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6 जुलाई 2014

२५. याद मुझे फिर कनहल आया

तपती देख धरा की काया।
याद मुझे फिर कनहल आया।

प्यारा था वो गाँव सलोना।
भाता था फूलों का होना।
घर के सम्मुख गुलबगिया में,
था कनेर का भी इक कोना।
जिसके बहुरंगी फूलों ने,
सदा प्रकृति से प्रेम सिखाया।

भरे ग्रीष्म में छैल छबीले।
श्वेत, लाल, केसरिया, पीले।
बंजारे, बस जाते थे ये,
पुनः पेड़ पर बना कबीले।
इन अपनों से खेल खेल में,
झोली भर अपनापन पाया।

नानी थी जब कथा सुनाती।
विधि विधान के सूत्र सिखाती।
गंध हवा में इन फूलों की,
घुलकर मृदु लोरी बन जाती।
ख्वाबों में तब जुगनू बनकर,
इन मित्रों ने था बहलाया।

लगे आज कुदरत पर ताले।
पृष्ठ हुए कर्मों के काले।
वृहद वृक्ष लाकर गमलों में,
ठूँस रहे हैं शहरों वाले।
चुपके से ये कीट कर रहे,
घनी छाँव का क्रूर सफाया।

-कल्पना रामानी
मुंबई

२४. फूल कनेर के

किसने रोके पाँव अचानक
धीरे-धीरे टेर के।
उजले-पीले भर आए
आँगन में फूल
कनेर के।

दिन भर गुमसुम सोई माधवी
तनिक नहीं आभास रहा
घिरा अँधेरा खूब नहाई
सुगन्ध- सरोवर पास रहा।

पलक बिछाए बिछे धरा पर
प्यारे फूल
कनेर के।

मन बौराया चैन न पाए
व्याकुल झुकती डाल-सा
पीपल के पत्ते सा थिरके
हिलता किसी रूमाल-सा।

चोर पुजारी तोड़ ले गया
प्रातः फूल
कनेर के

- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
नई दिल्ली

5 जुलाई 2014

२३. घंटियाँ कनेर पर

बैठ गयी बौराई
पुरवाई पेड़ पर।
हिलने लगीं स्वर्णमयी
घंटियाँ कनेर पर।

ललछौहें बादल की
ओट लिए ताक में
आखेटक बैठा है
उसकी फिराक में।
ग्रीषम के लूएँ उसे
लाईं हैं घेर कर।

हरे हरे पत्तों के
शीतल स्पर्श ने
शरणागत आगत के
आश्रय सहर्ष ने
आँख बिछा उससे कहा
सो जा न देर कर।

आदि या अनादि
पूर्व उसके भी काल से
सभ्यताएँ शेष
मात्र इनकी ही ढाल से
ये न होंगे साथ
होंगे सभी भस्म ढेर पर।

-रामशंकर वर्मा
लखनऊ

२२. हम कनेर हो पाते

सुख में, ग़म में
हर मौसम में
सिर्फ फूल महकाते
काश कहीं ऐसा हो पाता
हम कनेर हो पाते

लू के गर्म थपेड़े
लेकर भले
मृगशिरा दहके
पथरीली जमीन से भी
रस लेता है सब सहके
तना खड़ा है जग को अपनी
जिजीविषा दिखलाते

आम नाम है जिसका
उसको तो
ऐश्वर्य मिला है
आम आदमी का प्रतीक तो
बनकर यही खिला है
हम भी अपने ग़म पी
जख़्म जमाने का सहलाते

–रविशंकर मिश्र रवि
प्रतापगढ़

२१. कनेर

ढूह झहरता,
रह-रह चींटी चपल उग्र है
ताप पड़ा है.. !
सुलग उठे हैं धूल-बगूले
किन्तु अड़ा है सौम्य कनेर.. !

दमन चक्र की त्वरा निरंकुश
क्रूर तपन के तेवर भारी
निःस्वर नभ की निर्जल बदली
खीझ चिढ़ी-सी
तन-मन तारी

प्रहर विवश दुर्दम्य दिशायें
स्वयं अड़ा है सौम्य कनेर !

भरी-भरी आँखों में रोमिल
कुछ सूखी कुछ गीली बातें
पिछवाड़े की खिड़कीवाली
नयन-कोर-सी
भीगी रातें

ढाँढस देता-सा ऐसे में
नम्र खड़ा है सौम्य कनेर !

श्वेत-पीत है,
केसरिया है,
अर्थ रंग के रहे न शाश्वत
करता है निर्वाह किन्तु ये
साध रहा है
रोज़ा-अक्षत !

प्रजातंत्र निर्पेक्ष सबल हो..
मान्य ’धड़ा’ है सौम्य कनेर.. !

