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13 मार्च 2012

कार्यशाला-२० समीक्षात्मक टिप्पणी

भारतीय काव्य ने ऋतु आगमन को जिस अपूर्व भव्यता से सहेजा है वह अप्रतिम है । वैदिक संस्कृति में तीन ऋतुएँ - ग्रीष्म, वर्षा, शीत- विविध आध्यात्मिक अनुष्ठानों का हेतु थीं। यह क्रम उत्तरोत्तर विकसित होता रहा और ऋतु आवर्तन के सँग नए-नए पर्व, धार्मिक आयोजन, सामाजिक उत्सव सजते-सँवरते गए। "सूर्य के उत्सव का पर्व " मकर-संक्रान्ति सूर्य के उत्तरायण प्रवेश की सन्धिवेला है । वसंत की गुपचुप आहट, नए रँग नई चमक नई महक में सद्यस्नाता-सी प्रकृति, श्रम की सार्थकता निरख प्रमुदित-मन जन-समाज, सृष्टि के कण-कण में सौन्दर्य छलका हुआ-सा ! और इस अपरूप दृश्यावली को सिरजता अक्षय तेजोमय सूर्य ! मंद-मंद मुसकुराती उषाकालीन वर्णछटाएँ हों कि मद्धिम-मद्धिम मुँदती सांध्यकालीन आलोकशोभा सूर्य की सतरंगी रश्मियाँ अनन्त युगों से सृष्टि को अभिनव रूपवैभव एवं ऋद्धि-सिद्धि सम्पन्न किए हुए हैं । सहस्रकर के प्रकाशपुंज बिना ब्रह्माण्ड की कल्पना करना भी असंभव है ।

भारत नदियों का देश है । पवित्र सप्त-नदियों की ही भाँति सैकड़ों छोटी बड़ी सदानीरा जलधाराएँ आदिकाल से ही अर्पण-तर्पण-आराधन-स्नान आदि बहुत से उपक्रमों का हेतु रही हैं । मकर संक्रान्ति के महत्व में यह तथ्य भी सन्निहित है कि जो नदी-स्नान गंगा-स्नान के पर्व के साथ कुछ पखवाड़ों के लिए बंद हो जाता है वह मकर-संक्रान्ति से ही पुनः प्रारम्भ होता है । मंगलकार्य सम्पन्न करने की शुरूआत भी यहीं से होती है । कृष्ण कुमार तिवारी ने घर-परिवार गाँव-गोट की इसी उत्सवी छवि से अपने नवगीत को सँवारा है ;

" संक्रान्ति के शुभ अवसर पर
माँ मुझको स्नान करा दो

गंगा तट पर हम जायेंगे
थोड़ा दर्शन प जायेंगे
पहले तो स्नान करेंगे फिर
तिल का लड्डू खायेंगे

असहाय निर्बल लोगों में
मुझसे खिचड़ी दान करा दो " --( बालहठ)

जन-समुदाय में प्रतिष्ठित परम्पराएँ ही किसी राष्ट्र की समन्वित संस्कृति की संवाहक होती हैं । पूरे परिवेश को स्वर देता-सा शन्नो अग्रवाल का 'सूरज ने खोले नयन कोर' लोक-संस्कृति व लोक-जीवन का चित्रण करता सफल नवगीत है :

" संक्रान्ति मानते हैं हिलमिल
खाते हैं आज सभी गुड़-तिल
सबके हैं हृदय मगन-मगन
ख़ुशबू से महके घर-आँगन
भरता धरती का नवल कलश
अमृत लगता गन्ने का रस
आगत बसंत की चौखट पर
कृषकों के मन लेते हिलोर "

इसी प्रकार शशिकांत गीते ने भी संक्रांति पर्व-आगमन का श्रेष्ठ भावन-रूपायन किया है 'मकर राशि के सूर्य' में । प्रवाहपूर्ण शब्द-योजना और अभिव्यक्ति की सहजता लक्षणीय है :

"मकर राशि के सूर्य आज तो
लगते हैं लड्डू गुड़-तिल के

मतवाला-सा पवन घूमता
नाच रही खेतों में फ़सलें
जी करता है हम भी नाचें
गाएँ ज़ोर-ज़ोर से हँस लें
धीरे धीरे उतर रहे हैं
ओढ़े हुए मौन के छिलके "

लोक अपनी जीवंतता में प्रतिक्षण वर्तमान रहता है । उसकी असीम व्यापकता में प्राणिमात्र की चेतना को प्रशस्त करने की सामर्थ्य है । यह बहुत स्वाभाविक है कि त्रिलोक को द्युतिमान करते सूर्य के सामीप्य में कवि मन को अनन्य आत्मीयता की प्रतीति होने लगे और वह प्रणति अर्पित करते हुए कह उठे :

