28 अगस्त 2009

सुख और दुःख

(पिछली कार्यशाला के लिंक लगाते समय देखा कि एक रचना प्रकाशित होने से रह गई है। नवगीत शायद यह नहीं भी है पर एक सुंदर गीत ज़रूर है। आज इसका आनंद लें और अपनी टिप्पणियाँ भेजें।)

सुख और दुःख का मेल है जीवन, हार-जीत का खेल है जीवन,
चले चलो तुम बनके मुसाफिर, चलती हुई एक रेल है जीवन,

सुख में सब ईश्वर को भूले, दुःख उनकी याद दिलाता,
सुख है केवल मृग मरीचिका, दुःख हकीकत है दिखलाता,
दुःख में जो रखता है धीरज, रहती उनसे दूर है उलझन,
कष्टों को जो हंसकर सहता, वो ही सफल बनाता जीवन,

सुख-दुःख का अपना एक क्रम है, सत्य किन्तु जीवन में, श्रम है,
सावन और पतझड़ का जैसे, प्रकृति में अपना अलग नियम है,
कष्टों में यदि बीता बचपन , सुख में बीते उसके यौवन,
समय की किरणों से ही तपकर, बने महान राम और लक्ष्मन,

हार नहीं मानी है जिसने, मुश्किल को है गले लगाया,
असफलता वरदान मानकर, जीवन में जो कष्ट उठाया,
क्यूरी हो या हो एडिसन, संघर्षो में बीता जीवन,
विपदाओं से निखरता जीवन, कभी पुष्प, कभी कांटा जीवन,

बादल कितने ही छा जांए, चमक सूर्य की नहीं है ढकती,
सर पर कफ़न बांध जो निकले, मृत्यु भी उनसे डरने लगती,
रंग बदलती रहती दुनिया, कभी खून, कभी पानी जीवन,
नित-नित नव रंग भरे चलो, होली कभी, दीवाली, जीवन,

विश्वासों के दीप जलाकर, जिसने रोशन किया है मन को,
चट्टानों सी छाती करली, फौलादी फिर किया है तन को,
राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह , राष्ट्र हेतु न्यौछावर जीवन
नई डगर पर कदम बढाकर, तुम भी सफल बनालो जीवन,

राघवेन्द्र सिंह 'राघव'

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर गीत है ये राघव जी को बहुत बहुत बधाई

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  2. बहुत सुन्दर गीत है ये राघव जी को बहुत बहुत बधाई

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  3. बहुत सुंदर... एक प्रेरणात्मक गीत है यह...
    बधाई स्वीकारें...
    मीत

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  4. मुझे एक बात कहनी थी की अभिव्यक्ति पर लिखा है की नवगीत की कवितायेँ १ अगस्त से प्रकाशित होंगी क्या यह सच है यानि की अगले साल प्रकाशित होंगी...
    या फिर यह त्रुटी है... आपका मतलब १ सितम्बर है...
    मीत

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