-- सौरभ पाण्डेय
इलाहाबाद

4 जुलाई 2014

२०. रंगों का उपहार कनेर

रंगहीन होते मौसम में
रंगों का उपहार कनेर

स्तब्ध खड़े हैं पेड़
हवा छुप कर है बैठी
धूप मवाली सी
फिरती है ऐंठी ऐंठी

सहमे डरे डरे आँगन में
राहत देता, प्यार कनेर

धरती ने यूँ
मनभावन शृंगार किया है
बना धूप का बूटा
तन पर सजा लिया है

प्रीत की खिड़की पर बैठा इक
मुस्काता संसार कनेर

नागफनी से चुभते
पल स्वीकार किये हैं
मुश्किल को आसानी
के आधार दिए हैं

मौसम की जलती आँखों को
सहलाता नीहार कनेर

-सीमा अग्रवाल
कोरबा

१९. धूप की कलसी

हरित डाल में पीला झूमर
ना सूरज ना पछुआ का डर
धूप रंग कलसी में भरता
सोने जैसा
फूल कनेर।

ऋतु वासंती छोड़ गई थी
कोई रिश्ता जोड़ गई थी
धरती की गोदी में पलता
नन्हा मुन्ना
फूल कनेर।

सूर्य किरन आ गले लगाती
डाली डाली रंग बिखराती
मालिन की डलिया में जलता
दीप माल सा
फूल कनेर।

चाह कभी ना घनी छाँव की
चिन्ता ना थी गर्म घाम की
सैनिक के तग़मों सा सजता
भरी दोपहरी
फूल कनेर।

- शशि पाधा
यू.एस.ए.

१८. नन्हा कनहल

खिला बाग़ में, नन्हा कनहल
प्यारा लगने लगा महीना
रोज बदलते है मौसम, फिर
धूप-छाँव का परदा झीना।

आपाधापी में डूबे थे
रीते कितने, दिवस सुहाने
नीरसता की झंझा, जैसे
मुदिता के हों बंद मुहाने

फँसे मोह-माया में ऐसे
भूल गए थे, खुद ही जीना

खिले कनेर की इस रंगत में
नई किरण आशा की फूटी
शैशव की तुतलाती बतियाँ
पीड़ा की है जीवन बूटी

विषम पलों में प्रीत बढ़ाता
पीतवर्ण, मखमली नगीना

- शशि पुरवार
वर्धा

3 जुलाई 2014

१७. ये कनेर के फूल

इनसे मिलकर अब भी
बीते पल हम जीते हैं
ये कनेर के फूल
तुम्हारी बातें करते हैं

कड़ी धूप में आँखें खोले
बैठा होता है,
ढलती शाम की हर आहट
पहचाना करता है
एक उदासी दिल पर जब भी
घिरने लगती है,
कली कोई वो नई खिला कर
हमें मनाता है
जीवन से हम दोनों ही ये सीखा करते हैं
आँखों में सावन के मोती सब ही रखते हैं

तुम आओ तो जीवन होगा
सुन्दर सा एक गीत
खिले हुए फूलों से झरता
नूतन सा संगीत
दो मन मिलकर इसी छाँव में
सुनने आएँगे,
इसके दो पत्तों से मिलकर
ताल बजाएँगे
ऐसी बातें हम कनेर से करते रहते हैं
पूरे होने वाले सपने बुनते रहते हैं

- सुवर्णा दीक्षित
छिंदवाड़ा

१६. खिलता हुआ कनेर

बहुधा मुझ से बातें करता
खिलता हुआ कनेर,
अभ्यागत बनने वाले हैं
शुभ दिन देर सवेर।

आग उगलते दिवस जेठ के
सदा नहीं रहने
झंझाओं के गर्म थपेड़े
सदा नहीं सहने।

आ जायेंगे दिन असाढ़ के
मन के पपीहा टेर।

आशा की पुरवाई होगी
सब के आँगन में।
सुख की नव-कोंपल फूटेगी
सब के ही मन में।

भावों के मोती बरसेंगे
लग जायेंगे ढेर।

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
आबू

१५. डाल डाल पर

डाल-डाल पर कनहल की,
बूँद-बूँद बदली झलकी।

फूल-फूल पर भौंरे गाते,
झुंड बनाकर बच्चे आते,
मौसम भी लगता अति प्यारा,
कनहल से जब साजे द्वारा॥

याद बसी है बचपन की,
डाल-डाल पर कनहल की।

पीले-पीले रंगीले-से,
घनी पत्तियों में ढीले-से,
पंखुडियों में स्वर्ण समाया,
हरियाली से जग सरसाया

खुशी मिल गई ज्यों मन की,
डाल-डाल पर कनहल की।

देख-देख कनहल के पादप,
पास नहीं आता है आतप,
हरित पर्ण हैं, पीत सुमन हैं,
बगिया के ये मनभावन हैं।

खिले खुशी में सावन की,
डाल-डाल पर कनहल की ।

- पवन प्रताप सिंह 'पवन'
नरवर म.प्र.

