाया। इस बार कुछेक नए नवगीतकारों के आलावा नवगीत के ख्यातिप्राप्त हस्ताक्षरों ने भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करायी है। नवगीत के पुरोधाओं में हिसार से कुमार रविन्द्र, सतना से अनूप अशेष और मुरादाबाद से महेश्वर तिवारी, के नवगीत अपनी शैली और नवगीत की सांगोपांग छटा समेटे प्रकृति की अनुपम सज-धज के साथ विद्यमान है।

अन्य समकालीन नवगीतकारों में शारजाह से पूर्णिमा वर्मन, संयुक्त राज्य अमेरिका से शशी पाधा, नवी मुंबई से कल्पना रामानी, नई दिल्ली से राजेश श्रीवास्तव, विजय ठाकुर, गीता पंडित, कानपुर से भावना वैदेही तिवारी, जयपुर से डा. सरस्वती माथुर, बिलासपुर से धर्मेन्द्र कुमार सज्जन, कोटा से आकुल, राजमणि राय 'मणि', सतना से अनूप अशेष, जबलपुर से संजीव सलिल, मण्डी हिमांचल प्रदेश से सुरेन्द्रपाल वैद्य, प्रतापगढ़ से रवि शंकर मिश्र 'रवि', लखनऊ से परमेश्वर फूँकवाल, संध्या सिंह, रामशंकर वर्मा, सभी नवगीतकारों के नवगीतों की अपनी एक विशिष्ट छाप है।

रवि शंकर मिश्र "रवि" ने "फुरसत में गाँव' में गरमी के गाँव समाज की फुरसत का अच्छा चित्रण किया है। "फसल गयी कोठिला में..., बचपन को मलदहिया से..., उफ़ तक न करे...बेचारी दुल्हन का सीधा स्वभाव है" देहात की गर्मी में चूल्हे की आंच में खटती दुल्हन का मर्मस्पर्शी है।

वरिष्ठ नवगीतकार कुमार रविन्द्र का 'अब, साधो ए.सी. कमरों में रहते हैं गर्मी के दिन' में नगरीय ग्रीष्म का अनुपम दृश्य खींचा है। गीत का मुखड़ा ही गीत मुख्य स्वर है। 'दूर देश से लाया सूरज राजा का पंडा, रखी गईं हैं शाही फ्रिज में उसकी कुछ किरणें कमसिन' इन्फेक्शन के डर से सहमे रहते हैं अबके पल- छिन' जैसे विम्बों से नवगीत सजा है।

भावना वैदेही तिवारी का 'आ गए सूर्य की ढिठाई के दिन' ---सतुआई के दिन, किताबें हँसी गाँव भागी, नानी की तरुणाई फटक रही सूप, दहके पलाश की जवानी के दिन, बूढ़े बरगद की अँगड़ाई के दिन' गर्मी के अलग से उपमान हैं।

'कब गरमी की रुत जाय' में कोटा शहर से 'आकुल' ने जन-जीवन में गर्मी की विकलता का लाय भर दी है।

'महुए से भरा हुआ गाँव' में राज मणि राय 'मणि' ने ग्रीष्म के बहाने 'मिहनत भर गीत है हर चेहरा सादा है' कह कर गाँव के मेहनतकश की सुधि ली है।

अनूठे विम्ब विधानों से सुगठित 'आओ हम धूप वृक्ष काटें' सिद्धहस्त गीतकार महेश्वर तिवारी का एक उत्कृष्ट नवगीत है। उमस और गर्मी की दाह का जनजीवन पर असर 'चुप है गाँव..., हर तरफ घिरी घिरी सी उदासी..., सर पर सूरज (जब परछाई छोटी हो जाये) हल्दी के रंग भरे कटोरे आदि विम्ब दर्शनीय हैं।

