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21 अगस्त 2014

१३. शंख में रण-स्वर भरो अब - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

कृष्ण ! निशिदिन घुल रहा है
सूर्यतनया में जहर

बांसुरी की धुन नहीं है
भ्रमर की गुन -गुन नहीं है
कंस के व्यामोह में पागल हुआ सारा शहर

पूतना का मन हरा है
दुग्ध, दधि में विष भरा है
प्रदूषण के पक्ष में हैं ताल, तट, नदियाँ, नहर

निशाचर-गण हँस रहे हैं,
अपरिचित भय डस रहे हैं,
अब अँधेरे से घिरे हैं सुबह, संध्या, दोपहर

शंख में रण-स्वर भरो अब
कष्ट वसुधा के हरो अब
हाथ में लो चक्र, जाएँ आततायी पग ठहर

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

१२. जय कन्हैयालाल की - सौरभ पांडेय

लिख रही हैं यातनायें
अनुभवों से
लघुकथाएँ -
मौसम-घड़ी-दिक्काल की !
जय-जय कन्हैया लाल की !!

शासकों के चोंचले हैं
लोग गोवर्द्धन उठायें
हम लुकाठी
ले खड़े हैं
चोंच में आकाश पाएँ
शातिर सदा पद
इन्द्र का
जो सोचता बस चाल की..

अब उफनती
है न जमुना
कालिया मथता अड़ा है
चेतना लुंठित-बलत्कृत
देह-मन
लथपथ पड़ा है
कुब्जा पड़ी हर घाट पर
किसको पड़ी है
ताल की !

नत कमर ले
शांत रहना
पीढ़ियों का सच यही है
कंस फिर पंचायतों में
भाग्य का षडयंत्र भी है.
फिर से जरासंधी-मिलन,
चर्चा हुई है जाल की

क्या गजब हो इस घड़ी जो
साध ले जग
वो हृदय हो
किन्तु यह भी है असंभव
घात-प्रतिघाती सदय हो
जब पूतना की गोद है,
फिर क्या कहें ग्रहचाल की !

-सौरभ पाण्डेय

११. शब्द शब्द वंशी - सीमा अग्रवाल

शब्द शब्द वंशी तो कर दूँ पर
कौन सुन सकेगा कोलाहल में

घूर रहे यमुना के
तट सूखी आँखों से
गुम हुए कदम्ब सभी
निस्सहाय लतरों को
थामेगा कौन कहो
टूटे अवलंब सभी

चहचहाना भूल गए पाखी दल
ईंट पत्थरों वाले जंगल में

रस भीने रास नृत्य
की भाषा बदल गयी
सरल गोपियाँ बदलीं
मादल खंजरी झाँझ
चलते डगमग डग रख
मन की गतियाँ बदलीं

खिलखिलाते सुर सारे डूब गए
भाग-दौड़ के गहरे दलदल में

- सीमा अग्रवाल

20 अगस्त 2014

१०. हे प्रभु ! मोर मुकुट धरि आओ - सतपाल ख़याल

हे प्रभु ! मोर मुकुट धरि आओ
फिर गीता का पाठ पढ़ाओ।

लेकर यक्ष प्रश्न होंठों पर
कितने अर्जुन राह निहारें।
फिर यमुना के तट हैं प्यासे
दीन-हीन हो तुम्हें पुकारें।
बंसी की कोई तान सुनाने
फिर यमुना के तट पर आओ॥

दुर्योधन, दुशासन, शकुनी
फ़ेंक रहे है पाँसे छल के।
आओ रूप विराट बनाकर
छक्के छूटें पापी दल के।
चक्र सुदर्शन लेकर प्रभु जी
पाप अधर्म समूल मिटाओ।

विरले हैं, पर हैं मेरे प्रभु जी
अब भी भक्त तुम्हें सत्कारें।
वेद ऋचाएँ बनी गोपियाँ
चरण कमल पर तन मन वारें।
बनकर प्रेम देव सुखसागर
भक्तों से फिर मिलने आओ।

झूठ, पाप, छल बहुत बढ़ा है
पहुँचा है अब धर्म रसातल।
है चहुँ ओर अधर्म व्यापता
आन संहारो अब पापी दल।
कितने कंस, दुशासन कितने
फिर आकर पापी संहारो।

- सतपाल ख़याल

९. कौन गोवर्धन उठाए - रविशंकर मिश्र रवि

पाप बरसे, कलुष बरसे
 और बरसें वासनायें
 अब बिना श्रीकृष्ण आखिर
 कौन गोवर्धन उठाये

