11 नवंबर 2010

१३. मन की महक

मन की महक
बसी घर-अँगना
बनकर बंदनवार

नेह नर्मदा नहा,
छाछ पी, जमुना रास रचाए
गंगा 'बम भोले' कह चंबल
को हँस गले लगाए
कहे : 'राम जू की जय'
कृष्णा-कावेरी सरयू से-
साबरमती सिन्धु सतलज सँग
ब्रम्हपुत्र इठलाए

लहर-लहर
जन-गण मन गाए
'सलिल' करे मनुहार

विन्ध्य-सतपुड़ा-मेकल की
हरियाली दे खुशहाली
काराकोरम-कंचनजंघा
नन्दादेवी आली
अरावली खासी-जयंतिया
नीलगिरी, गिरि झूमें
चूमें नील-गगन को, लूमें
पनघट में मतवाली

पछुआ-पुरवैया
गलबहियाँ दे
मनाएँ त्यौहार

चूँ-चूँ चहक-चहक गौरैया
कहे हो गई भोर
सुमिरो उसको जिसने थामी
सब की जीवन-डोर
होली-ईद-दिवाली-क्रिसमस
गले मिलें सुख-चैन
मिला नैन से नैन
बसें दिल के दिल में चितचोर

बाज रहे
करताल-मंजीरा
ठुमक रहे करतार
--
संजीव सलिल

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर आचार्य जी, एक और सुन्दर रचना के लिए बधाई।

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  2. विमल कुमार हेड़ा।15 नवंबर 2010 को 9:19 am

    बहुत ही सुन्दर एवं मनभावन गीत, संजीव सलिल साहब को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद।
    विमल कुमार हेड़ा।

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  3. बहुत खूब आचार्य जी, एक और खूबसूरत रचना के लिए बधाई।

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