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30 जुलाई 2014

३९. बारिश के पर्दे पर - योगेन्द्र वर्मा व्योम

बारिश के पर्दे पर पल पल
दृश्य बदलते हैं

गली मुहल्लों की सड़कों पर
भरा हुआ पानी
चोक नालियों के संग मिलकर
करता शैतानी
ऐसे में तो वाहन भी
इतराकर चलते हैं

कभी कभी भ्रम के बादल तो
ऐसे भी छाए
लगता मंगल ग्रह के प्राणी
धरती पर आए
घर से घोंघी पहने जब कुछ
लोग निकलते हैं

कभी फिसलना कभी सँभलना
और कभी गिरना
पर कुछ को अच्छा लगता है
बन जाना हिरना
बूँदे छूने को बच्चे भी
खूब मचलते हैं

-योगेन्द्र वर्मा व्योम

३८. बादल आना जी यशोधरा राठौर

प्यासी धरती तुम्हें पुकारे
बादल आना जी

धूल गर्द में लोट रही है
नन्हीं सी गौरैया
सूखी नदी किनारे सूखे
तुम्हें पुकारे प्यासी नैया
फूल पत्तियों की आँखों में
बस हरियाना जी

प्यासी धरती तुम्हें पुकारे
बादल आना जी

ग्राम सखी कजरी गा गाकर
तुम्हें पुकार रही
परती खेतों की आँखें
चुपचाप निहार रहीं
भूल चूक जो हुई उसे
मन से बिसराना जी

प्यासी धरती तुम्हें पुकारे
बादल आना जी

- यशोधरा राठौर

३७. टूटा छप्पर - विद्यानंदन राजीव

टूटा छप्पर औसारे का
छत में पड़ी दरार
फैंक गई गठरी भर चिन्ता
बारिश की बौछार

पहले पहले काले बादल
लाये नहीं उमंग
काम काज के बिना
बहुत पहले से
मुट्ठी तंग
किस्मत का छाजन रिसता है
क्या इसका उपचार

कब से पड़ा कठौता खाली
दाना हुआ मुहाल
आँखों के आगे
मकड़ी का
घना घना सा जाल
नहीं मयस्सर थकी देह को
कोदों और सिवार

खुशियाँ लिखी गई हैं
अब तक भरे पेट के नाम
सपने देखे गए
मजूरी के
अब तक नाकाम
कैसे खो जाए ऋतु स्वर में
अंतर्मन लाचार

- विद्यानंदन राजीव

29 जुलाई 2014

३६. घन बंजारे - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

घन बंजारे
आ पहुँचे हैं
गाँव हमारे

चहल पहल होगी
अब ये कुछ मास रहेंगे
सुख बरसेंगे
नित्य मोहनी कथा कहेंगे

स्वप्नों का
व्यापार चलेगा
साँझ-सकारे

इन्द्रधनुष होंगे
उम्मीदों के पर होंगे
सद्यःस्नात खुशियों से पूरित
सब घर होंगे

पेंग बढ़ाकर
छू लेगा मन
नभ के तारे

उद्योगों से
सुख-साधन कर के जायेंगे
यादों को
हरियाली से भर के जायेंगे

जब भी आते
गाँव हमारे
लगते प्यारे

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

३५. पहली बूँद - ठाकुर प्रसाद सिंह

यह बादल की पहली बूँद कि यह वर्षा का पहला चुम्बन
स्मृतियों के शीतल झोकों में झुककर काँप
उठा मेरा मन।

बरगद की गभीर बाँहों से बादल आ आँगन पर छाए
झाँक रहा जिनसे मटमैला थका चाँद पत्तियाँ हटाए
नीची-ऊँची खपरैलों के पार शान्त वन की गलियों में
रह-रह कर लाचार पपीहा थकन घोल
देता है उन्मन

पिछवारे की बँसवारी में फँसा हवा का हलका अंचल
खिंच-खिंच पडते बाँस कि रह-रह बज-बज उठते पत्ते चंचल
चरनी पर बाँधे बैलों की तड़पन बन घण्टियाँ बज रहीं
यह उमस से भरी रात यह हाँफ रहा
छोटा-सा आँगन