 लोभ हरियाये बहुत
 आचार मूर्छित हो गये हैं
 आजकल भगवान बनकर
 लोग पूजित हो रहे हैं
 कौन अंधी दृष्टि को
 झकझोर कर फिर से जगाये

 धूल बिखरी सभ्यता पर
 पुष्ट भौतिकता हुयी है
 मूल्य मूल्यों के गिरे हैं
 नष्ट नैतिकता हुयी है
 कौन ऐसे वक्त में फिर
 धर्म का बीड़ा उठाये

 समझ में आता नहीं है
 किस सतह पर हम खड़े हैं
 दुधमुही मुस्कान पर
 हैवान के पंजे पड़े हैं
 सोचना है अब हमें
 कुछ करें या बस छटपटायें

- रविशंकर मिश्र रवि
प्रतापगढ़

19 अगस्त 2014

८. कान्हा ओ कान्हा - डॉ. प्रदीप शुक्ल

कान्हा ओ कान्हा
तेरी वंशी हम भूले !!

सुबह शाम गूँज रहीं
कैसी आवाजें
यमुना के कूल खड़े
खिड़की दरवाजे
कदम पेड़ खोज रहे
कहाँ पड़ें झूले !

यमुना में गेंद गिरी
कूदे नंदलाला
लौटे तो पता चला
है गंदा नाला
मर गई यमुना
बात कोई ना कबूले !

खुले आम सड़कों पर
चीर हरण होता
कुर्सी पर यदुवंशी
पड़े पड़े सोता
किसी की मजाल कोई
दुशासन को छू ले !

आज का सुदामा
भीख माँगे चौराहे पर
सखा ने बदल लिया
द्वारका का अपना घर
दुर्योधन, कंस सभी
खूब फले फूले !

- डॉ. प्रदीप शुक्ल

७. शब्द शब्द वंशी - पवन प्रताप सिंह पवन

श्रीकृष्ण आकर इस जहाँ में
मारिए हर कालिया

वे घूमते हैं घर गली में, विषभरी ले पोटली
वातावरण दूषित हुआ, सबने ह्रदय पर चोट ली
देवकी के गर्भ में ही, मूक
शिशु को खा लिया

पाप का पुतला खड़ा है, खड्ग लेकर हाथ में
आ रही तलवार लेकर, पूतना हर बात में
सो गया है चैन से वो, दूध
जिसने पी लिया

हर ताल पर बैठे बकासुर, घात में उस मीन की
नग्न रहती जो सदा ही, क्या कहें उस दीन की
डूब कर मर जाए कैसे, जन्म जो
जल में लिया

इस तरह फैला हलाहल, जल रहा है जल यहाँ
हो रहे ओझल नजारे, उठ रहा है यूँ धुआँ
मूक पक्षी मर रहे हैं मंत्र
स्वाहा जप लिया

नीला हुआ आकाश विष से साँस लेना भी कठिन
शोर है चहुँ ओर भारी कौन सुनता वेणुधुन
कर्णपल्लव सुन रहे हैं, आँख ने
बस रो लिया

- पवन प्रताप सिंह 'पवन

18 अगस्त 2014

६. हाथ हमारे छोटे छोटे

दूध-दही के गागर ऊँचे
हाथ हमारे छोटे-छोटे

सुख-सुविधा के घर में डाले
तुमने भारी-भारी ताले
हमको छूँछी छाछ दिखाकर
तुमने सब नवनीत सँभाले

खा जाएँगे इक दिन तुमको
शाप हमारे मोटे-मोटे

सारा बचपन छील गए जो
गेंद हमारी लील गए जो
हम भी उनका फन नाथेंगे
जीवन-रस कर नील गये जो

अरे! कभी बदलेंगे आख़िर
भाग हमारे खोटे-खोटे

अपना कद ढकने को आतुर
ओ रे! वैभव के शकटासुर
इतने पिए पयोधर विष के
हैं कटु और मुखर अपने सुर

बड़े-बड़े दिग्गज भी इक दिन
पाँव हमारे लोटे-लोटे

- पंकज परिमल

५. कौन गोवर्धन उठाए

सधे हुए होठों को बाँसुरी बजाने दो
मोरपंख रत्नजड़ित मुकुट पे सजाने दो

जीवन भर विष पीकर मीरा ने पद गाये
जन्मों के अन्धे हम सूरदास कहलाये
उभर रहीं मन में जो
छवियाँ, वो आने दो

द्वापर में कृष्ण हुए त्रेता में राम हुए
सीता के संग कभी राधा के नाम हुए
हे भटके मन मुझको
वृन्दावन जाने दो