"युगों युगों के तापस तुम सँग
ताप-तपस्या मैं सह लूँगी
माघ-पौष की ठिठुरन बैरिन
आस तेरी में मैं सह लूँगी
जानूँ तुम फाल्गुन के आते
भेजोगे वासन्ती गहना
तू जाने, तुझसे क्या कहना " --( शशि पाधा, रे सूरज तू चलते रहना)

रचना श्रीवास्तव का 'मुसकाए सूरज' उनकी सौंदर्यभाविक दृष्टि का यथेष्ट परिचायक है । धुन्ध से छनती धूप की रूपरम्यता उन्हें सुदूर अतीत में ले जाती है, उन स्मृतियों में जहाँ माँ की गुनगुनाहट है, अलसछवि गाँव है, अनोखा अपनापन है :

"बादलों की धुंध में मुसकाए
सूरज
खोल गगन के द्वार
धरा पर आए

अधमुंदे नयनों को खोले
सोया सोया गाँव
किरणें द्वार द्वार पर डोलें
नंगे नंगे पाँव
मधुर मधुर मुसकाती अम्मा
गुड़ का पाग पकाए
हौले
बादलों की धुंध में
कुछ गाए "

"दिनकर तेरी ज्योत बढ़े" में कल्पना रामानी मातृतुल्य वत्सलता के साथ जब सूर्य को असीसते हुए कहती हैं "ज्यों दिन/ तिल-तिल बढ़ते जाते/ दिनकर तेरी ज्योत बढ़े" तो मन सहज ही अनुभूति-आर्द्र हो उठता है । भावना की उज्ज्वलता और उमगे उल्लास भरे नवगीत में उनकी परिपक्व जीवन-दृष्टि की स्पष्ट झलक है :

"हर कोने से
सजी पतंगें
मुक्त गगन में लहराईं
तिल गुड़ की सौंधी मिठास
रिश्तों में अपनापन लाई
युवा उमंगें बढ़ी सौगुनी
ज्यों ज्यों ऊपर
डोर चढ़े ! ॰ ॰ ॰

बढ़ता चल मन आरोही
पग नए शिखर पर
आज पड़े !"

ये सभी नवगीत इस अर्थ में सराहनीय हैं कि इनमें लोक अपनी चिराचरित परम्पराओं के सँग उपस्थित है, मुखरित है । तदरूपी बिम्बों के माध्यम से उत्सव का सर्वांग रूपण करने में सफल रहे हैं सभी रचनाकार। छल-छद्म भरी विज्ञापनी उत्सवधर्मिता के इस युग में ये रचनाएँ नितांत सच्ची भी लगती हैं और अत्यंत अच्छी भी । 'ग्लोबलाइज़ेशन' की आड़ में चंद प्रभुतासंपन्न शक्तियाँ जिस सुनियोजित काइयाँपन के साथ लोक व लोक-संस्कृति को तहस-नहस करने पर तुली हैं उसे भाँपने भर से ही भावनाएँ भड़भड़ा उठती हैं । संवेदनशील शब्दकर्मी मन तिलमिला उठता है अपने युग का यह विसंगत यथार्थ देखकर :

"चलते-चलते गूँगा सूरज
क्षण भर तल्ख़ तल्ख़ शब्दों में
जाने क्या क्या आज लिख गया
श्यामपट्ट पर शाम ढले॰ ॰ ॰

जले चिरागों की
बस्ती में
घुस आईं जंगली आँधियाँ
खड़ी कर गईं
कब्रगाह में
रोशन लम्हों की समाधियाँ
किसी सिसकते लौ के आँसू से
जब रचे गए काजलगृह
अंधकार उद्घाटन करने
रोशनियों के गाँव चले " (रामानुज त्रिपाठी, गूँगा सूरज)

धर्मेंद्र कुमार सिंह ने "सूरज के ढाबे पर" में तमाम मानवीय मूल्यों को तत्परता से लीलते जा रहे बाज़ार-तंत्र तथा उत्तराधुनिक जीवन-व्यवहार में आए बदलावों की पड़ताल करते हुए सामयिक व मार्मिक हस्तक्षेप किया है :

" सूरज के ढाबे पर फिर से
दहकी है तंदूरी आग
मौसम आज परोसे मक्के
की रोटी सरसों का साग ॰ ॰ ॰