इसी समय चीरता तमस की लहरें छाया धुँधला कुहरा,
यह वर्षा का प्रथम स्वप्न धँस गया थकन में मन की, गहरा
गहन घनों की भरी भीड मन में खुल गए मृदंगों के स्वर
एक रूपहली बूँद छा गई बन मन पर
सतरंगा स्पन्दन

- ठाकुर प्रसाद सिंह

28 जुलाई 2014

३४. बरसात के गीतों के स्वर - सुरेन्द्र पाल वैद्य

बरसात में गीतों के स्वर
घुलने लगे हैं

नेह के उर में
बजी प्रिय तान है
ओंठ पर इक
मदभरी मुस्कान है
धड़कनों के बीच
कोमल से हृदय में
स्नेह के मृदु भाव फिर
पलने लगे हैं।

कोयलों की कूक से
फिर गूँजती है घाटियाँ
और झूलों से पटी
बौरा रही अमराईयाँ
सुप्त मन में
चाहतों के स्वप्न फिर
जगने लगे हैं।

तृप्त होती है धरा
जल बरसने से
कौंध जाती है तड़ित
घन सरसने से
श्रावणी त्यौहार है
घर द्वार मन्दिर खूब सब
सजने लगे हैं।

- सुरेन्द्रपाल वैद्य

३३. सावन की पहली बारिश - सुरेन्द्र सुकुमार

सावन की पहली बारिश ने
मन मेरा शीतल कर डाला
तुमको बहुत
शुक्रिया बादल

मैंने भी मनुहार बहुत की
और बहाए अश्रु धरा ने
तब जाकर पिघले तुम प्यारे
तुमने गाये आज तराने

गर्जन राग तुम्हारा सुन के
मन मेरा सरगम कर डाला
तुमको बहुत
शुक्रिया बादल

माना पर्यावरण बिगाड़ा
धरती खोदी जंगल काटा
और अधिक दौलत पाने को
हमने तेरा तन मन बाँटा

हमको फिर भी क्षमा कर दिया
खुशिओं से आँगन भर डाला
तुमको बहुत
शुक्रिया बादल

- सुरेन्द्र सुकुमार

27 जुलाई 2014

३२. नये शहर में - शशि पुरवार

नए शहर में, किसे सुनाएँ
अपने मन का हाल
कामकाज में उलझें हैं दिन
जीना हुआ सवाल

कभी धूप है, कभी छाँव है
कभी बरसता पानी
हर दिन नई समस्या लेकर,
जन्मी नयी कहानी

बदले हैं मौसम के तेवर
टेढ़ी मेढ़ी चाल

घर की दीवारों को सुंदर
रंगों से नहलाया
बारिश की, चंचल बूँदों ने
रेखा चित्र बनाया

सीलन आन बसी कमरों में
सूरज है ननिहाल

समयचक्र की, हर पाती का
स्वागत गान किया है
खट्टे, मीठे, कडवे, फल का
भी, रसपान किया है

हर माटी से रिश्ता जोड़ें
जीवन हो खुशहाल

- शशि पुरवार

३१. ठग ली धरती - शशि पाधा

उमड़े घुमड़े धूम मचा दी
ढोल ढिंढोरा हुई मुनादी
बरसे ना
क्यों ठग ली धरती ?

पल छिन बीते रैन बिताई
ताल तलैया करें दुहाई
बाग़ बगीची चरमर देहरी
सीखी कैसी रीत ढिठाई
तरसे ना
क्यों ठग ली धरती ?

दादुर टेरे अलख जगाए
थका मयूरा पर फैलाए
कैसा मन भर मान किया रे
धरे सकोरे भरे भराये
छलके ना
क्यों ठग ली धरती ?

बाट जोहते बैठा सावन
पिघला ना पत्थर सा तन –मन
भूल गए क्यों धर्म निभाना
बूँद–बूँद अमृत बरसाना
सरसे ना
क्यों ठग ली धरती ?

