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24 मार्च 2013

१५. फागुन और बयार

ठंडी चले बयार,
गंध में डूबे आँगन द्वार
फागुन आया।

जैसे कोई
थाप चंग पर देकर फगुआ गाए
कोई भीड़ भरे मेले में मिले
और खो जाए
वेसे मन के द्वारे आकर
रूप करे मनुहार
जाने कितनी बार
फागुन आया।

जैसे कोई
किसी बहाने अपने को दुहराए
तन गदराए, मन अकुलाए, कहा न
कुछ भी जाए,
वैसे सूने में हर क्षण ही
मौन करे शृंगार,
रंगों के अंबार
फागुन आया।

-डॉ. तारादत्त निर्विरोध
(विगत १४ मार्च को गीतकार तारादत्त निर्विरोध हमारे बीच नहीं रहे। दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि स्वरूप इस कार्यशाला को हम उन्हीं की रचना से पूरा कर रहे हैं।)
-टीम नवगीत की पाठशाला

१४. ऐसे फागुन आएँ

ओ भाई, ऐसे फागुन आएँ
जो न गाए गीत, गाए हो रीत
खूब बतियाएँ
ओ भाई, ऐसे फागुन आएँ

दरक गई है प्रीत परस्पर
ढूढे मिले न मन के मीत
हारे हुये,
समय के संग संग
कहाँ मिली है सबको जीत
दुख सुख साथ साथ चलते हैं
हम सबको
ललचाएँ
ओ भाई, ऐसे फागुन आएँ

नये सृजन हों, नव आशाएँ
नए रंग हों नव आभाएँ
नया समय है,
नव विचार से
पा जाये हम नई दिशाएँ
कोई न छूटे सँगी साथी
साथ साथ
चल पाएँ
ओ भाई, ऐसे फागुन आएँ

-कमलेश कुमार दीवान

१३. फागुन

पुनः
समय की आँखों में है
महुआया फागुन

पोर-पोर सरसों पियराई
खुशबू की काया अंगड़ाई
सांझ – सकारे
सगुन पखेरू
बांच रहे निर्गुन

फिर फूले पलाश - वन दहके
बाध, बधारे, खेत, घर महके
बौरों का
पाहुर लेकर
आया मौसम पाहुन

है बरसात मदीर गंधों की
प्रेमगीत के स्वर-छंदों की
मन मे जमी
मेल धो देंगे
शब्दों के साबुन

नचिकेता

22 मार्च 2013

१२. अजब गजब रंग

शर्मीले गीत कहीं चुटकीले छंद हैं
मदमाये फागुन के
अजब गजब रंग हैं

बौराये आमों से कैरी मुसकाएँ
टेसू निर्लज्ज खड़े पलकें झपकाएँ
पछुवा की झकझोरें
करती हुड़दंग हैं

अरहर के गुलदस्ते अकड़-अकड़ डोलें
सरसों की फलियाँ भी रुनझुन झुन बोलें
सेमल का रूप निरख
तोते सब दंग हैं

महँगाई जन जन का बजा रही बाजा
राजनीति की बिसात पर बैठे राजा
बूढ़े पीपल शायद
बन गये मलंग हैं

-अनिल कुमार वर्मा

21 मार्च 2013

११. फगुआ – ढोल बजा दे

हर कडुवाहट पर
जीवन की
आज अबीर लगा दे
फगुआ – ढोल बजा दे

तेज हुआ रवि
भागी ठिठुरन
शीत – उष्ण – सी
ऋतु की चितवन
अकड़ गयी जो
टहनी मन की
उसको तनिक लचा दे

खोलें गाँठ
लगी जो छल की
रिहा करें हम
छवि निश्छल की
जलन मची अनबन की
उस पर
शीतल बैन लगा दे

साल नया है
पहला दिन है
मधुवन – गंध
अभी कमसिन है
सुनो, पपीहे
ऐसे में तू
कोयल के सुर गा दे

- अवनीश सिंह चौहान
(म्रारादाबाद)

20 मार्च 2013

१०. फाग के दिन

बात या
बिन बात के मुस्कान पहने
तिर रहे हैं फाग के दिन

हैं पलाशों के
घरों मेंरंग की छिटकारियाँ
गुलमोहर ने सुर्ख़ियों की
खोल दीं अलमारियाँ
आम के बौरों पे मोती से चमकते
गिर रहे हैंफाग के दिन