धीरे धीरे सर्दी जाएगी गर्मी आएगी
बर्गर की कैलोरी तन में जमती ही जाएगी
कितने दिन तक मानव ऐसा कूड़ा खाएगा
इक दिन सूरज मॉलों में भी ढाबा खुलवाएगा
उस दिन जाड़ा ख़ुद ले लेगा
इस दुनिया से चिर बैराग । "

संवेदनशून्य वर्तमान के अंतर्विरोधों से जूझते मनुष्य के लिए सूर्य के शुभ रूप की कामना की है आचार्य संजीव सलिल ने "शीत से कँपती धरा" में :

"उत्तरायण की अँगीठी में बढ़े फिर ताप--
आस आँगन का बदल रवि-रश्मियां दें रंग
स्वार्थ-कचरा फटक फेंके
कोशिशों का सूप

शीत से कँपती धरा की
ओढ़नी है धूप
कोहरे में छिप न पाए
सूर्य का शुभ रूप !"

पूँजीकामी व्यवस्था की सर्वग्रासी लिप्सा कुटिल तटस्थता के साथ जनसामान्य के जीवन की सभी संभावनाओं पर धूल उलीचे जा रही है । निरंतर तिरस्कृत, उपेक्षित, अभाव-संघर्षों व ऊहापोह भरे आम आदमी की घनीभूत व्यथा को मार्मिकता के साथ उभारा है प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने "तिल के लड्डू" में :

"झोंपड़ियों के ठीक सामने
बिल्डिंग पचपन माले की
तिल के लड्डू माँग रही है
बिटिया रिक्शेवाले की ॰ ॰ ॰

एक तरफ़ छप्पर छज्जे
छककर पकवान उड़ाते
बड़ी हवेली के ज़र्रे तक
ख़ुरमा बतियाँ खाते
और इस तरफ़ खड़ी बेचारी
मजबूरी लाचारी
केंप लगाकर भाग्य बेचते
रोटी के व्यापारी
तन और मन की सौदेबाज़ी
कीमत लगी निवाले की । "

कुशल बिम्बात्मकता, प्रतीक-विधान, भाव, संवेदना व विचारों की अनूठी समन्विति ने "सूरज के घोड़े" को असीम अर्थविस्तार दिया है :

"सूरज से भी बढ़े चढ़े हैं
सूरज के घोड़े
रथ के आगे सजे खड़े हैं
सूरज के घोड़े

लो सूरज के
हाथों से वल्गाएँ छूट गईं
बेलगाम हो गए सभी सीमाएँ टूट गईं
किसको है अब होश कि इन
सातों के मुख मोड़े " -- (सत्यनारायण)

मानवीय सरोकारों से प्रतिबद्धता दर्शाता श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का नवगीत "सर्द मौसम की कहानी" विशिष्ट ग्राम-बोध के चलते मन को छू लेता है । किसान की संवेदनसिक्त कर्मठता का प्रकृति की मनोहारी शोभा के साथ संयोजन देखते ही बनता है :

"सर्द रातों में लिखी है
अथक श्रम की नव कहानी
कृषक राजा कह रहा है
सुन रही है अवनि रानी ॰ ॰ ॰

उल्लसित उड़ती पतंगें
नील नभ पर अनिल में
बंधा डोरी से समय की
जीव जीवन अखिल में
पर्वतों की चोटियों पर
बर्फ़ की चादर सुहानी "

आपाधापी, ऊब, अंतहीन विषण्णता से उपजे नैराश्य को विच्छिन्न करता स्वर है परमेश्वर फुँकवाल के नवगीत "किरणों की अगाध नदी" का । उनके शब्दों में आस्था भी है उद्बोधन भी :

" धरती कभी न छोड़े चलना
सूरज कभी न जलना !

गिरें चढ़ें ऋतुओं के पारे
हालातों से हम न हारें
कर्म रँगेगा जीवन सारे
उससे ही चमकेंगे तारे
सुबह गँवा दी सोने में तो
शाम हाथ मलना "

प्रकृति के साथ हर देशकाल परिस्थिति में मानव ने अंतरंग साहचर्य अनुभव किया है । नानारूपधरा प्रकृति के प्रस्तीर्ण सौन्दर्य से अभिभूत हुए बिना नहीं रहा जा सकता । कुमार रवीद्र का सुघर सुललित नवगीत "सूरज देवता आए " सहज ही पाठक को तन्मनस्क कर लेता है :