- शशि पाधा

26 जुलाई 2014

३०. लिये जुलाई आ जाओ- सौरभ पांडेय

बहुत हुए हम मई-जून
अब लिये जुलाई
आ जाओ!

जानता हूँ तुम धरा हो
गूँज को तुम मान दोगी
मैं गगन की रीतियों को
शब्द दूँगा,
तुम सुनोगी

कहो तुम्हीं फिर मेघ मुखर मैं
घोष स्वरों में बोलूँ क्या!
देखो फिर से बारिश आयी
भूल रुखाई
आ जाओ!

बिन तुम्हारे क्या भला हूँ
मैं सदा से जानता हूँ
बारिशों में
बूँद की है क्या महत्ता
मानता हूँ

भरे हुए वृक्षों-तालों के
तृप्त स्वरों में मुझको सुन
आकुल हुई नदी बन थामो
बाँह-कलाई,
आ जाओ!

कुछ समझ पाया न अबतक
बादलों की भावनाएँ
सच यही है,
मूढ़ पर्वत दे रहा था
यातनाएँ!

सदा रहा कंकड़-पत्थर
गीलट-कागज में खोया जो
उसी निपट रूखे अहमक ने
सेज सजाई,
आ जाओ!

- सौरभ पांडेय

२९. मौसम के ओ पहले बादल - संजीव सलिल

मन भावन सावन घर आया
रोके रुका न छली बली

कोशिश के दादुर टर्राये
मेहनत मोर झूम नाचे
कथा सफलता-नारायण की-
बादल पंडित नित बाँचे
ढोल मँजीरा मादल टिमकी
आल्हा-कजरी गली-गली

सपनाते सावन में मिलते
अकुलाते यायावर गीत
मिलकर गले सुनाती-सुनतीं
टप-टप बूँदें नव संगीत
आशा के पौधे में फिर से
कुसुम खिले नव गंध मिली

हलधर हल धर शहर न जाये
सूना हो चौपाल नहीं
हल कर ले सारे सवाल मिल
बाकी रहे बबाल नहीं
उम्मीदों के बादल गरजे
बाधा की चमकी बिजली

भौजी गुझिया-सेव बनाये,
देवर-ननद खिझा-खाएँ
छेड़-छाड़ सुन नेह भरी
सासू जी मन-मन मुस्कायें
छाछ-महेरी के सँग खाएँ
गुड़ की मीठी डली लली

नेह निमंत्रण पा वसुधा का
झूम मिले बादल साजन
पुण्य फल गये शत जन्मों के-
श्वास-श्वास नंदन कानन
मिलते-मिलते आस गुजरिया
के मिलने की घड़ी टली

नागिन जैसी टेढ़ी-मेढ़ी
पगडंडी पर सम्हल-सम्हल
चलना रपट न जाना- मिल-जुल
पार करो पथ की फिसलन
लड़ी झुकी उठ मिल चुप बोली
नज़र नज़र से मिली भली

गले मिल गये पंचतत्व फिर
जीवन ने अंगड़ाई ली
बाधा ने मिट अरमानों की
संकुच-संकुच पहुनाई की
साधा अपनों को सपनों ने
बैरिन निन्दिया रूठ जली

- आचार्य संजीव सलिल

25 जुलाई 2014

२८. गाज गिरी खलिहानों पर - संध्या सिंह

मौसम कुछ बिगलैड़ हुआ तो
बैठ गया तूफानों पर
हरियाली के लिए मेघ थे
बरस गए चट्टानों पर

कहीं जमी
पत्थर पर काई
मशरूमों के झुण्ड उगे
कहीं खेत
में सूखी मिट्टी
चिड़िया सारा बीज चुगे

कुदरत की ये मस्ती ठहरी
गाज गिरी खलिहानों पर

खेतों के
हिस्से का पानी
ऊपर नभ में ही खोया
पथरीली
धरती पर जा कर
अम्बर ने काजल धोया