विजय ठाकुर का लय में बहता नवगीत 'तुम कहो तो कौन आया?' बड़ा ही प्रभावोत्पादक बन पड़ा है। अनावृत वृक्षों का तादात्म्य सजन की प्रतीक्षारत पत्नी से, रेत में ... कुछ रसीले हरे पीले लाल रक्तिम हृदय गीले' आदि गीत के मुख्य विश्रामस्थल हैं।

लोक रूपकों के धनी अनूप अशेष का नवगीत 'ईंट–पत्थरों ...' में कंक्रीट के जंगलों में चिड़ियों के रहवासों की चिंता झलकती है। आधुनिक सन्दर्भ में रिश्तों की अच्छी पड़ताल भी है इस नवगीत में।

'लो फिर आ गये...' में राजेश श्रीवास्तव का एक विशिष्ट और खास अंदाज है। डिक्टेटर गर्मी सिर्फ आदेश का पालन कराती है। 'फिर अंधाधुंध गोलियाँ कटार बन जाएंगे सीनों के पिन आवारा होगी धूल और मौसम बाज होगा' एक अनोखा अप्रस्तुत विधान। उम्रकैद में ...शीतल छाँह, उमस की बेटियाँ, संध्या का सांता क्लाज आदि का प्रयोग गीत को एक खूबसूरत रचना सिद्ध करता है।

डाक्टर सरस्वती माथुर का 'गर्मी आई गयी उमंग' नवगीत की कहन का सुन्दर उदाहरण है।

पूर्णिमा वर्मन का नवगीत 'रखे वैशाख ने पैर' में खिले गुलमुहर ...हरी चुनर पर छींट सिंदूरी, सिहर उठी..., अमलतास के सोन हिंडोले, धूप ओढ़नी आदि ऋतु परिवर्तन के सहज और सुन्दर विम्ब हैं।

सुरेन्द्रपाल वैद्य का नवगीत 'सबको शीतलता ...घने वृक्ष की छाँव' में 'ऊँघ रहा जनपद का एक गाँव, टुकुर टुकुर ममता ने देखे...' आदि शब्द बंध आकर्षक हैं।

परेश्वर फुँकवाल का नवगीत 'गुलमोहर ने ख़त लिखा' में ग्रीष्म और सामयिक सन्दर्भ में जीवन और समाज की विद्रूपताओं की अच्छी खबर ली है। गीत का मुखड़ा भी छाप छोड़ने में सफल है। चिलचिलाती धूप पर...मत लिखा, नेह के वन..., नागफनी के फन, सूरज साहूकार बना है जम कर बाँटे घाम, ऊँचे मोल धूप की बोली कम जीवन के दाम' आदि विम्बों से युक्त सम्पूर्ण नवगीत बहुत अनोखा और साम्वेदिक है।

संध्या सिंह का नवगीत 'गर्मी का देहाती दिन' में गीतकार का एक विस्तृत फलक है। 'लाल भभूका...पौ फटे ही..., शहर एक दिन... छत की कड़ियों से..., में कबूतरों, चिड़ियों, के साथ दादा जी विद्यमान हैं। नई बहुरिया की खीज है, तो बीत गया चप्पल बिन छाता...,आम आदमी का दर्द भी है।

शशि पाधा का 'जाने कैसी बात हो गयी' में दग्ध धरा, षोडशी धूप...राजरानी... गुनगुने ताल में ... रात मुँह धो गयी, जेठ की दुपहरी में...सो गयी, अछे प्रतीकों के साथ नवगीत उपस्थित है।

धर्मेन्द्र सिंह सज्जन का नवगीत 'नीमतले' में लय, छंद के साथ लोकतत्व और सामयिक सन्दर्भों की सहज उपस्थिति है। नवगीत में मुखड़ा, अंतरे, का दर्शनीय निर्वाह किया गया है। 'छत पर जाकर रात सो गई... खुले रेशमी बाल, भोर हुई सूरज ने आकर छुए गुलाबी गाल, बोली छत पर लाज न आती तुमको बुद्धू राम' में सर्वथा नवीन आकर्षक बिम्बों के साथ गीत का अपना वैशिष्ट्य है।

