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15 मार्च 2011

१६. होली है होली

रंग की फुहार में,
फ़ागुनी बयार में
बच्चे जवान बूढ़े कर रहे ठिठोली
मानिए न आज बुरा, होली है होली

छटा में गुलाल-रंग
भिगो रहे अंग-अंग
गीत गा लुभाय रही मस्तों की टोली
मानिए न आज बुरा, होली है होली

आज न कोई दूर है
प्यार भरपूर है
रिश्तों में है मिठास गुझिया ने घोली
मानिए न आज बुरा, होली है होली


भूल राग और द्वेष
भूल देश और भेष
सबका मन मोह रही कोयल की बोली
मानिए न आज बुरा, होली है होली

- हितेश शर्मा 'पथिक'

14 मार्च 2011

१५. दिन वसंत के

दिन वसंत के
और तुम्हारी हँसी फागुनी
दोनों ने है मंतर मारा

चारों और हवाएँ झूमी
हम बौराये
तोता दिखा हवा में उड़ता
हरियल पंखों को फैलाये

वंशी गूँजी
लगता ऋतु को टेर रहा है
सडक-पार बैठा बंजारा

पीतबरन तितली
गुलाब पर रह-रह डोली
देख उसे
चंपा की डाली पर आ बैठी
पिडुकी बोली

'कहो सखी
क्या भर लेगी तू अभी-अभी
खुशबू से अपना भंडारा

धूप वसंती साँसों की है
कथा कह रही
आओ, हम-तुम मिलकर बाँचें
गाथा जो है रही अनकही

कनखी-कनखी
तुमने ही तो फिर सिरजा है
सजनी, इच्छावृक्ष कुँआरा

-कुमार रवीन्द्र

13 मार्च 2011

१४. फागुन की अगुआई में

सरसों सी मुस्कानोंवाली,
तीसी की तरुणाई में।
फिर सुंदर इक गीत सुनाएं
फागुन की अगुआई में।

सुनके नाचे सोन चिड़ैया
नाचे, तोता, मैना, मोर,
मन में नाचे प्रेम कन्हैया
चाहे शाम सुहानी भोर,
बांह पकड़ के बोले बैरी
चल चुपके अमराई में!

झरबेरी झुमके सा झूले
गुलमोहर से गाल हुए,
महुए सा मुस्काए जोबन
जी के हैं जंजाल हुए,
सिमटा जाए लाज का पहरा
इस पागल़ पुरवाई में!

सोते जगते संग सजन के
पायलिया झनकार करे,
खनके चूड़ी,कंगन सुनके
कोयलिया किलकार करे,
आते जाते लोग निहारे
घर, बाहर, अगनाई में!

गदगद हो गए बरगद पीपल
पर्वत पिघला जाए सखी,
पंडित ज्ञानी पीछे पड़ गए
जोगी जोग मिलाए सखी,
टूट रहे सब जप,तप संयम
एक मेरी अंगराई में!

--शंभु शरण मडल,धनबाद

12 मार्च 2011

१३. अंतर्मन रंग आया

रंग अंतर में बरस रहा है
अंतर्मन रंग आया

श्वेत चुनरिया देखो कैसी
सतरंगी हो आयी,
गोरे गोरे गाल गाल पर
प्रेम की लाली छायी,

ये कैसा रंगरेज है जिसने
प्रेम का रंग लगाया

ढोल- धपाले गाजे - बाजे
सब ही तो बजते हैं
तुम बिन मीते!कब जाकर
ये अंतर्मन सजते हैं

हर पल बरसे नयनों में ये
कैसा रंग भराया

कितने रंग में महकी माटी
कितने सुमन खिलाये,
प्रेम रंग एक ऐसा जिसमें
हर एक रंग मिलाये