आज हवा की बुरी नज़र है
पावस के वरदानों पर

मेघ पवन की
मनमानी को
कोई कह दे सागर से
कौन पते पर
बादल भेजे
कौन पते पर जा बरसे

हरकारों ने मिट्टी फेरी
मेहनत के अरमानों पर

- संध्या सिंह

२७. हवाओं ने शंख फूँके - राम वल्लभ आचार्य

हवाओं ने शंख फूँके
दिशाओं में बजे मादल
उमड़ कर के घुमड़ कर के
व्योम में छा गये बादल

सागरों से नीर लेकर
धरित्री की पीर लेकर
उड़ चले बनकर पखेरू
धूपवर्णी चीर लेकर
आँजकर अँधियार काजल

शिखर का अभिषेक करते
सरित सर को एक करते
सृष्टि के संताप हरने का
जतन प्रत्येक करते
हुए पुलकित खेत जंगल

झमझमाझम मेह बरसे
निर्झरों सा प्राण हरसे
नींद से जागीं लताएँ
विटप क्षुप तृण पात सरसे
नच रहे हो मोर पागल

-डॉ राम वल्लभ आचार्य

24 जुलाई 2014

२६. शहर की बरसात - रामशंकर वर्मा

चिपचिपाती
उमस के संग ऊब
यारो!
शहर की बरसात भी क्या खूब

खिडकियों से फ्लैट की
दिखते बलाहक
हों कि जैसे सुरमई रूमाल
उड़ रहा उस पर
धवल जोड़ा बलाक
यूँ कि 'रवि वर्मा' उकेरें
छवि कमाल
चंद बूँदे अफसरों के दस्तख़त सी
और इतने में खडंजे
झुग्गियाँ जाती हैं डूब

रेनकोटों
छतरियों बरसातियों की
देह में निकलें हैं पंख
पार्कों चिड़ियाघरों से
हाई वे तक
बज उठे हैं प्रणय के शत शंख
आधुनिकाएँ
व्यस्त प्रेमालाप में
डाल बाहें बाँह में
फिरती फुदकती
संग है महबूब

इन्द्रधनुषी
छत्र सिर पर तान रिक्शे
चल दिए उन्मुक्त
रेनी डे मनाने
डायरी
ट्यूशन टशन के बीच पिसती
ज़िन्दगी को मिल गये जैसे ख़जाने
ठूँठ होते
शहर की बीवाईयों में
फिर लहलहा उट्ठी है डूब

-रामशंकर वर्मा

२५. आ गई वर्षा - रजनी मोरवाल

आ गई वर्षा सड़क
भरने लगी है

झुग्गियाँ चुपचाप
प्लास्टिक को लपेटे,
गठरियों-सी देह
कोने में समेटे,
शहर की रफ़्तार से
डरने लगी है

रात बारिश ने गज़ब का
कहर बरपा
बुझ रहा चुल्हा फफककर
और तड़पा
भूख आँतड़ियाँ कसे
मरने लगी है

गुदड़ियाँ पैबंद की
उधड़ी जहाँ से
कँपकपी मुहँजोर हो
उभरी वहाँ से
छत टपककर शोर
अब करने लगी है

- रजनी मोरवाल

23 जुलाई 2014

२४. घन कुंतल मेघ घिरे - राजेन्द्र गौतम

दिग्नूपुर झनक उठे
घन कुंतल-मेघ घिरे

कब सुध-बुध क्षण-पल की
चम-चम-चम जब चमकी
चंचल-चंचल जल की
हीरक-सी छवि, छलकी
ऐसी रस-धार बही
मन डूबे, डूब तिरे

चेतनता तन की हर
रहा अन्धकार उतर
अम्बर, भू-आँगन भर
यौवन की उठे लहर
ज्वार राग का उमड़ा
बन्धन-तट टूट गिरे

रोम-रोम रोमांचित
तंद्रिल, विश्लथ, कम्पित
हास-सुधा-उर-सिंचित
हुए अधर-पुट कुंचित
दल के दल शतदल के
आनन पर आन फिरें
जब कुंतल-मेघ घिरे
घन कुंतल-मेघ घिरे