कल्पना रामानी के नवगीत 'बढ़े धूप के तेवर रूठी...आँगन की तुलसी।' में बड़ी रंजकता के साथ कथ्य का सम्प्रेषण किया गया है। गर्मी का सोटा, लड़े अंत तक कोमल पत्ते, सूखी तुलसी ...आँगन की तुलसी आदि पठनीय हैं। नवगीत एक सकारात्मक आशावाद के साथ समाप्त होता है।

'शामियाने धूप के' रामशंकर वर्मा का एक अभिनव नवगीत है। कार्यशाला में प्राप्त अधिकतर नवगीतों में ग्रीष्म की भयावहता का वर्णन है, परन्तु इस नवगीत में ग्रीष्म पाहुन है, उसकी प्रतीक्षा हो रही है।

ग्रीष्म के कार्य व्यापार का वर्णन सुन्दर लय और पर्यावरण प्रेमी प्रियदर्शी अशोक का सन्दर्भ इस गीत की विशेषता है।

गीता पंडित का नवगीत 'अधरों पर है सूनापन ...रूखापन' 'तकुए सी चुभती महँगाई' 'साल साल बिताते तन्हा', में गर्मी की दाह के साथ नगरीय एकाकीपन की चुभन भी है।

सभी नवगीतों पर विशेषज्ञ नवगीतकारों एवं साहित्यप्रेमियों की सुन्दर समीक्षापरक टिप्पणियाँ भी प्राप्त हुई हैं, जो कमोबेश नवगीतों की कोटि का निर्धारण भी करती हैं।

-पाठशाला का समीक्षक

20 जून 2012

२०. गर्मी के दिन

अब, साधो
ए.सी. कमरों में
रहते हैं गर्मी के दिन

बाहर आग बरसती
भीतर मौसम है ठंडा
दूर देश से लाया सूरज
राजा का पंडा
रखी गईं हैं
शाही फ्रिज में
उसकी कुछ किरणें कमसिन

कम्प्यूटर पर
झुलसे पेड़ों की तस्वीर दिखी
शाश्वत ने गर्मी पर कविता
उसको देख लिखी
उधर
करौंदे में छिप
मकड़ी जाल रही सपनों का बिन

नदी-घाट पर जाने की
अब किसे भला फुर्सत
चुल्लू पानी में नहायें
यह युग की, सुनो, जुगत
इन्फेक्शन के
डर से
सहमे रहते हैं अबके पल- छिन

-कुमार रवीन्द्र
हिसार

19 जून 2012

१९. गर्मी के दिन

तृषा जगी
धरती की प्यासे हैं कूप
छज्जों पर नाच रही सोने सी धूप
गर्मी के दिन थोड़ी नरमी के दिन
आ गए सूर्य की,
ढिठाई के दिन

ठिलियों पर
बैठ गये आम्रफल रसीले
ढेर लगे जामुन के, महकते कलींदे
चटपटे अचारों, गुल्कंदों के दिन
जलजीरा शर्बत
सतुआई के दिन

छोड़ कर
किताबें हँसी गाँव भागी
तारों की गफलिया सुबह तलक जागी
भरे मर्तबान कुछ कहानी के दिन
अलसाई भोर
अमराई के दिन

नीम नीम
निखरा दुपहरी का रूप
नानी की तरुणाई फटक रही सूप
दहके पलाश की जवानी के दिन
बूढ़े बरगद की
अँगड़ाई के दिन

भावना वैदेही तिवारी
दिल्ली

18 जून 2012

१८. कब गरमी की रुत जाय

दिन दिन गर्मी
के तेवर से तन मन जन घबराय।
कब गरमी की रुत जाय।

लाय भरी
जब चले पवन तन मन पिघला जाये।
जेठ दुपहरी तपे अगन सी रैन अषाढ़ जलाये
बचपन जाने कहाँ ग्रीष्म कहाँ
धूप तपन और लाय।