2 जुलाई 2014

१४. अब हैं सुर्ख कनेर

पहले पीला फिर नारंगी
अब है सुर्ख कनेर

पत्ती नदी लाँघने निकली हाथ नहीं पतवार
लहरों के आँचल में उलझी नाप सकी न धार
उतर गई गहरे पानी में
बुरे दिनों का फेर

बीत गई मोती की आभा माटी हुआ स्वरूप
जाने कौन घड़ी में जन्मा छाया मिली न धूप
आँखों से गिर गया निमिष में
हुआ टूटकर ढेर

मुँह बिजलाती नीम निगोड़ी हुई सूखकर बाँस
ऐसा मंतर मारा जाकर लौट सकी न साँस
किससे घर का रोना रोये
गली-गली अंधेर

भीख माँगती चौराहों पर घुनी हुई तकदीर
जब से पानी मरा आँख का तबसे हुई फकीर
क्या जाने कब छप्पर फाड़े
पूछे हाल कुबेर

बरगदिया की पीढ़ी चुक गई माँग माँग कर न्याय
आँखे फाड़े बूढ़ी हड्डी कब तक बीन बजाय
छाती पर का पीपर हो गए
उसके राम सुमेर

-निर्मल शुक्ल
लखनऊ

१३. पीले फूल कनेर के

पीले फूल कनेर के
पट अँगोरते सिन्दूरी बड़री अँखियन के
फूले फूल दुपेर के।

दौड़ी हिरना
बन-बन अँगना
वोंत वनों की चोर भुर लिया
समय संकेत सुनाए,
नाम बजाए,
साँझ सकारे,
कोयल तोतों के संग हारे
ये रतनारे-
खोजे कूप, बावली झाऊँ
बाट, बटोही, जमुन कछारे
कहाँ रास के मधु पलास हैं?
बट-शाखों पर सगुन डालते मेरे मिथुन
बटेर के
पीले फूल कनेर के।

पाट पट गए,
कगराए तट,
सरसों घेरे खड़ी हिलती-
पीत चँवरिया सूनी पगवट
सखि! फागुन की आया मन पे हलद चढ़ गई
मेंहदी महुए की पछुआ में
नींद सरीखी लान उड़ गई
कागा बोले मोर अटरिया
इस पाहुन बेला में तूने
चौमासा क्यों किया पिया?
यह टेसू-सी नील गगन में-
हलद‍ चाँदनी उग आई री
उग आई री
अभी न लौटे उस दिन गए
सबेर के!
पीले फूल कनेर के।

- नरेश मेहता

१२. देंगे साथ कनेर

ऋतु, प्रतिकूल न सह पायेंगे
यह गमलों के शेर
खिल, गुलाब जब मुरझायेंगे
देंगे साथ कनेर।

उपवन पर आते हैं झोंके
लू–लपटों के भी
सदा कहाँ रहते हैं
सुखकर दिन बसंत के जी

मास जेठ के जब आयेंगे
देंगे साथ कनेर।

दुख पीकर, मुख पर गहना
मुस्कानों का, पहना
वही सुखी है
जिसने सीखा, लहर–बहर सहना

शीथ–घाम जब डरपायेंगे
देंगे साथ कनेर।

मास बारहों
उन हृदयों की कली, खिली होगी
रहे कर्मरत जो
होकर निष्काम–कर्म–योगी

द्वार ईश के जब जायेंगे
देंगे साथ कनेर।

– कृष्ण नन्दन मौर्य
प्रतापगढ़

1 जुलाई 2014

११. घना कनेर

अपने घर का घना कनेर
छानी छप्पर
और मुँडेर

सबको यह सम्मोहन लगता
अपने घर की है यह सज्जा
ताज समझते हम सब इसको
सुंदर लगता अपना छज्जा

सबसे ऊपर चमक रहे हैं
फूलों से जो
भरे उँजेर

गली मुहल्ले औ सड़कों पर
कलियाँ पत्ते बीज टपकते
क्या अनुमोदन समझोगे तुम
फूल रंगीले हैं क्या कहते

सबको स्वर्णिम भोर दिखाकर
उड़ जाते हैं
खुशी बिखेर

-करन बहादुर

30 जून 2014

१०. फिर कनेर मुसकाया है

पीला-श्वेत-गुलाबी जिसका,
रूप सभी को भाया है।
लू के गर्म थपेड़े खाकर,
फिर कनेर मुस्काया है।