"सूरज देवता आये
जंगल-घाट सिहाये

धूप आरती हुई
गंध के पर्व हुए दिन
ओस-भिगोई
बिरछ-गाछ की साँसें कमसिन
हरी घास ने
इंद्रधनुष हैं उमग बिछाये"

इसी प्रकार हरीश निगम का प्रकृति रूपांकन रोम-रोम में पुलक भर तन-मन को संपूर्णतया झंकृत-संवेदित कर देता है :

"शाखों ने झूमकर बुने
किरणों के गीत कुनकुने
देहों को
बांसुरी बनाने के
दिन आए
धूप धूप गाने के" -- (धूप धूप गाने के )

संध्या सिंह का "पतंग एक सपना" मर्मोष्म अंतर्भावों भरा, आशा-उल्लास के ओजस्वी स्वरों से अलंकृत सुमधुर नवगीत है । संवेदना की हृदयगम्यता और मनोमयी लयरचना प्रभावित करती है:

"समय उड़ चला सर्द हवा सा
मन के आसमान का सूरज
देता मगर दिलासा
सपनों पर से हटा कुहासा

रेंग लिए धरती पर कितना
अब अम्बर से जुड़ने दो
पतंग सरीखी रंग-बिरंगी
आशाओं को उड़ने दो

कागज से भी कोमल हैं पर
उलझ न जाएँ ज़रा सा "

अनिल कुमार वर्मा का शब्द-संयमित नवगीत "साँसों की वीणा" जीवन के विविध संदर्भों का गाम्भीर्यपूर्ण प्रत्यंकन करता है :
जीवन भर सूरज सा
जलते ही जाना है

जग के उपहासों से
मन में मत व्रीड़ा हो
अधरों पर हास लिए
अंतस की पीड़ा हो॰ ॰ ॰

जीवन की प्यासों में
आशा का नीर भरे
साँसों की वीणा को
कसते ही जाना है "

कार्यशाला-२० "सूरज रे जलते रहना" के मिस रचनाकारों के साथ ही साथ पाठकों को भी सूर्य की दिव्य दीप्ति में संचरण का अवसर उपलब्ध कराने के लिए अभिनंदनीय हैं। सुझाए विषय को केंद्र में रख कुल अट्ठारह रचनाकारों ने अपने कृतित्व से इस आयोजन को भव्य विशिष्टता देकर नवगीत के समुज्ज्वल भविष्य के प्रति काव्यप्रेमियों को आश्वस्त किया है ।

---- डा॰ अश्विनी कुमार विष्णु,

20 फ़रवरी 2012

कुछ प्रतीक्षा और...

अक्सर दो कार्यशालाओं के बीच लंबा अंतराल आ जाता है। कार्यशालाओं में लिख लेना और प्रकाशित हो जाना महत्त्वपूर्ण है लेकिन उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि जो कुछ लिखा गया है, उसकी समुचित समीक्षा भी हो। यों भी समीक्षात्मक साहित्य नवगीत के क्षेत्र में अन्य साहित्य की अपेक्षा कम है, इस ओर लोगों की रुचि और ध्यान कम गया है। इसको ध्यान में रखते हुए हर कार्यशाला के बाद हमारा प्रयत्न होता है कि कार्यशाला के नवगीतों की समुचित समीक्षा हो जाय। यद्यपि इसमें अधिक सफलता नहीं मिली है पर प्रयत्न जारी है।

समीक्षा के लिये प्रत्येक कार्यशाला के लिये अलग समीक्षक का चुनाव किया जाता है। कभी समीक्षक का सहयोग मिलते है और कभी नहीं भी मिलती। नहीं मिलने के बहुत से कारण होते हैं जिनमें प्रमुख है समीक्षक का इंटरनेट से ठीक से जुड़ाव न होना और ब्लाग तकनीक को ठीक से समझ न पाना। अचानक व्यस्तता एक और कारण है।  जिसके कारण इस बार की समीक्षात्मक टिप्पणी प्रकाशित करने में देर हो रही है। इस बार के नवगीतों पर टिप्पणी करेंगे डॉ. अश्विनी कुमार विष्णु। वे स्वयं नवगीतकार है, विभिन्न भाषाओं एवं विधाओं के साथ जुड़े हुए हैं। हर रचना में गहरे पैठकर उसकी खूबियों को सामने लाने और कमियों को उजागर करने का उनका कौशल हमारे रचनाकारों को खूब रुचेगा।  

आशा है कि २५ फरवरी तक डॉ. अश्विनी की समीक्षा हमें मिल जाएगी। मिलते ही उसे प्रकाशित कर देंगे साथ ही नए विषय की घोषणा भी हो जाएगी। तब तक थोड़ी सी प्रतीक्षा....