देख रंगों का रूप अनोखा
मन मेरा भर आया


--गीता पंडित

11 मार्च 2011

१२. होली में

लाल-गुलाबी बजीं तालियाँ
बरसाने की होली में

बजे नगाड़े ढम-ढम-ढम-ढम
चूड़ी खन-खन, पायल छम-छम
सिर-टोपी पर भँजीं लाठियाँ
ठुमके ग्वाले तक-धिन-तक-धिन

बृजवासिन की सुनें गालियाँ
बृज की मीठी बोली में

मिलें-मिलायें गोरे-काले
मौज उड़ायें देखन वाले
तस्वीरों में जड़ते जायें
मन लहरायें-फगुनायें दिन

प्रेम बहा सब तोड़ जालियाँ
दिलवालों की टोली में

चटक हुआ रंग फुलवारी का
फसलों की हरियल साड़ी का
पक जाने पर भइया, दाने
घर आयेंगे खेतों से बिन

गदरायीं हैं अभी बालियाँ
बैठीं अपनी डोली में

- अवनीश सिंह चौहान

10 मार्च 2011

११. आज की मधुरात्रि में

आज की मधुरात्रि में
इस चाँद को दे दो इजाज़त
और अंचल ओट से खुद तुम लुटाओ चाँदनी

धूलकण चुप चल रहे
सारे गगन भर
बन रहे बहुरंग अंगारे गगन भर
जो दिवस ने पवन बाँहों से बटोरे
साँझ ने भर अंजली
ढारे गगन भर

अग्निवन छू कर हवाएँ आ रही हैं
हर तरफ दहके हुए स्वर
गा रही हैं
इन हवाओं के उठाए राग को
दे दो इजाज़त
और नूपुर नाद से खुद तुम जगाओ रागिनी


हर तरफ झींसी रंगों की
झर रही हैं
इस धरा के वक्ष में
मधु भर रही हैं
इक उनींदी मूर्च्छना छाई हुई है
ये दिशाएँ एक जादू कर रही हैं

धार-लहरों में नशा सा छा रहा है
जल ह्रदय से
हर शिला सहला रहा है
धार-लहरों में रचे उन्माद को दे दो इजाज़त
और आकुल-अंक में
खुद तुम बनो उन्मादिनी


आज की मधुरात्रि में
इस चाँद को दे दो इजाज़त
और अंचल ओट से खुद तुम लुटाओ चाँदनी

--सुनील कुमार श्रीवास्तव

9 मार्च 2011

१०. आई होली

आई होली
धूम मचाओ सा रा रा रा...

होरी की
झुग्गी में चूल्हा
रहे न सूना
अलगू-जुम्मन
दूर न हों तो
हो सुख दूना
जनप्रतिनिधि भी
सहे वेदना
नेता को
इंसान बनाओ सा रा रा रा...

बनें न हम
बाजार महज़
ना माल बिकाऊ
भौजी की
फागों से हों
रसभरे टिकाऊ
पर्व व्यवस्था
स्वस्थ, सेंतना
रंग-अबीर संग
भेद भुलाओ सा रा रा रा...

-आचार्य संजीव 'सलिल'

8 मार्च 2011

९. मुझसे वसंत के गीत नहीं गाए जाते

मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ मन।
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ वन।।

कुछ देर डालियों पर ठहरो
पाती पर नाम लिखूँगा
अजनबी हवाओ, सखा साथियों
के तन मन पैठूँगा
धूँ धूँ जल रहे पहाड़ और
भाए भरमाये मन।

मुझसे इस अंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ वन।
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ मन।।

-कमलेश कुमार दीवान

7 मार्च 2011

८. साजन बिना बहार

साजन बिना बहार सखी री
सिसके पनघट,
द्वार सखी री

कुसमित डाली
मन मुरझाये
स्नेह पखेरू उड़ उड़ जाये
फागुन रंगे,
बसंत नहाये
मन कोरा कोरा रह जाये
कहाँ लिखूँ अरमान सखी री