पीठ अलाई
गीले बिस्तर रात गुनगुनी तारे गिन गिन
हाथ बिजौना रात न छूटे करवट बदलें पलकें छिन छिन
नींद आय सैं भोर गुजरिया
गाय भैंस रँभाय।

दूर कूक कोयल की
सुन नाचे मन मयूर गुनगुन
छिटपुट मेघों के कतरे छाये नभ छितरे छितरे
अभी कहाँ सावन की आहट
ढांढ़स कौन बँधाय।

आकुल
कोटा

17 जून 2012

१७. गाँव मेरा है

महुए से भरा हुआ गाँव —
गाँव मेरा है।

अनछुआ रहा सब दिन
शहर के कुएँ से
पीता है गंगाजल
खोद कर कुएँ से

खुशबू की बाँहों में गाँव —
गाँव मेरा है।

तपी तपी पगडंडी
जेठ का महीना
सोख रही धूल
अंग अंग का पसीना

जेठी मधु सा मीठा गाँव —
गाँव मेरा है।

मिहनत भर गीत है
हर चेहरा सादा है
यहाँ नहीं बादशाह
यहाँ यही ज्यादा है

यादों में टापू सा गाँव —
गाँव मेरा है।

— राजमणि राय 'मणि

16 जून 2012

१६. आओ हम धूप वृक्ष काटें

आओ हम
धूप वृक्ष काटें।
इधर–उधर
हलकापन बाँटे।

अमलतास गहरा कर फूले
हवा नीमगाछों पर झूले
चुप हैं गाँव
नगर, आदमी
हमको तुमको सबको भूले।

हर तरफ़ घिरी–घिरी उदासी
आओ हम
मिल–जुल कर छाँटें।

परछाई आ करके सट गई
एक और गोपनता छँट गई
हल्दी के रंग भरे कटोरे
किरन फिर
इधर–उधर उलट गई।
वह पीलेपन की गहराई

लाल–लाल
हाथों से पाटे।
आओ हम धूप वृक्ष काटें।

—माहेश्वर तिवारी
मुरादाबाद

15 जून 2012

१५. ग्रीष्म आया

 वृक्ष अपने पत्र तज कर
 रूठ कर बैठे हों हट कर
 लीन हों अपनी लगन में
 जैसे सजनी
 पी की धुन में
 तुम कहो तो कौन आया?

 सड़क पर रंगों का मेला
 चुस्कियों
 कुलफी का रेला
 हैं बहारें शर्बतों की
 कर दे शीतल
 मन व काया
 तुम कहो तो कौन आया?

 रेत में गहरे छुपे हैं
 कुछ रसीले
 हरे पीले
 लाल रक्तिम
 हृदय गीले
 तुम कहो तो कौन आया?

 बेर ज़ामुन और ककड़ी
 पेड़ की भाती हो छाया
 आर्द्रता अपने हृदय की
 ले उड़े जब शुष्क वायु
 मैं बताऊॅ कौन आया
 ग्रीष्म आया! ग्रीष्म आया!

— विजय ठाकुर
नई दिल्ली

14 जून 2012

१४. कोई चिड़िया नहीं बोलती

ईंट–पत्थरों की जुबान है
ऊँचे बड़े मकानों मे
कोई चिड़िया नहीं बोलती
सूने रोशनदानों में।

कुछ छीटें मेरी यादों के
कुछ धब्बे सबके
धूप–छाँह
हो जाने वाले
रिश्ते हैं अब के,
आँगन वाली गंध नहीं हैं
धूप भरी
दालानों में

आँखों का पानी खोने का
भीतर खेद नहीं
शीशे की खिड़की
के बाहर
उछली गेंद नहीं,
तपता–सा एहसास जेब का
उँगली की
पहचानों में

