6 सितंबर 2014

८. काट रहे सब डाल - कृष्णनंदन मौर्य

काट रहे सब, डाल वही
हैं बैठे जिसको थाम।
बूढ़ा बरगद सोच रहा
दिन कैसे आये राम।

बाग, फूल, तितली
बसंत से रंग हुआ गायब
झूठे बादल
लेकर आता है अषाढ़ भी अब
बाढ़, अकाल, भुखमरी का
ॠतुयें लातीं पैगाम।

भूमि, भाव की सूखी
उड़ती है स्वारथ की रेत
प्रगतिवाद के सांड़
खा गये नैतिकता के खेत
उगे अर्थ के 'हट'
परार्थ के पीपल हुये धड़ाम।

पर्वत नंगा हुआ
सूख कर नदी हुई निर्जल,
सुविधा के घर लील गये
हरियाली के जंगल,
एक-एक कर विदा हो रहे
महुआ, जामुन, आम।

- कृष्ण नन्दन मौर्य
प्रतापगढ़

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।