31 जनवरी 2012

१८. सुरज देवता आये

सुरज देवता आये
जंगल-घाट सिहाये

धूप आरती हुई
गंध के पर्व हुए दिन
ओस-भिगोई
बिरछ-गाछ की साँसें कमसिन

हरी घास ने
इन्द्रधनुष हैं उमग बिछाये

बर्फ पिघलने लगी
नदी-झरने भी लौटे
हटा दिये किरणों ने
अपने धुंध-मुखौटे

भौरों ने हैं
गीत फागुनी दिन-भर गाये

पीली चूनर ओढ़
हवा ने रंग बिखेरे
व्यापे घर-घर
सरसों के रँग-रँगे उजेरे

ऋतु फगुनाई
बूढ़े बरगद भी बौराये

कुमार रवीन्द्र
हिसार से

१७. मुस्काए सूरज

बादलों की धुंध में मुस्काए
सूरज
खोल गगन के द्वार
धरा पर आए

गुनगुनाए धूप
आए स्वेटर सा आराम
अब तो भैया मस्ती में हों
अपने सारे काम
बाँध गठरिया आलस भागे
ट्रेन-टिकट कटाए
देखो
बादलों की धुंध में
शरमाए

अधमुंदे नयनों को खोले
सोया सोया गाँव
किरणें द्वार द्वार पर डोलें
नंगे नंगे पाँव
मधुर मधुर मुस्काती अम्मा
गुड़ का पाग पकाए
हौले
बादलों की धुंध में
कुछ गाए

--रचना श्रीवास्तव
यू.एस.ए. से

30 जनवरी 2012

१६. सूरज के घोड़े

सूरज से भी बढ़े चढ़े हैं
सूरज के घोड़े
रथ के आगे सजे खड़े है
सूरज के घोड़े

लो सूरज के
हाथों से वल्गाएँ छूट गईं
बेलगाम हो गए सभी सीमाएँ टूट गईं
किसको है अब होश कि इन
सातों के मुख मोड़े

इनकी टापों
की दहशत है दसों दिशाओं में
बदहवास ये चलें कि है सनसनी हवाओं में
अजब थरथरी उधर भक्त जन
खड़े हाथ जोड़े

जाने क्या
रौंदे क्या कुचले इनकी मनमानी
लगता है अब तो सिर तक आ जाएगा पानी
आनेवाला कल शायद इनके
तिलिस्म तोड़े

-सत्यनारायण
पटना से

29 जनवरी 2012

२९. बालहठ

संक्रांति के शुभ अवसर पर
माँ मुझको स्नान करा दो

गंगा तट पर हम जायेंगे
थोडा दर्शन पा जायेंगे
पहले तो स्नान करेंगे फिर
तिल का लड्डू खायेंगे

असहाय निर्बल लोंगो में
मुझसे खिचड़ी दान करा दो

कल कल सा जो जल बहता है
निर्मल मन मेरा कहता है
जीवन की धरा सा अविरल
हरपल चलता ही रहता है

पावन और पवित्र है संगम
मुझको अमृतपान करा दो

रंग-बिरंगी उड़े पतंगे
मेरे मन में भरे उमंगें
जी करता है मै उड़ जाऊं
नील गगन में इनके संगे

कैसे मै तुमको समझाऊं
मुझे पतंगे, डोर दिला दो

-कृष्णकुमार किशन
बरेली से

28 जनवरी 2012

१४. धूप धूप गाने के

कुहरे को ओढ़ने
बिछाने के दिन आए
दिन आए
धूप धूप गाने के

शाखों नने झूमकर बुने
किरणों के गीत कुनकुने
देहों को
बाँसुरी बनाने के
दिन आए
धूप धूप गाने के

छुअनें सब तितलियाँ हुईं
खुल के हँसती छुई मुई
सुधियों की
औस में नहाने के
दिन आए
धूप धूप गाने के

हरीश निगम
-सतना से

27 जनवरी 2012

१३. सूरज ने खोले नयन कोर

हट गया आवरण कोहरे का
सूरज ने खोले नयन कोर

नीड़ में दुबके बैठे आकुल
भोर हुई तो चहके खगकुल
खुले झरोखे हवा की सनसन
आकर तन में भरती सिहरन
कमल सरोवर पर अलि-राग
काँव-काँव कहीं करते काग
नव उमंग, मन में हलचल
हर्षित हैं तरु-पल्लव विभोर