अनूप अशेष
सतना

13 जून 2012

१३. उमस तपन थकन के दिन

लो फिर आ गए
उमस, तपन, थकन के दिन
उग्रवादी सूरज का अब
हिटलरी राज होगा।

बेघर छाँह के
हर शरणार्थी टुकड़े पर
फिर लगेंगी थके-हारे पथिकों की बोलियाँ
सिर चढ़कर बोलेगी आतंकवादी धूप
लू चलाएगी
फिर अंधाधुंध गोलियाँ
कटार बन जाएंगे पसीनों के पिन
आवारा होगी धूल और
मौसम बाज होगा

उम्रकैद में
होगी फिर से शीतल छाँह
राहत को मिलेगी सजा कालेपानी की,
गली-गली पहरा देंगी
उमस की बेटियाँ
फिर जागेंगी यादें अनायास नानी की
कदमताल करेंगी चिपचिपी चींटियाँ
थककर बैठा संध्या का
सांताक्लाज होगा

राजेश कुमार श्रीवास्तव
नई दिल्ली

12 जून 2012

१२. गर्मी के दिन

गर्मी के दिन
ठंडी से
ठिठुर रहे मौसम के पाँव
सूरज ले उषा किरण आया हँस गाँव
नयनों में सपनों ने पायी फिर ठाँव
अपनों की पलकों में
खोज रहे छाँव

महुआ से मदिराए
पनघट के दिन
चुक जाते-थक जाते
गर्मी के दिन

पेड़ों का
कत्ल देख सिसकता पलाश
पर्वत का अंत देख नदी हुई लाश
शहरों में सीमेंटी घर हैं या ताश?
जल-भुनता इंसां
फँस यंत्रों के पाश

होली की लपटें-
चौपालों के दिन
मुरझाते झुलसाते
गर्मी के दिन

संजीव सलिल
जबलपुर

11 जून 2012

११. गर्मी आई गई उमंग

चक्कर घिन्नी जैसा मौसम
गर्मी आई
गई उमंग

पाखी सिमटे छाँह ढूँढते
कोने कुतरे ठंढ टूँगते
रूप धूप का
लगे मलंग

सूरज किरणें लू ने बुन ली
गर्म आग सी साँसें चुन लीं
तपिश हवा की
उड़े पतंग

तपन निगोड़ी बढ़ती जाए
मृग छौनों का मन घबराये
जीना इसमें
भारी जंग

डॉ. सरस्वती माथुर
जयपुर

१०. रखे वैशाख ने पैर

रखे वैशाख ने पैर
बिगुल बजाती,
लगी दौड़ने
तेज़-तेज़ फगुनाहट

खिले गुलमुहर दमक उठी फिर
हरी चुनर पर छींट सिंदूरी!
सिहर उठी फिर छाँह
टपकती पकी निबौरी
झरती मद्धम-मद्धम
जैसे
पंखुरी स्वागत

साथ हवा के लगे डोलने
अमलतास के सोन हिंडोले!
धूप ओढनी चटक
दुपहरी कैसे ओढ़े
धूल उड़ाती गली
गली
मौसम की आहट

पूर्णिमा वर्मन
शारजाह

10 जून 2012

९. घने वृक्ष की छाँव

सबको
शीतलता पहुँचाती
घने वृक्ष की छाँव

थका थका सा पथिक
धूप में भूखा प्यासा
बोझिल
मन से
ढूंढ रहा इक ठाँव

जल्दी से सब कुछ निपटाकर
गर्म दोपहरी की बेला में
अलसाया सा
ऊँघ रहा है
जनपद का इक गाँव