क्या सरहद
पर मेघा छाये ?
सुरभित हवा, उन्हें भरमाये ?
मन की डाली
खिल-खिल जाये
प्रेम पाश बँध साजन आएँ
ऐसी बहे बयार सखी री

कैसी होली
फागुन कैसा
बिना आग के चूल्हे जैसा
निकल रही
रंगों की टोली
उन बिन मेरी हो ली होली
चुभे अबीर गुलाल सखी री
साजन बिना बहार सखी री

--रचना श्रीवास्तव

6 मार्च 2011

७. अनुबंध लिखूँ

मन करता है फिर कोई अनुबंध लिखूँ
गीत गीत हो जाऊँ ऐसा छंद लिखूँ

करतल पर तितलियाँ खींच दें
सोन सुवर्णी रेखाएँ
मैं गुंजन गुंजन हो जाऊँ
मधुकर कुछ ऐसा गाएँ
हठ पड़ गया वसंत कि मैं मकरंद लिखूँ
श्वास जन्म भर महके ऐसी गंध लिखूँ

सरसों की रागारूण चितवन
दृष्टि कर गई सिंदूरी
योगी को संयोगी कह कर
हँस दे वेला अंगूरी
देह मुक्ति चाहे फिर फिर रसबंध लिखूँ
बंधन ही लिखना है तो भुजबंध लिखूँ

सुख से पंगु अतीत विसर्जित
कर दूँ यमुना के जल में
अहम समर्पित हो जाने दूँ
कल्पित संकल्पित पल में
आगत से ऐसा भावी संबंध लिखूँ
हस्ताक्षर में निर्विकल्प आनंद लिखूँ

--रामस्वरूप 'सिंदूर'

5 मार्च 2011

६. जाने किसके नाम

जाने किसके नाम
हवा बिछाती पीले पत्ते
रोज सुबह से शाम।


टेसू के फूलों में कोई मौसम फूट रहा
टीले पर रुमाल नाव में रीबन छूट रहा
बंद गली के सिर आया है
एक और इल्जाम।


क्या कहने हैं पढ़ने लायक सरसों के तेवर
भाभी खातिर कच्ची अमियाँ बीछ रहे देवर
नये -नये अध्याय खोलते
नए नए आयाम।


टूट रही है देह सुबह से उलझ रही आँखे
फिर बैठी मुंडेर पर मैना फुला रही पाँखे
मेरे आंगन महुआ फूला
मेरी नींद हराम।

--कैलाश गौतम

3 मार्च 2011

५. होली के रंग

होली का हर रंग अनोखा।

रंगी हथेली लेकर दौड़े
दूर हुए सब मन के घोड़े,
चली गई मुस्कानें देकर
बोझिल मन पर चले हथौड़े,
साथ रह गया लेखा-जोखा।

भूल गए वो ढाई आखर
पथ में साथ किसी का पाकर,
अनजानी रह गई विरासत
प्रीत हुई बेदम अकुलाकर,
किसके साथ हुआ क्या धोखा।

मौसम ने कर ली मनमानी,
दिशा-दिशा में चादर तानी,
उड़े रंग के बादल नभ में,
भूतल भरा समंदर पानी,
मत करना तुम बंद झरोखा।

-महेश सोनी
भोपाल मध्यप्रदेश

2 मार्च 2011

४. गाल गुलाबी हुए धूप के

इस मौसम में
आज दिखा है
पहला-पहला बौर आम का।

गाल गुलाबी
हुए धूप के
इन्द्रधनुष सा रंग शाम का।

साँस-साँस में
महक इतर सी
रंग-बिरंगे फूल खिल रहे,
हल्दी अक्षत के
दिन लौटे
पंडित से यजमान मिल रहे,
हर सीता के
मन दर्पण में
चित्र उभरने लगा राम का।

खुले-खुले
पंखों में पंछी
लौट रहे हैं आसमान से
जगे सुबह
रस्ते चौरस्ते
मंदिर की घंटी अजान से।
बर्फ पिघलने
लगी धूप से
लौट रहा फिर दिन हमाम का।

