2 सितंबर 2011

२०. चलो मन कहीं प्यार की छाँव

चलो मन कहीं प्यार की छाँव

भागम भाग, धुआँ कोलाहल
हम सब हैं बेचैन।
ऊँची छत है, घने वृक्ष हैं
चुटकी भर ना छाँव।
चलो मन
कहीं प्यार की छाँव।

सुगबुगाता, अंधियारा
शोर शराबा धुआँ-धुआँ।
छलना यहाँ चाँदनी का
आग उगलना सूरज का।
बना पराया सुलग रहा मन
कहाँ मिलेगी ठाँव।
चलो मन
कहीं प्यार की छाँव।

डामर की तपती सड़कें हैं
लाखों लाखों पाँव।
दिखते नहीं फफोले जग को
जीवन लगता दाँव।
चलो मन
कहीं प्यार की छाँव।

थकता नहीं शहर पल भर भी
थक जाती है पीडा़।
काट रहा है यहाँ हमें भी
सूनेपन का कीडा़।
शहरों की यह भरी भीड़ अब
लील रही है गाँव।
चलो मन
कहीं प्यार की छाँव।

अनपहचाना स्वाद अनोखा
फीका है पकवान।
लहरें उठतीं अनगिनती की
एकाकी है नाँव।
चलो मन
कहीं प्यार की छाँव।

-निर्मला जोशी
(भोपाल)

4 टिप्‍पणियां:

  1. निर्मला जी को इस सुंदर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई।

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  2. बहुत अच्छा गीत/नवगीत है।
    " सुगबुगाता, अंधियारा
    शोर शराबा धुआँ-धुआँ।"
    में "सुगबुगाता" शब्द लयात्मकता में वाधक सा प्रतीत हो रहा है।

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  3. निर्मला जी का यह गीत कथ्य की दृष्टि से तो अच्छा है, किन्तु अलग-अलग पदों में अलग-अलग मात्रा-पदों के उपयोग के कारण कई ज़गह प्रवाह बाधित हुआ है, जो अखरता है| काश, ऐसा न होता! इसका मूल भाव भी अधिकांशतः पारंपरिक गान से हमें जोड़ता है| इसे नवगीत न कहकर यदि नवगान कहा जाये तो ज्यादा सही रहेगा| उस रूप में यह वन्दनीय है|

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