शिशु माँ की उँगली थामे
पथ पर
आगे बढ़ता
टुकर टुकर ममता ने देखे
नन्हें नन्हे पाँव

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
मण्डी, हिमांचल प्रदेश

9 जून 2012

८. गुलमोहर ने खत लिखा

बीते हुए वसंत को
गुलमोहर ने खत लिखा

कैद हुई है शीतल छाया
बिकने लगी हवाएँ
जीवन विष पी नीलकंठ है 
नकली हुई दवाएँ

चिलचिलाती धूप पर
सबने अपना मत लिखा

नेह के वन हैं दावानल में
रिश्तों के पत्ते जलते हैं
स्वार्थपरकता की गर्मी में
नागफनी के फन फलते हैं

तनी कई तलवारें जब से 
प्रेम में हैं रत लिखा

सूरज साहूकार बना है
जम कर बांटे घाम
ऊँचे मोल धूप की बोली
कम जीवन के दाम

भूख ने कितनों के ललाट पर
एकादशी का व्रत लिखा

-परमेश्वर फुँकवाल
लखनऊ

8 जून 2012

७. गर्मी का देहाती दिन

लाल भभूका सूरज आता
पौ फटते ही आँख दिखाता
धूप के बिस्तर पर अलसाता
गर्मी का
देहाती दिन

कतरन वाला पंखा झलते
हुई बुआ की लाल हथेली
इधर उधर से हवा चुरा कर
अम्मा के आँचल ने ले ली
उबासियों की परत जमाता
गर्मी का
देहाती दिन

छत की कड़ियों से चिपके हैं
सहमे सहमे डरे कबूतर
कोटर में से तके चिरैया
प्यास कंठ में अटका कर
सांझ ढले भी छुप न पाता
गर्मी का
देहाती दिन

दादा जी की खाट सरकती
संग नीम की छाया के
जंग पसीने से दिनभर है
वस्त्र भिगोती काया के
शहर एक भी बिता न पाता
गर्मी का
देहाती दिन

कच्ची अमिया खट्टी इमली
गई दुपहरी भर चटखारे
घूंघट में से नयी बहुरिया
चूल्हे ऊपर खीज उतारे
बीत गया बिन चप्पल छाता
गरमी का
देहाती दिन

संघर्षों की गर्म हवा से
नमी भाव की सूखी जाए
सूखे पत्तों से उड़ते हैं
चाहे भाग्य जिधर ले जाए
कुदरत पर निर्भर हो जाता
गर्मी का
देहाती दिन

-संध्या सिंह
लखनऊ

7 जून 2012

६. कैसी बात हो गई

दहकने लगा है नभ
धरा भी दग्ध हो गई
कैसी बात हो गई ?

बादलों के दल किसी
दूर देस जा बसे
राजसी पोशाक में
सूर्य खिल खिल हँसे
षोडशी धूप आज
राज रानी
हो गई
कैसी बात हो गई ?

दिन लंबे हो गए
ताड़ के पेड़ से
गिर पड़ी है ऊँघती
हवा भी गर्म मेंड़ से
गुनगुने ताल में
रात मुँह
धो गई
कैसी बात हो गई ?

झिलमिलाने लगीं
झील में परछाइयाँ
पनघटों की भीड़ में
गीत, गलबाहियाँ
पसीजती चाँदनी
ओस कण
बो गई
कैसी बात हो गई ?

छाँव का मोल आज चौगुणा
हो गया
धूप के हाट में
चैन कहीं खो गया
जेठ की दुपहरी
आँख मूँद
सो गई
कैसी बात हो गई ?

शशि पाधा
यू.एस.ए.