संक्रांति मनाते हैं हिलमिल
खाते हैं आज सभी गुड़-तिल
सबके हैं हृदय मगन-मगन
खुशबू से महके घर-आँगन
भरता धरती का नवल कलस
अमृत लगता गन्ने का रस
आहट बसंत की चौखट पर
कृषकों के मन लेते हिलोर

है नीलगगन पर रंग छाया
मौसम पतंग का फिर आया
उड़तीं फरफर रुमालों सी
मंझा लिपटी है बालों सी
झूम-झूमकर, इठला कर
जीत-हार की होड़ लगा कर
ऊपर जाकर उड़तीं नभ पर
छत-मुँडेर हर जगह शोर

-शन्नो अग्रवाल
लंदन से

26 जनवरी 2012

१२. रे सूरज तू चलते रहना

रात अमा ने बाँधे घेरे
निशितारों ने डाले डेरे
उदयाचल के खोल झरोखे
सूरज तू तो जलते रहना
कलश ज्योत के भरते रहना

अम्बर की गलियों में कब से
राहू-केतु घूम रहे
अँधियारे की चादर ओढ़े
काले मेघा झूम रहे
किरणों की थामे कंदीलें
नभ गँगा में तरते रहना
ज्योतिर्मय तू चलते रहना

युगों- युगों के तापस तुम संग
ताप तपस्या मैं तप लूँगी
माघ-पोष की ठिठुरन बैरिन
आस तेरी में मैं सह लूँगी
जानूँ तुम फाल्गुन के आते
भेजोगे वासन्ती गहना
तू जाने, तुझसे क्या कहना

दूर क्षितिज पर रेखाओं ने
ओढ़ी है सतरंगी चूनर
उड़ी पतंगें मनुहारों की
शाख –शाख ने बाँधे झूमर
छू लेना पर्वत का मस्तक
धीर धरा का धरते रहना

रे सूरज तू चलते रहना !!!!!

शशि पाधा
यू.एस.ए. से

25 जनवरी 2012

११. सर्द मौसम की कहानी

सर्द रातों में लिखी है
अथक श्रम की नव कहानी
कृषक राजा कह रहा है
सुन रही है अवनि रानी
सर्द मौसम की कहानी

आवृत हो मकर पथ पर
’नित्य’ तेजस बादलों में
ध्येय ज्यों लिपटा हुआ हो
कर्म के अंतस पलों में
किन्तु खेतों में फसल सब
मांगती है उष्ण पानी
सर्द मौसम की कहानी

उल्लसित उड़ती पतंगे
नील नभ पर अनिल में
बंधा डोरी से समय की
जीव जीवन अखिल में
पर्वतों की चोटियों पर
बर्फ़ की चादर सुहानी
सर्द मौसम की कहानी

कृषक राजा कह रहा है
सुन रही है अवनि रानी
सर्द मौसम की कहानी

-श्रीकांत मिश्र कांत
कोलकाता से

24 जनवरी 2012

१०. मकर राशि के सूर्य

मकर राषि के सूर्य आज तो
लगते हैं लडडू गुड़-तिल के

इन्द्रधनुष के रंग बिखेरे
नभ में ढेरों-ढेर पतंगें
फिर मन में अंगड़ाई लेतीं
जागी ढेरों-ढेर उमंगें
उधर कहीं वीणाएं बजती
इधर बजे इकतारे दिल के

मतवाला-सा पवन घूमता
नाच रही खेतों में फसलें
जी करता है हम भी नाचें
गाएँ जोर-जोर से हँस लें
धीरे-धीरे उतर रहे हैं
ओढ़े हुए मौन के छिलके

- शशिकांत गीते

23 जनवरी 2012

९. सूरज के ढाबे पर

सूरज के ढाबे पर फिर से
दहकी है तंदूरी आग
मौसम आज परोसे मक्के
की रोटी सरसों का साग

इसका सादापन
प्यारे पकवानों पर भारी
मिट्टी सी है इसकी खुशबू, गुड़ से है यारी
जीभ हलों की इसको खाकर और तेज होती
बर्फीले खेतों को मक्खन-सा करके बोती
इसीलिए शायद मक्खन का
दिल से इसके अनुराग

रोज काल से
पेंच लड़ाकर ये जीता करता
धूप में माँझा तन का मंझा मुश्किल से कटता
मन-पतंग ने बाँध लिया है माटी से बंधन
बोझ हटा कल की लालच का छूती नील गगन
महक रहे हैं इसी स्वाद से गाँव,
खेत, घर, आँगन, बाग

