16 मई 2009

11- पारुल

हृदय कूट पीर उपजाई
मगर प्यार का रंग न बदला

आहत जी की पीर अपार
छले गए तन बारंबार
पात्र बदल गए अफसानो में
तदपि तीर-निषंग न बदला

हृदय कूट पीर उपजाई
मगर प्यार का रंग न बदला

गंध रूप रस रंग तुम्हारे
स्मृतियों में शूल हमारे
चुभते रहते सांझ सकारे
नीर नयन का संग न बदला

हृदय कूट पीर उपजाई
मगर प्यार का रंग न बदला

बीज रोप के आशाओं के
भंवर रचा के तृष्णाओं के
स्वाति बूंद हो गई बनवासी
चातक मलंग विहंग न बदला

हृदय कूट पीर उपजाई
मगर प्यार का रंग न बदला

11 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक जानकारी...नयी विधा है...हम भी कोशिश करेंगे...
    नीरज

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  2. बीज रोप के आशाओं के
    भंवर रचा के तृष्णाओं के
    स्वाति बूंद हो गई बनवासी
    चातक मलंग विहंग न बदला

    अतिसुंदर और व्यापक अर्थो वाला गीत।

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  3. बहुत सुन्दर ! सब कुछ , पर स्वाति की बूँद बनवासी कैसे हो गई? और चातक या विहंग मलंग नहीं होता। बिम्ब, प्रतीक, मुहावरे, कल्पना सबके प्रयोग की व्यावहारिक यथार्थमयता आवश्यक है नहीं तो यह अप्रचलित दोष के अन्तर्गत आता है। नवगीत में कथ्य उसकी आत्मा है और लय उसका शरीर।
    -अनाम

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. पारुल जी का गीत गीत की पूरी योग्यता रखता है ।प्रथम और षष्ठम पंक्ति को छोड़कर सारे गीत में कहीं कोई व्यवधान नहीं है,किन्तु "हृदय कूट पीर उपजाई " में एक मात्रा की कमी होने से गुनगुनाने में कठिनाई आती है। इसके स्थान पर " छाती पीट पीर उपजाई " कर देने से एक तो देशज शब्द होने के साथ साथ अनुप्रास अलंकार भी आ जाता है।दूसरा परिवर्तन छटवीं पंक्ति में "तदपि तीर-निषंग न बदला" यहाँ तदपि अनावश्यक कठिनाई पैदा कर रहा है।यहाँ " फिर भी तीर-निषंग न बदला" रखा जाये तो उत्तम होगा ।

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  6. मुझे बहुत बढिया लगा आपका नवगीत पारुल !

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  7. aadarniya kataare ji v sabhi mitron ka dhanyavaad..

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  8. मुझे पारुल का गीत पसंद आया। पहले दो अंतरे काफ़ी सुंदर बन पड़े हैं। अंतिम अंतरे में छायावदी या रहस्यवादी दुरूहता है जो इसको नवगीत से दूर ले जाती है। इसी प्रकार की कुछ दुरूहता मानोशी के अंतिम छंद और लावण्या के अंतिम छंद में भी हो गई थी। पर इससे नवीनता की ओर मुड़ना कोई मुश्किल काम नहीं। अभी सबको ठीक से पता भी तो नहीं है कि नवगीत के लिए हम क्या अपनाएँ क्या छोड़ें। शायद धीरे धीरे धुंध छँट रही है। अनेक शुभकामनाएँ।

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  9. हृदय कूट पीर उपजाई
    मगर प्यार का रंग न बदला

    रचना नवगीत सी नहीं लगी ,
    छांदिक मोह बरकरार है
    विचारों का खुलापन ओर
    बिम्ब-प्रतीकों का भी नयापन वांछित है.
    हम जरूर सफल होंगे इस अभियान में.
    सभी म्हणत कर रहे हैं.
    - विजय

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