पूरबी झोंके
चले हैं घेर कर पगडंडियाँ
खोलते घूँघट सताएँ
कर रहे अठखेलियाँ
त्यौंरियों को देख हँसते खिलखिलाते
फिर रहे हैं फाग के दिन

गठरियाँ ले
याद की गुपचुप कहीं बैठे बिछोड़े
भंग की मस्ती चढ़ाए
है मिलन ने बाँध तोड़े
चटक-धूसर रंग के घेरों में खुद भी
घिर रहे हैं फाग के दिन

सीमा अग्रवाल
(कोरबा छत्तीसगढ़)

19 मार्च 2013

९. होली के रंग

होली का हर
रंग अनोखा।

रंगी हथेली लेकर दौड़े
दूर हुए सब मन के घोड़े,
चली गई मुस्कानें देकर
बोझिल मन पर चले हथौड़े,
साथ रह गया
लेखा-जोखा।

भूल गए वो ढाई आखर
पथ में साथ किसी का पाकर,
अनजानी रह गई विरासत
प्रीत हुई बेदम अकुलाकर,
किसके साथ हुआ
क्या धोखा।

मौसम ने कर ली मनमानी,
दिशा-दिशा में चादर तानी,
उड़े रंग के बादल नभ में,
भूतल भरा समंदर पानी,
मत करना तुम
बंद झरोखा।

-महेश सोनी

18 मार्च 2013

८. और... रंग में भीगे दिन

और...
रंग में भीगे दिन ये क्या आये
हम बौराये

दिन पद्माकर
रातें देव-बिहारी हैं
उषा-सुन्दरी
हुईं दिशाएँ सारी हैं

हर पल-छिन
आलिंगन माँगे - होली गाये
हम बौराये


इंद्रधनुष-फूलों पर
भौरों की गुनगुन
गूँज रही साँसों में
मीठी वंशीधुन

पहली रितु की
याद जगी ख़ुद को बिसराये
हम बौराये

देखो सजनी,
हवा हुई वृन्दावन है
खिली चाँदनी लगती
रोली-चन्दन है

सूरज ने
हर घाटी में गुलाल बिखराये
हम बौराये

-कुमार रवीन्द्र
(हिसार)

17 मार्च 2013

७. फागुन में

सडकों पर
बाजार सजे हैं फागुन में
बहुत दूर से तार बजे हैं
फागुन में।

खेतों में सरसों ने पीला रंग भरा
बौर आम की टहनी-टहनी पर उतरा
नीम झूमने लगी मस्त हो
फागुन में।

पीपल महुआ सभी
नहाकर निकले हैं
बूढे बरगद ने भी कपडे बदले हैं
कोयल का संगीत चल रहा
फागुन में।

रूप रंग से धरती जहाँ नहाती है
महानगर मे याद गाँव की आती है
नया नहीं कुछ यहाँ
कहीं भी फागुन में।

-भारतेन्दु मिश्र
(नई दिल्ली)

16 मार्च 2013

६. रंगों का नव पर्व बसंती

रंगों का नव पर्व बसंती
सतरंगा आया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

आशा पंछी को खोजे से
ठौर नहीं मिलती.
महानगर में शिव-पूजन को
बौर नहीं मिलती
चकित अपर्णा देख, अपर्णा
है भू की काया

कागा-कोयल का अंतर अब
जाने कैसे कौन?
चित्र किताबों में देखें,
बोली अनुमानें मौन
भजन भुला कर डिस्को-गाना
मंदिर में गाया

है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
'सलिल' मुस्कुराया

-संजीव सलिल

15 मार्च 2013

५. कैसे कैसे रंग

फागुन की
झोली से निकले कैसे कैसे रंग
लो भइया!
फिर शुरू हो गयी होली की हुड़दंग

यूँ बौराया
आम कि सारा मौसम बौराया
कोयल ऐसे कूकी
सोया दर्द उभर आया
हवा चली मदभरी कि जैसे
पड़ी कुयें में भंग

जीजा–साली
देवर–भौजी जैसे रिश्ते हैं
हँसी–ठिठोली और
नेह की बाकी किश्तें हैं
बिसर गया है बाबा को भी
कुछ दिन से सत्संग

नशा चढ़ा है
ऐसा, किसको रस्ता सूझेगा
किस पर किसका
रंग चढ़ा है फागुन बूझेगा
कई नेह के अंकुर फूटे
लेकर नई उमंग

– रविशंकर "रवि"
राजापुर खरहर, रानीगंज
प्रतापगढ़, उ. प्र.