तुम तो हो निराकार सृष्टि का सृजन तुमसे
ऋषियों का योग- ज्ञान प्रेम का मिलन तुमसे
मुझको भी प्रेम और
भक्ति के खजाने दो

हे प्रभु तुम कालपुरुष और हम खिलौने हैं
हम तेरे मस्तक पर सिर्फ़ एक दिठौने हैं
श्रद्धा के फूलों से
जन्मदिन मनाने दो

- जयकृष्ण राय तुषार
इलाहाबाद

17 अगस्त 2014

४. नव्य पथ नव दृष्टि - कृष्णनंदन मौर्य

नव्य पथ नव-दृष्टि कोई
चाहिए

स्वार्थ गढ़ते हैं कुटिल राजाज्ञायें
चलन में फिर हैं शकुनि की छल-कलायें
आचरण
उत्कृष्ट कोई
चाहिए

मोह के अंधे विरासत लिख रहे हैं
लाक्षागृह पर धुएं फिर दिख रहे हैं
इक विदुर सी
दृष्टि कोई
चाहिए

आ खड़े संबंध रण में सामने हैं
तीर अर्जुन के हुये फिर अनमने हैं
अब समय को
कृष्ण कोई
चाहिए

– कृष्ण नन्दन मौर्य

३. ओ कन्हैया - कमलेश कुमार दीवान

ओ कन्हैया
फिर तुझे आना पड़ेगा

आज फिर मीरा को
विष देकर, सुधारा जा रहा है
द्रोपदी के चीर से
पर्वत बनाया जा रहा है
ओ कन्हैया लाज रखने
फिर तुझे आना पड़ेगा

सूर, उद्भव, नंद-जसुमति
देवकी वसुदेव सब है
पर बहुत है कंस,
फिर कारा बनाया जा रहा है
ओ कन्हैया कंस वध को
फिर तुझे आना पड़ेगा

रूक्मणी -राधा अकेली
गोपियों की बंद बोली
गंग जमुना विषधरों से
हो रही हैं नित्य मैली
ओ कन्हैया कालिया वध
के लिये आना पड़ेगा

- कमलेश कुमार दीवान

16 अगस्त 2014

२. हे मदन मोहन - अनिल मिश्रा

हे मदन मोहन मुरारी !
कर सकूँ वंदन तुम्हारा
इस तरह के
शब्द– स्वर दो।

नित्य माथे पर लगा हो
चरण रज चंदन तुम्हारा
भक्त वत्सल !
भक्ति भर दो ।
हे मदन मोहन मुरारी !
कर सकू वंदन तुम्हारा
इस तरह के
शब्द– स्वर दो।

तोड़ पाऊ मै कभी ना
यह बँधा बंधन तुम्हारा
हाँ मुझे बस
एक वर दो ।
हे मदन मोहन मुरारी !
कर सकू वंदन तुम्हारा
इस तरह के
शब्द– स्वर दो।

- अनिल मिश्रा

१. कृष्ण केवल लोकमंगल - अश्विनी कुमार विष्णु

वेणु की गुंजार है
मधुरास की रसधार
कंस की कारा नहीं संसार

क्रांति भी हैं कृष्ण
कान्हा शान्ति-पारावार
कृष्ण जन्मे रीतियाँ
पाईं नए आकार
कृष्ण केवल लोकमंगल
कृष्ण केवल प्यार

प्रकृति का हैं रूप राधा
कृष्ण की हैं शक्ति
इन्हीं दोनों का मिलन ही
नित्यलीला सृष्टि
प्रेम जिसका भाव है
आह्लाद जिसका सार

भक्ति में आनंद है
और भोग में जीवन
योग है निष्काम रहकर
कर्म का पालन
धर्म के उत्थान हित
हरि ने लिया अवतार

- अश्विनी कुमार विष्णु

13 अगस्त 2014

श्रीकृष्ण भारतीय साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण नायकों में से हैं। न केवल साहित्य बल्कि लोक में उनको लेकर कथा-कहानी-नृत्य-गीत की अनेक विधाएँ अनेक रंगों में अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। नवगीत में भी श्रीकृष्ण को केंद्र में रखकर समसामयिक रचनाएँ की गई हैं। हमारी अगली कार्यशाला भी इसी विषय पर आधारित है। नवगीत की पाठशाला नामक फेसबुक के सदस्य १४-१५-१६ अगस्त को समूह में अपने गीत प्रकाशित कर सकते हैं। चुने हुए गीतों को अनुभूति के जन्माष्टमी विशेषांक में शामिल किया जा सकेगा। अन्य रचनाकारों के लिये नवगीत भेजने की अंतिम तिथि है १६ अगस्त २०१४, पता है- navgeetkipthshala@gmail.com