खुली-बन्द
ऑंखों में आते
सतरंगी सपने अबीर के।
द्वार-द्वार गा रहा
जोगिया मौसम
पद फगुआ कबीर के
रूक-रूक कर चल रहा बटोही
इंतजार है किस मुकाम का

--जयकृष्ण राय तुषार

1 मार्च 2011

३. होली ने भी रंग बदला है

प्रतिपल बदल रही दुनिया में
होली ने भी रंग बदला है

पेड़, प्लास्टिक, टायर, छप्पर
जलें, बुराई ना जलती है
मन रँगती थी जो पिचकारी
अब वह तन दूषित करती है
जहर प्रदूषण का तन मन पर
कैंसर के समान फैला है

मिट्टी की प्यारी रंगत अब
काम-कीच से दबी हुई है
घर की मुर्गी जाँ देकर भी
शुष्क दाल सी बनी हुई है
धोते धोते काम कीच रंग
गंगाजल भी अब गँदला है

महल-झोपड़ी, भगवा-हरा,
जवानी-जरा मिला दें अबकी
भस्म बुराई कर अच्छाई से
हम हाथ मिला लें अबकी
सबमें हैं प्रह्लाद होलिका
अबकी देखें कौन जला है

--धर्मेन्द्र कुमार सिंह

28 फ़रवरी 2011

२. फागुन आया

ठंडी चले बयार
गंध में डूबे आँगन द्वार
फागुन आया।

जैसे कोई थाप
चंग पर देकर फगुआ गाए
कोई भीड़ भरे मेले में मिले और खो जाए
वेसे मन के द्वारे आकर
रूप करे मनुहार
जाने कितनी बार
फागुन आया।

जैसे कोई
किसी बहाने अपने को दुहराए
तन गदराए, मन अकुलाए, कहा न कुछ भी जाए
वैसे सूने में हर क्षण ही
मौन करे शृंगार
रंगों के अंबार
फागुन आया।

-डॉ० तारादत्त 'निर्विरोध'

27 फ़रवरी 2011

१. होली का हुड़दंग

खेल रहे सब ही जन मिल के
खोजत नव-नित रंग
ओ भैया होली का हुड़दंग

गरिमा के 'गुलाल' को भूले
गाली गूँजें सदनों में
अदब 'अबीर' लुप्त दिखता,नहिं
भेद बड़ों में अदनों में
केमीकल का असर हुआ ये
कान्ति दिखे ना वदनों में
तन देखो या मन देखो
सब के सब हैं बदरंग
ओ भैया होली का हुड़दंग

अब की होली कुछ ऐसे हम
खेलें तो फिर आए मजा
'गुण' गुलाल चेहरों पे मल के
नाचें 'ढ़ंग' के ढ़ोल बजा
'मनुहारों' की बंटे मिठाई
'सत्कारों' के साज सजा
गर ऐसा हो जाए तो
मन होवे मस्त मलंग
ओ भैया होली का हुड़दंग

--नवीनचंद्र चतुर्वेदी

21 फ़रवरी 2011

कार्यशाला- १४, होली


मित्रो,
हर ओर वसंत छाया है और जल्दी ही होली भी आने वाली है। अनुभूति का १४ मार्च का अंक भी वसंत और होली से सराबोर होगा। तो क्यों न वसंत और होली पर आधारित नवगीत लिखें। कोशिश यह होनी चाहिये कि गीत में परंपरा से हटकर सामयिक सरोकारों पर ध्यान रहे। गीत हमारे पास जल्दी से जल्दी भेज दें क्यों कि इस बार गीतों का प्रकाशन एक सप्ताह के अंदर प्रारंभ कर देंगे। १० मार्च तक बाद मिलने वाले नवगीतों को कार्यशाला में शामिल करना संभव नहीं होगा। पता है-
navgeetkipathshala@gmail.com