आया चलकर खुला खजाना,
फिर से आज कुबेर का।
निर्धन के आँगन में पनपा,
बूटा एक कनेर का।
कोमल और सजीले फूलों ने,
मन को भरमाया है।

लू के गर्म थपेड़े खाकर,
फिर कनेर मुस्काया है।।

कितनी शीतलता देती है,
आँखों को ये हरियाली।
जब पत्तों से छनकर आती,
पवन बसन्ती मतवाली।
सुबह सवेरे गौरय्या ने,
मीठा राग सुनाया है।

लू के गर्म थपेड़े खाकर,
फिर कनेर मुस्काया है।

पेड़ लगाओ-धरा बचाओ,
धरती का शृंगार करो।
आँगनबाड़ी के सुमनों से,
सच्चा-सच्चा प्यार करो।
ग्रीष्मकाल में बिरुवा ही तो
देता शीतल छाया है

लू के गर्म थपेड़े खाकर,
फिर कनेर मुस्काया है।

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक'
खटीमा

29 जून 2014

९. कनेर की बात

तुम कनेर की बात न छेड़ो
बचपन याद
दिला जाता है!!

हरी भरी पतली डाली पर
एक नज़र रक्खूँ माली पर
किसी तरह से मिल जाए वो
रख दूँ पूजा की थाली पर
बाबा कहते हैं ठाकुर को
पीला फूल
बहुत भाता है!

तेज दुपहरी लू झुलसाये
पर बचपन कैसे रुक जाये
वो मखमल की छुअनों वाला
प्यारा फूल बहुत ललचाये
आखें बंद करूँ तो अब भी
पूरा दृश्य
उभर आता है!

- डॉ. प्रदीप शुक्ल
लखनऊ

28 जून 2014

८. ये कनेर के फूल

खिल कर झूल रहे डाली पर
ओढे़ हरित दुकूल।
मत उदास हो, हँस कर कहते
ये कनेर के फूल।

लगे हवा के गर्म थपेडे़
सूरज अंगारे बरसाये
कहाँ जाओगे हमसे बचकर
तीखे तीखे व्यंग्य सुनाये,
बीत जायेंगे तपन भरे दिन
मत दो इनको तूल।
हर मौसम में समरस रहते
ये कनेर के फूल

डोल रहा आकुल मन
पर्वत-पर्वत, घाटी-घाटी
नींद चैन की आयी न,
जब से छूटी घर की माटी
कितनी पीड़ा दे जाती है
एक छोटी सी भूल।
क्यों निराश हो झुककर
कहते ये कनेर के फूल

कभी नदी का आँचल थामे
कभी छाँह बादल से माँगे
सुधि में बसा सावनी सपने
जोड़ रहा मन टूटे धागे
साथ चलें जीवन धारा के
सुख दुख दोनों कूल।
पाँवों में बिछकर भी रहते
ये कनेर के फूल।

-डॉ. मधु प्रधान
कानपुर

27 जून 2014

७. सुनता रहा कनेर

पीपल की हर बात
ध्यान से
सुनता रहा कनेर

खपरैलों की दुनिया में
सूरज भी
देरी से जाता है
धूप
आलसी हो जाती है
उजियारा
रोता रहता है
राह, खेत, घर, घाट
कहाँ, कब
हो जाये अंधेर

कोई गंध
हवा में फैली
बरगद की दाढ़ी
सहमी है
कुरते
बतियाने आये हैं
तेवर में
अजीब नरमी है
दूर खड़ा
टीले का टेसू
रहा किसी को टेर

ये बदलेगा
वो बदलेगा
यूँ तो
सब कहते रहते हैं
खपरैलों के दंश
हमेशा
सहने वाले ही सहते हैं
सदियाँ बीत गईं
पर, बीते नहीं
दिनों के फेर

-डा० जगदीश व्योम
नई दिल्ली

26 जून 2014

६. तुम कनेर के फूल

तुम कनेर के फूल
ओ! कितने दर्द छुपाए बैठे हो

बरसों से बैठे निराश,
निज ह्रदय लिए, इक करुण प्यास,
हर मौसम में खिलते उदास
पंखुरियों में भर मधुर हास
क्या शीतलता पाने को हिय में,
आस लगाये बैठे हो

हम तो खुद, अपनों में अर्पण,
पर तुम करते, जग हित तर्पण
तुमने कितना, संताप सहा,
इस जग का, कितना पाप सहा,
फिर भी जन-जन के जीवन का,
उपहार सजाए बैठे हो

तुम बने भोग, बस भ्रंगों का,
राजा के कोमल, अंगों का,
हर दुख में, मेरे साथ रहे
हर सुख में, मेरे साथ हँसे,
तुम देकर मुझको सघन छाँव
निज, ताप छुपाए बैठे हो

-देवेन्द्र प्रसाद पाण्डेय
रींवाँ