14 मार्च 2013

४. याद के पाहुन

मन को
फिर महका रहे हैं
याद के पाहुन

कल यहीं एक नीड़ पर था
पंछियो का चहचहाना
बौर वाला
आम पाता
मुस्कुराने का बहाना

आज
ब्रज भी भूल बैठा
बंसरी की धुन

ढोल ताशे चुप हुए अब
फाग राहें नापते हैं
रंग नकली
खूब बिकते
और टेसू ताकते हैं

हाथ
बाँधे तक रहा है
अनमना फागुन...

-सुवर्णा दीक्षित (छिंदवाड़ा)

13 मार्च 2013

३. खोज लिए फागुन

तितर-बितर रंगों में
खोज लिए फागुन

ज़िद्दी हैं थोड़े
दीवाने हैं हम
हँस-गा लेते आँखें
हों चाहे नम
चुन लेते रस्ते-की
ठोकर से रुनझुन

किसी धूप किस्से
किसी छाँव सपने
हँसते हैं पनघट
जहाँ ठांव अपने
रातों में खिलखिलाएँ
सुबह के शगुन

बतिया ले कोई तो
सरस जाए तन
और गले से लग जाए
बस जाए मन
धडकनों में गूँज उठती
मधुवंती धुन

-अश्विनी कुमार विष्णु
अकोला (महाराष्ट्र)

12 मार्च 2013

२. कैसा फागुन कैसी होली

लाठी-पुलिस
रबर की गोली
कैसा फागुन कैसी होली

दिन-
दोपहरी में सन्नाटा
शासन की गति सत्यानाशी
बूटों की टापें बस गूँजें
सड़कों के रंग
हुए पलाशी

उड़े गुलाल कहाँ निर्दय ने
आँसू गैस शहर
में घोली

हवालात
में मैदानों के
सहमी सी बैठी आजादी
कहना-सुनना साफ मना है
ध्वनि विस्तारक
करें मुनादी

ढोल-मंजीरा बंद कबीरा
बस अब इंकलाब
की बोली

- ओमप्रकाश तिवारी

11 मार्च 2013

१. रंग लिये फागुन

आया फिर
आँगन में रंग लिए फागुन

टेसू हर डाल पर फगुआ सुनाये
पात-पात सुन-सुन के
झूम-झूम जाए

पंछी गुनगुनाने लगे
प्यार भरी धुन

राह तके बालम की रंग लिए गोरी
छोडूँ ना साजन को
खेलूँगी होरी

बजने बेचैन दिखी
पायल छुन-छुन

शिकवे सब, भूल चली मस्तों की टोली
हर दिल को रिझा रही
रंग भरी बोली

प्रीति में खो जाएँ,
आओ हम - तुम

- रोहित रूसिया ( छिन्दवाड़ा )

4 मार्च 2013

कार्यशाला-२६ रंग की फुहारों में


फागुन का सौंदर्य हर ओर बिखरा हुआ है और होली आने को है। ऐसे मौसम में नवगीतों का विषय रंग से अलग भला क्या हो सकता है। जीवन के विविध रंगों के समेटे, फूलों के विविध रंगों के इस मौसम में, कैमिकल रंगों की फुहारों में डूबते हुए रंगबिरंगे नवगीतों का स्वागत है। रचना भेजने की अंतिम तिथि 15 मार्च है लेकिन रचनाएँ मिलते ही उन्हें पाठशाला में प्रकाशित करने का क्रम प्रारंभ हो जाएगा। चुनी हुई रचनाओं को अनुभूति के होली विशेषांक में स्थान मिलेगा। तो फिर देर किस बात की... पता है navgeetkipathshala@gmail.com