धीरे धीरे सर्दी जाएगी गर्मी आएगी
बर्गर की कैलोरी तन में जमती ही जाएगी
कितने दिन तक मानव ऐसे कूड़ा खाएगा
इक दिन सूरज मॉलों में भी ढाबा खुलवाएगा
उस दिन जाड़ा खुद ले लगा
इस दुनिया से चिर बैराग

धर्मेन्द्र कुमार सिंह सज्जन

22 जनवरी 2012

८. दिनकर तेरी ज्योत बढ़े

ज्यों दिन
तिल-तिल बढ़ते जाते
दिनकर तेरी ज्योत बढ़े

जाओ रानी
गठरी बाँधो
शीत ऋतु को किया इशारा
नियम तुम्हारा नित्य पुरातन
सदियाँ बीतीं तू नहीं हारा।
साँझ ढले कहीं और चल दिये
आ जाते हो
भोर पड़े

हर कोने से
सजी पतंगें
मुक्त गगन में लहराईं
तिल गुड की सोंधी मिठास
रिश्तों में अपनापन लाई
युवा उमंगें बढ़ीं सौ गुनी
ज्यों ज्यों ऊपर
डोर चढ़े

मकर प्रवेश
तुम्हारा सूरज
भाग्य कर्म का है लेखा
जोड़ घटा कर शेष बचा जो
कहलाए जीवन रेखा
बढ़ता चल मन आरोही
पग नए शिखर पर
आज पड़े

कल्पना रामानी
मुंबई से

21 जनवरी 2012

७. शीत से कँपती धरा

शीत से कँपती धरा की
ओढ़नी है धूप
कोहरे में छिप न पाये
सूर्य का शुभ रूप

सियासत की आँधियों में उड़ाएँ सच की पतंग
बाँध जोता और माँझा, हवाओं से छेड़ जंग
उत्तरायण की अँगीठी में बढ़े फिर ताप-
आस आँगन का बदल रवि-रश्मियाँ दें रंग
स्वार्थ-कचरा फटक-फेंके
कोशिशों का सूप

मुँडेरे श्रम-काग बैठे सफलता को टेर
न्याय-गृह में देर कर पाये न अब अंधेर
लोक पर हावी नहीं हो सेवकों का तंत्र-
रजक-लांछित सिया वन जाए न अबकी बेर
झोपड़ी में तम न हो
ना रौशनी में भूप

पड़ोसी दिखला न पाए अब कभी भी आँख
शौर्य बाली- स्वार्थ रावण दबाले निज काँख
क्रौच को कोई न शर अब कभी पाये वेध-
आसमां को नाप ले नव हौसलों का पांख
समेटे बाधाएँ अपनी
कोख में अब कूप


-आचार्य संजीव सलिल

20 जनवरी 2012

६. साँसों की वीणा

उषा की अरुणिमा में
ऊँचाई माप रहे
संध्या की लाली में
गहराई झाँक रहे
जीवन भर सूरज सा
जलते ही जाना है

धरती के दोहन में
धीरता को ढूढिये
अम्बर के दूषण में
शीलता को खोजिये
नदियों के कल-कल से
गति का अनुमान करे
पर्वत के शिखरों से
उन्नति का ध्यान धरे
अनुभव की शाला में
पढ़ते ही जाना है

जग के उपहासों से
मन में मत व्रीड़ा हो
अधरों पर हास लिये
अन्तस की पीड़ा हो
नित नूतन भावों का
अभिनव शृंगार करे
जीवन की प्यासों में
आशा का नीर भरे
साँसों की वीणा को
कसते ही जाना है

--अनिल वर्मा
लखनऊ से

19 जनवरी 2012

५, गूँगा सूरज

चलते-चलते गूंगा सूरज
क्षण भर तल्ख़ तल्ख़ शब्दों में
जाने क्या क्या आज लिख गया
श्यामपट्ट पर शाम ढले।

किसी पेड़ की
दुखद मौत पर
कोई चिड़िया सिसक रही है
प्यासे प्रश्नों
के उत्तर में
नदी मौन है झिझक रही है
धूप छांव की फटी पिछौरी
ओढ़े ये अनमने मौसम
आए सूनेपन को छलने
किंतु स्वयं ही गए छले।

जले चिराग़ों की
बस्ती में
घुस आईं जंगली आँधियाँ
खड़ी कर गईं
कब्रगाह में
रोशन लम्हों की समाधियाँ
किसी सिसकती लौ के आँसू से
जब रचे गए काजल गृह
अंधकार उद्घाटन करने
रोशनियों के गाँव चले।

