11 मई 2010

१३ : बौराए हैं बाज फिरंगी : रावेंद्रकुमार रवि

चिर निद्रा में गई रागिनी,
कैसे भोर जगाएगी?
बौराए हैं बाज फिरंगी,
कैसे चिड़िया गाएगी?

प्यूपा बनने से पहले ही,
कौए ने खाया इल्ली को!
फूलों से आ सुमुखी तितली,
कैसे कुछ बतियाएगी?
फूलों से पराग भी ग़ायब,
वह उनसे क्या पाएगी?
बौराए हैं ... ... .

घृणा-द्वेष भर अंगारों-सी ,
दहशत उगल रही जो “नाली”,
सोचो, ज़रा बाँसुरी उससे,
कैसे बनकर आएगी?
भाईचारे की स्वरलहरी,
कैसे मन को भाएगी?
बौराए हैं ... ... .
--
रावेंद्रकुमार रवि

16 टिप्‍पणियां:

  1. bada hi sundar aur gaagar me saagar bharne wala geet..bahut bahut badhai

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  2. रवि जी!
    आपका प्रयास सराहनीय है, लीक से हटकर अच्छी कोशिश.

    रवि किरणों संग भू सुहागिनी
    कैसे रास रचायेगी ?
    जब चंदा से छली चाँदनी
    रो-रोकर पछताएगी.

    तारों के उगने से पहले
    संध्या लील गयी सूरज को.
    रजनी 'मावस से लुक-छिपकर
    पूनम कैसे पायेगी?
    धरती से हरियाली गायब
    कैसे वह मुस्कायेगी?

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  3. विमल कुमार हेड़ा12 मई 2010 को 7:46 am

    बहुत सुन्दर रचना के लिये रविन्द्र कुमार रवि जी को बहुत बहुत बधाई, धन्यवाद
    विमल कुमार हेड़ा

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  4. इसी विषय पर अभी रविवार को मेनका जी का लेख आया है ।
    आपका नवगीत दायित्वबोध भी कराता है । प्रशंसनीय ।

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  5. बाज फिरंगी क्यों बौराए कुछ तो कारण होगा!
    घृणा-द्वेष के बादल छाए कुछ तो कारण होगा?

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  6. देश की चिंताजनक हालत पर टिप्पणी करती अत्यंत सुन्दर रचना है ...

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  7. yeer ras kee kavitaa hai
    very promising and heart rendering

    mrityunjay KUmar Rai

    F/0 Madhav rai


    http://madhavrai.blogspot.com/

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  8. घृणा-द्वेष भर अंगारों-सी ,
    दहशत उगल रही जो “नाली”,
    सोचो, ज़रा बाँसुरी उससे,
    कैसे बनकर आएगी?

    बहुत सटीक चिंतन.....सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  9. रविजी, बहुत बढ़िया है.
    आपका- प्रकृति पर छाया,आतंक का साया,
    यथार्थ सामायिक चित्रण दिखाया:
    "घृणा-द्वेष भर अंगारों-सी ,
    दहशत उगल रही जो “नाली”,
    सोचो, ज़रा बाँसुरी उससे,
    कैसे बनकर आएगी?
    भाईचारे की स्वरलहरी,
    कैसे मन को भाएगी?
    बौराए हैं ... ... ."

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  10. प्यूपा बनने से पहले ही,
    कौए ने खाया इल्ली को!
    फूलों से आ सुमुखी तितली,
    कैसे कुछ बतियाएगी?
    लाख टके की बात है।

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  11. घृणा-द्वेष भर अंगारों-सी ,
    दहशत उगल रही जो “नाली”,
    सोचो, ज़रा बाँसुरी उससे,
    कैसे बनकर आएगी?
    भाईचारे की स्वरलहरी,
    कैसे मन को भाएगी?
    रवि जी, ज़रा देखिये,पशु पक्षी तो क्या कोमल वाद्य भी आतंक के प्रकोप से भयभीत लगते हैं । सशक्त रचना के लिये बधाई
    शशि पाधा

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  12. विमल कुमार हेडा़15 मई 2010 को 8:33 am

    घृणा-द्वेष भर अंगारों-सी ,
    दहशत उगल रही जो “नाली”,
    सोचो, ज़रा बाँसुरी उससे,
    कैसे बनकर आएगी?
    भाईचारे की स्वरलहरी,
    कैसे मन को भाएगी?
    बौराए हैं ... ... .
    ये पंक्तियाँ बार बार गुनगुनाने का मन करता है रचना बहुत अच्छी लगी
    रवि जी को बहुत बहुत बधाई, धन्यवाद।
    विमल कुमार हेडा़

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  13. आपकी ये पोस्ट मैंने कई बार पढ़ी और कई लोगों को पढवाई है, आज लिख रहा हूँ, बहुत सोच में डालने वाली कविता है, पर मन में डर सा बैठ रहा है , और सोच रहा हूँ कि कैसे मानेंगे ये बाज़ फिरंगी .

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  14. बौराए हैं बाज फिरंगी,कैसे चिड़िया गाएगी?. ………अच्छी कविता ..अच्छी पुकार. ... बधाई .

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