10 अगस्त 2009

नवगीत की भाषा- गुज़रना एक अनुभव से

पाठशाला के सदस्य और सहयोगी संजीव गौतम ने नवगीत की भाषा के विषय में एक बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं संवेदनशील टिप्पणी कहिए या संस्मरण, लिखा है। यहाँ उसे एक पोस्ट के रूप में प्रस्तुत कर रही हूँ ताकि सभी इसे ध्यान से पढ़ लें। कहीं किसी से यह छूट न जाय। यह इसलिए आवश्यक है हम सब साहित्य के विद्यार्थियों के सामने इस तरह की कठिनाइयाँ आती हैं। इन कठिनायों के पार जाकर ही नवसृजन का रास्ता खुलता है। -- पूर्णिमा वर्मन
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मैं सबको नवगीत के विषय मैं अपने अनुभव से गुज़ारना चाहता हूं यदि आप इज़ाज़त दें-बात यूं है कि मैंने एम.एम.हिंदी से किया और उसके बाद कविताओं का चस्का लग गया। शुरूआत एक-दो मुक्तछ्न्द के बाद गीतों से हुई। चूँकि कविताओं से सही परिचय एम.ए. में ही हुआ था तो वही काव्य भाषा मन में समायी हुई थी। जैसे-
बस एक रश्मि स्वर्णवर्णी
हो स्फरित सविता दृगों से।
पैठ धरती में गयी उर में किसी के,
नव दीप्ति कर दी प्रज्ज्वलित।
और
नेहसिक्त कर स्पर्शों को
अश्रु से भीगे चक्षुओं को..आदि-आदि

इस छायावादी भाषा के साथ गीत लेखन लगभग तीन वर्ष तक किया। नये अच्छे संकलन ज़्यादा पढे नहीं थे, आगरा में सोम जी के अलावा नवगीत नाम से ही ज़्यादा परिचय नहीं था। गोष्ठियों में भी नवगीत नाम से कोई गीत नहीं सुनाता था। एक दिन भाई कुमार ललित ने बताया कि तीन संकलन पढने का मन है-
1-यश मालवीय जी का 'कहो सदाशिव',
2-कैलाश गौतम जी का 'सर पर आग' तथा
3-अतुल कनक जी का शायद 'पूर्वा'.

कुछ दिन बाद दिल्ली में 'कहो सदाशिव' संकलन मिल गया। पूरे संकलन की फोटोस्टेट करायी और संकलन ललित भाई को बेच दिया। संकलन को पढा। पढा क्या पूरा संकलन मन में इतने गहरे उतर गया कि एम. ए. की भाषा न जाने कहाँ गायब हो गयी एक दूसरी ही भाषा सामने थी। आप भी उस संकलन के कुछ गीतों के नमूने देखें-

तुम किताब से धरे मेज़ पर
पिछले सालों से....

तुम अलबम से दबे पांव जब बाहर आते हो....

यदा कदा वह डाँट तुम्हारी
मीठी सी.
घोर शीत में जग जाती है याद अंगीठी सी।

और
गीत को स्वेटर सरीखा बुन रहा हूं।
समय की पदचाप जैसे सुन रहा हूं।

एक और देखें-
सुबह सुबह की आपाधापी भाप भरा संवाद।
नरभक्षी मौसम के मुंह फिर लगा ख़ून का स्वाद।

ये देखें-
मां तो झुलसी फसल हो गयी।
कैसी अपनी नसल हो गयी।

इसे देखिये-
कितनी मुंहजोर हवा ढीठ घुडसवार सी।
फिर भी है मौन सदी गीली दीवार सी।
हल हुई समस्या के कोरे समझौते।
भाई चारा पहने सैकडों मुखौटे।
प्यार नहीं हिन्दी या उर्दू या फारसी।
बडे मुंह अंधेरे ही घटना-दुर्घटना।
घर आंगन बंटे हुए अमृतसर-पटना।
ट्रेन लडी कटनी या जबलपुर इटारसी।