- राजेन्द्र गौतम

२३. बारिश नाच रही छन छन - पूर्णिमा वर्मन

मौसम चोला बदल रहा हैं
बारिश नाच रही
छन छन

सावन की पहली बौछारें
सबके मन का ताप उतारें
बादल उमड़ रहे रह-रह कर
तेज हवाएँ मगन पुकारें
धुले हुए सब पेड़ खड़े हैं
चौड़ी सड़कों पर
तन तन

खिड़की पर बूँदें अटकी हैं
सुधियाँ दूर तलक भटकी हैं
आँगन के पानी में तिरती
नावें चलीं मगर अटकी हैं
पार उतरना कठिन नहीं है
दोहराएँगी ये
मन मन

बादल दूर तलक जाएँगे
घर-घर में जीवन लाएँगे
छुपे हुए छतरी में चेहरे
बौछारों से भीग जाएँगे

नंगे पाँवों दौड़ पड़ीं जो
खुशियाँ वारेंगी
जन जन

- पूर्णिमा वर्मन

22 जुलाई 2014

२२. रात भर बरसी घटाएँ- प्रदीप शुक्ल

रात भर बरसी घटाएँ
अब ज़रा-सा थम गयी हैं !
थक गयी बूँदें
ठिठक कर खिड़कियों पर
जम गयी हैं !!

रात ड्यूटी पर गयी माँ
हॉस्पिटल से फ़ोन करती
दिल धड़कता है
कभी खिड़की पे जब
बिजली कड़कती
बेटियाँ घर पर अकेली,
पिता बाहर,
सास भी आश्रम गयी हैं !

रात बारिश भीग कर
सूरज सुबह भी सो रहा है
या कि बादल में
छुपा कर मुहँ,
सुबक करके रो रहा है
किसी कवि की पंक्तियाँ ये
रेडियो पर
आर जे'' को जम गयी हैं !

रात भर ड्यूटी, पड़ा घर पर
सुबह का काम होगा
भारी बारिश से
सड़क पर
रास्ता भी जाम होगा
अपशगुन काली घटाएँ
शहर के माथे पे आकर
रम गयी हैं !

मेरी दीवार से लग कर
पुरानी टीन का टप्पर
घुसा पानी है उसमे
या कि पानी में
घुसा है घर
उस तरफ दीवार, खिड़की
भरी बौछारों से आँसू
नम गयी हैं !

डॉ. प्रदीप शुक्ल

२१. नीरद डोल रहे - पवन प्रताप सिंह पवन

बडे-बडे गुब्बारों जैसे
नीरद डोल रहे

कई दिनों से
धरा पिपासी
चेहरों पर भी
दिखी उदासी
श्वेत-श्वेत
बूँदों-के मोती
छन-छन बोल रहे

कृषक खुशी से
पागल होता
टैं टैं करता
मिट्ठू तोता
रात-रात भर
पपिहा रोता
दादुर बोल रहे

राग मल्हारें,
कजरी की धुन,
भौंरे गाते
गुन-गुन, गुन-गुन
बीत गया है
कब का फागुन
झूला झूल रहे

- पवन प्रताप सिंह 'पवन'

21 जुलाई 2014

२०. रिमझिम बरसात में - पल्लव

आज धरा पर
झुका गगन है, पुनर्मिलन को आतुर मन है ।
क्षितिज कसा ज्योँ बाहुपाश हो
आवेशित दोनोँ का तन है

सूर्य निकट आता है
ज्योँ ज्योँ, विरह तपिश बढती जाती है
दृष्टि कशिश पारे के कण सी - ऊर्ध्वमुखी चढती जाती है
पर नभ को सब ज्ञात धरा का ध्वंस
यही जो जीवन धन है

घन नभ के मृदु
आभासोँ का सांकेतिक सम्प्रेषण जैसे
या कि धरा के तप्त बदन पर झुलसा आँसूकण घन जैसे
नभ ही घन है. घन ही जल है
या कह लो जल ही जीवन है

खग पशु वृक्ष लता
मेँ धरती बहु विधि हर्ष प्रदर्शित करती
शैल शिखर या धरा उचक कर नभ का है आलिंगन करती
घन गर्जन से ताल मिलाता
मुदित मयूरों का नर्तन है

- पल्लव