५. नीम तले

नीम तले सब ताश खेलते
रोज सुबह से शाम
कई महीनों बाद मिला है
खेतों को आराम

फिर पत्तों के चक्रव्यूह में
धूप गई है हार
कुंद कर दिए वीर प्याज ने
लू के सब हथियार
ढाल पुदीने सँग बन बैठे
भुनकर कच्चे आम

छत पर जाकर रात सो गई
खुले रेशमी बाल
भोर हुई सूरज ने आकर
छुए गुलाबी गाल
बोली छत पर लाज न आती
तुमको बुद्धू राम

शहर गया है गाँव देखने
बड़े दिनों के बाद
समय पुराना नए वक्त से
मिला महीनों बाद
फिर से महक उठे आँगन में
रोटी बोटी जाम

-धर्मेन्द्र कुमार सिंह सज्जन

5 जून 2012

४. आँगन की तुलसी

बढ़े धूप के तेवर रूठी,
आँगन की तुलसी।

सींच न पाई गृहिणी उसको,
जल का था टोटा।
कोने में चुपचाप पड़ा था,
मैला-सा लोटा।
ऊपर से गर्मी का भारी,
आन पड़ा सोटा।
मुरझाई बिन पानी प्यासी,
पावन-सी तुलसी।

छायावाले छप्पर में भी,
छिद्रों का था जाल। 
ताप तपा तपकर सिर पहुँचा,
बना काल तत्काल।
लड़े अंत तक कोमल पत्ते,
सूख हुए कंकाल।
दम टूटा पतझड़ में बदली,
सावन-सी तुलसी।

सूखी तुलसी लेकिन उसके,
बीज सदैव  हरे।
फिर से नव अंकुर फूटेंगे,
जब जलबूँद गिरे।
गृहिणी के भी दिन बदलेंगे,
जैसे समय फिरे।
लहराएगी फिर ममता के,
दामन-सी तुलसी।

कल्पना रामानी
नवी मुंबई

३. शामियाने धूप के

शामियाने धूप के
भू से गगन तक छा गये.
ग्रीष्म आओ पाहुने
अच्छा हुआ तुम आ गये.

तुम जो आये
शीत के षड्यंत्र निष्फल
कोख से जन्मे वनस्पति के सुकोमल गात.
अमलतासों, टेसुओं के अधर छूकर
कीट मधुपायी, शलभ
करने लगे रसबात.
पूत जन्मे घर किसानी के
जिया हुलसा गये.

तुम जो आये
मस्त महुआ विरहिणी पिक कंठ फूटे
आम, लीची, फालसे, तरबूज.
दीन जामुन, बेल, आडू
ककड़ियों के दिन फिरे
क्या खूब.
शर्बतों, ठंडाइयों की
देह में प्राण आ गये.


तुम जो आये
ताल, पोखर, कूप, बापी
बचपने के मास्टर बनकर उमेठे कान
तिरिषा के लगे माने बताने.
फिर खुला अध्याय 'देवानां प्रियदर्शी'
सरायों, वृक्षरोपण के पड़े
किस्से पुराने.
स्वर्णयुग में जन्म लेने की
कसक उमगा गये.

-रामशंकर वर्मा
लखनऊ

2 जून 2012

२. झुलसे नन्दन– वन

हाहाकार मचा है भीतर 
अधरों पर है सूनापन
ऊपर टँगी
हुई है आँखें
अम्बर लाये रूखापन

तपते सूरज ने झुलसाया
गात सुनहरा तप्त हुआ
अम्बुआ की डाली का झूला
मौन हुआ अभिशप्त हुआ
तकुवे-सी
चुभती महँगाई
गर्मी लाई सीने में
छुन-छुन करता
गर्म तवे-सा
मनवा हुआ पसीने में

सबसे जाकर
बतियाते हैं
चल ले आयें नन्दन-वन

आपाधापी के इस युग में
चैन कहाँ आराम कहाँ
साध बड़ी है महानगर की
छोटी नगरी काम कहाँ
सालों साल
बिताते तन्हा
करें प्रतीक्षा दम साधे
गर्मी तन-मन
को झुलसाए
पीर जिया को है बाँधे

ओ रे बदरा !
सुन लो अब तो
चल ले आयें अमृत घन

गीता पंडित
नई दिल्ली