4 जून 2011

३. तन गुलाब का मन पलाश का

मुझे दोष देने से पहले
दर्पन तो देखो
तन गुलाब का मन पलाश का
मुझे बुलाता है।

दीवाली में टेसू राजा
घर घर जाते हैं
बुझे हुये मावसी घरों में
दीप जलाते हैं

मुझे दोष देने से पहले
मौसम तो देखो
पुरवा का तन पावस का मन
क्या समझाता है।

रंगों में फूलों की मस्ती
घुल कर छाती है
आँचल से बिछुरी अँगिया
दरबार सजाती है

मुझे दोष देने से पहले
पाहुन तो देखो
मन का भृंगी गीत तरंगी
किसे सताता है

मुझे लग रहा जग सारा
यह बन पलाश का है
बिना छुये जो डस जाये
वह तन वताश का है

मुझे दोष देने से पहले
अपने को देखो
वीणा सा तन सरगम सा मन
गीत सुनाता है

- डा० जीवन शुक्ल

5 टिप्‍पणियां:

  1. फूल पलास के मन को छुए
    शब्दों में अहसास जगे
    हौले हौले दिल की गिरह
    खोल के चितवन कौन पगे

    मुझे दोष देने से पहले
    मधुवन तो देखो
    कलियों के यौवन पर
    मादकता छलकता है.

    आपका ये गीत पढ़कर ये पंक्तिया खुद ब खुद मन में गुनगुना उठे. वाकई यदि की गीत के बोल से आप लिखने को प्रेरित हो जाये तो ये उस गीत की सफलता का ही प्रमाण हैं. बहुत सुंदर नवगीत.

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  2. मुझे लग रहा जग सारा
    यह बन पलाश का है
    बिना छुये जो डस जाये
    वह तन वताश का है

    मुझे दोष देने से पहले
    अपने को देखो
    वीणा सा तन सरगम सा मन
    गीत सुनाता है
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    rachana

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