और ये मासूम चित्र देखिये संवेदनाओं से भरा-
हिलते रहे हरे पत्तों से नन्हे हाथ तुम्हारे।
दफ़्तर जाना ही था पापा क्या करते बेचारे।

कुछ समय बाद जब इलाहाबाद यश जी के घर पर उनसे मुलाकात हुई तो लगभग दो घंटे बाद जब नीचे उतर कर आये तो उन्होंने अपनी माताजी से मिलवाते हुए कहा अम्मा ये संजीव हैं इन्हें कहो सदा शिव के सारे गीत याद हैं! उसके बाद फिर तो ढूंढ कर नवगीत संकलन पढे-
दादा नईम-पंख झुलसाकर गिरा सम्पाती धरा पर आंख सूरज से मिलाने का नतीज़ा है. श्रद्धेय माहेश्वर तिवारी, विद्यानन्दन राजीव, भारत भूषण. कैलाश गौतम, उमाकांत मालवीय, वसु मालवीय, सुधांशु उपाध्याय, वीरेन्द्र मिश्र, मुकुट बिहारी सरोज,देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, सोम ठाकुर,नचिकेता, कुमार रवीन्द्र, महेन्द्र नेह, शम्भु नाथ सिंह आदि-आदि के नवगीतों को पढने और सुनने का अवसर मिला।

मेरा ये सब लिखने का आशय सिर्फ़ इतना कहना था कि जो बात बडे-बडे लेख, आलेख, निबन्ध, विद्वान नहीं समझा पाते वो सब उदाहरण समझा जाते हैं। अपने भीतर कुछ नया समाहित करने के लिये उससे सम्बन्धित पुराने से मोह का त्याग करना पडता है। अगर पहले से ही मान लें कि हमारी मुट्ठी तो भरी है तो नया फिर किसमें समेंटंगे। नयी धूप और ताज़ी हवा के लिये घर की खिडकियां और रौशनदान तो खोलने हीं होंगे। नहीं तो-
खिडकियां देर से खोली बडी भूल हुई,
मैं ये समझा था कि बाहर भी अंधेरा होगा।

मात्रा गिराने के नियम के विषय में पूछने का मक़सद इतना सा था कि मैं तो मात्राएँ गिरा लेता हूँ नियम की जानकारी नहीं है। मैंने नवगीत से सम्बन्धित आलेख लगभग शून्य ही पढे हैं क्योंकि मुझे लगता है कि नवगीत लिखने के लिये नवगीत पढना ज़रूरी है और समीक्षक बनने के लिये आलेख पढना।
--संजीव गौतम

2 टिप्‍पणियां:

  1. संजीव गौतम निश्चय ही एक संजीदा रचनाकार है। अपनी इस टिप्पणी के माध्यम से संजीव ने नवगीत की सहज भाषा की तरफ प्रकारांतर से संकेत किया है। नवगीत की भाषा जितनी सहज, जितनी सरल और भावों के अनुकूल होगी, नवगीत उतना ही लोकप्रिय बनता जाएगा। पं० भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा है-
    "जिस तरह मैं कह रहा हूँ
    उस तरह तू लिख ।
    और उसके बाद फिर
    मुझसे बड़ा तू दिख।"
    नवगीत के इतिहास में अपवाद को छोड़कर वही नवगीत लोकप्रिय हुए हैं जो सहज और बोलचाल की भाषा में रचे गए हैं। कैलाश गौतम तो कविता या नवगीत आम बोलचाल की भाषा में ही लिखते रहे।
    विश्वास है कि अगली कार्यशाला में नवगीतों का कुछ अलग रूप ही देखने को मिलेगा। संजीव गौतम को और पूर्णिमा जी को बहुत बहुत वधाई इतनी सारगर्भित भाषा में लेख प्रकाशित करने के लिए।

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