ठहरे हुए समय को
जब से
बारूदों ने नब्ज़ छुआ है
मौन हवा के
कटे हाथ से
रिस रिस कर के खून चुआ है
जिस्म नोच कर आसमान का
एक लोथड़ा लिए चोंच में
उतर रहे हैं गिद्ध
पसरते सन्नाटों की छाँव तले।

-रामानुज त्रिपाठी

18 जनवरी 2012

४. किरणों की अगाध नदी

धरती कभी न छोड़े चलना
सूरज कभी न जलना

नवल मुकुल शाखों पर फूटें
पतझड़ कोई बाग न लूटे
दिनकर के धरती से रिश्ते
सदा हरे हों कभी न टूटें
प्रेम की साँसों युगों युगों तक
जीवन में ढलना

गिरें चढ़ें ऋतुओं के पारे
हालातों से हम ना हारें
कर्म रँगेगा जीवन सारे
उस से ही चमकेंगे तारे
सुबह गवाँ दी सोने में तो
शाम हाथ मलना

रात की छाती से ही बहता
स्वप्नों का दुधिया सोता है
अँधियारे के बाद सुबह हो
ऐसा कहाँ सदा होता है
काल की सदियों से आदत है
बगुले सा छलना

धरा धुंध से पटी हुई हो
तमस दृष्टि से सटी हुई हो
किरणों की अगाध नदी फिर
चाहे तट से कटी हुई हो
पौष माघ की सख्ती में
फागुन तुम पलना

-परमेश्वर फुँकवाल
लखनऊ से

17 जनवरी 2012

३. नभ में उमंगें !

लहराईं नभ में उमंगें उमंगें
पतंगें पतंगें पतंगें पतंगें !

गागर की ठीकर से
चमकाए एड़ी
चली आई छत पे
किरन दौड़ी दौड़ी
सलोनी-सी आँखों में
सपने ही सपने
करे क्या हुई है
उमर ही निगोड़ी
हँसें नख से शिख तक तरंगें तरंगें !

न अंबुआ में अब तक
उगी बौर-कोंपल
न टेसू के मन में
कहीं कोई हलचल
खिली तो खिली बस
इसी तन में लाली
हिली तो छमक-छम
इसी पाँव पायल
जिया गीत गूँजें हिया में मृदंगें !

--अश्विनी कुमार विष्णु

16 जनवरी 2012

२. पतंग... एक सपना

समय उड़ चला सर्द हवा सा
मन के आसमान का सूरज
देता मगर दिलासा
सपनों पर से हटा कुहासा

रेंग लिये धरती पर कितना
अब अम्बर से जुड़ने दो
पतंग सरीखी रंग बिरंगी
आशाओं को उड़ने दो

कागज से भी कोमल हैं पर
उलझ ना जाएँ जरा सा

नई उमंगो का मांझा अब
अपने हाथ मे आने दो
पर फैलाए आस का पंछी
छत-मुंडेर पर गाने दो

हर्ष भरे नयनों से देखो
रीता घट भी लगे भरा सा

-संध्या सिंह
लखनऊ से

15 जनवरी 2012

१. तिल के लड्डू

तिल के लड्डू माँग रही है
बिटिया रिक्शे वाले की|

कई दिनों की बीमारी ने
रिक्शा नहीं चलाया
इस कारण से मुट्ठी भर भी
दाना घर ना आया
किसी दियाथाने, सिरहाने
सिक्के कुछ मिल जाएँ
पूरी हो लें इससे शायद
बिटिया की इच्छाएं
हुई तलाशी चाचाजी के
बीड़ी वाले आले की
तिल के लड्डू मांग रही है
बिटिया रिक्शे वाले की|

बड़ी भोर से शाम ढले तक
सूरज लड़ा बेचारा
कोहरे का आतंक, दुबककर
सभी मोर्चे हारा
रोज पतंगो सी कट जाती
धरणी की इच्छायें
आसमान की क्रूर कथायें
किस किस को बतलायें
झोपड़ियों के ठीक सामने
बिल्डिंग पचपन माले की
तिल के लड्डू मांग रही है
बिटिया रिक्शे वाले की|

एक तरफ छप्पर छज्जे
छककर पकवान उड़ाते
बड़ी हवेली के जर्रे तक
खुरमा बतियां खाते
और इस तरफ खड़ी बेचारी
मजबूरी लाचारी
केंप लगाकर भाग्य बेचते
रोटी के व्यापारी
तन और मन की सौदे बाजी
कीमत लगी निवाले की
तिल के लड्डू मांग रही रही है
बिटिया रिक्शे वाले की|

प्रभुदयाल श्रीवास्तव