7 मई 2009

4- गौतम राजरिशी

आये गये
कितने ही मौसम
मगर प्यार का रंग न बदला
युग बदला
दुनिया ये बदली
तेरा मेरा संग न बदला

मैं कान्हा, तू राधा मेरी
वृंदावन की कुंज गली थी
मैं शंकर बन नाचा था, जब
तू गौरी अग्नि में जली थी

बंसी की वो
तान न बदली
डमरू वो मिरदंग न बदला

युग बदला
दुनिया ये बदली
तेरा मेरा संग न बदला

सदियों-सदियों सहते आये
जंजीरें सब तो़ड़ीं हमने
परबत खोदे, दरिया बाँधा
हर युग में जब भी हम जन्में

सिंहासन
कितने ही बदले
इश्क ने अपना ढंग न बदला

युग बदला
दुनिया ये बदली
तेरा मेरा संग न बदला

14 टिप्‍पणियां:

  1. कटारे जी - प्रणाम। तथा मेरे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए धन्यवाद। और उनको भी धन्यवाद जिन्होंने प्रतिभागी कवियों के नाम उजागर किए। एक और अनुरोध। हर कवि के नाम को उनके ब्लाग/वेबसाईट से जोड़ दे, ताकि पाठकगण रचयिता के बारे में और जान सकें, उनकी अन्य रचनाओं का भी अवलोकन कर सके। यही तो खूबी है अंतरजाल की - कड़ी से कड़ी जुड़ती चली जाती है।

    गौतम जी -
    समक्ष आपके हम सक्षम नहीं
    सोचते थे कि लिखते हम भी कुछ कम नहीं
    सुंदर रचना। मुझे मात्राओं आदि का ज्ञान नहीं है। और न ही श्रुत्यानुप्रास, व्रंत्यानुप्रास, अन्त्यानुप्रास का क-ख-ग पता है। फिर भी कुछ कहने पर बाध्य हूँ।

    'हर युग में जब भी हम जन्में'
    यह पंक्ति जमी नहीं। खटकती रही।

    और अंत में 'इश्क' शब्द ने बहुत परेशान किया। पूरी कविता में जो शब्द हैं (युग, अग्नि, सदी, संग आदि), उनसे मेल नहीं खाता। अंग्रेज़ी में कहते हैं - sticks out like a sore thumb.

    सद्भाव सहित
    राहुल
    http://mere--words.blogspot.com

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  2. SUNDAR KAVITA KE LIYE GAUTAM BHAEE KO BADHAAYEE AUR PRASTUTI KE LIYE AAPKA AABHAAR...

    ARSH

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  3. श्री गौतम राजरिशी का यह नवगीत बहुत अच्छे नवगीतों में से एक है। निश्चित रूप से नवगीत की सभी परम्पराओं का निर्वाह इस छोटे से सुन्दर गीत में किया गया है। पुराने प्रतीकों का अच्छा नवीनीकरण किया गया है। लय सधी हुई है। यदि दो स्थानों पर जो कि बहुत बारीक कमियां हैं दूर कर लिया जाये तो बहुत अच्छा होगा। सबसे पहले मुखड़ा को देखें "आये गये कितने ही मौसम " यहाँ एक मात्रा को समायोजित करते हुए " आय गये कितने ही मौसम" पढना पड़ रहा है। इसे "आये गये अनगिनत मौसम " कर लें तो ठीक होगा। इसी तरह " डमरू वो मिरदंग न बदला " डमरू और मृदंग न बदला " करने से व्यर्थ में मृदंग को मिरदंग नहीं लिखना पड़ेगा। पुनः गौतम जी को अच्छे नवगीत के लिये साधुवाद ।

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  4. बहुत सुन्दरता से रचा है.

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  5. आदरणीय गौतम जी,
    "परबत खोदे, दरिया बाँधा
    हर युग में जब भी हम जन्में"
    बहुत प्यारी बात !
    ----
    "इश्क ने अपना ढंग न बदला"
    अगर इस पंक्ति में 'इश्क' की जगह कोई और शब्द इस्तेमाल करें तो गीत और सुन्दर लगेगा !
    सादर शार्दुला

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  6. पहले तो राजरिशी जी को बधाई. उनका ये कहना सही नहीं था कि मैने अपना गीत क्यों भेजा. आप में एक अच्छा नवगीतकार मौज़ूद है.
    सदियों-सदियों सहते आयें
    जंजीरें सब तो़ड़ीं हमने
    परबत खोदे, दरिया बाँधा
    हर युग में जब भी हम जन्में
    ये पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं.
    नवगीत गीत से अलग नहीं हैं वह भी गीत ही हैं. बस कहने का लहज़ा नया है. हम अपनी बात को उस समय की भाषा में क्यों कहें जिस समय की भाषा में उसे सोचते नहीं हैं. भवानी प्रसाद मिस्र जी की कविता है-जिस तरह हम सोचते हैं उस तरह तू लिख, और उसके बाद फिर हमसे बड़ा तू दिख. हम अपनी सोच को नयी भाषा, नयी कहन, नये बिम्ब, नये प्रतीकों में गीत में अभिव्यक्त करें तो निश्चित ही वह अभिव्यक्ति नवगीत में होगी फिर से बधाई....संजीव गौतम.

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  7. गौतम जी आपका लिखा यह नवगीत बहुत पसंद आया .शुक्रिया

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  8. आदरणीय गौतम जी,
    सुंदर रचना है.

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  9. गौतम का सुंदर नवगीत।

    कटारे जी एक प्रश्न- गीत और नवगीत में क्या फ़र्क हुआ अगर हमें नवगीत में भी मात्रायें गिननी पड़ें और मात्राओं को लयानुसार घटाने या बढ़ाने की स्वतंत्रता न हो। नवगीत का सार किसी गीत से भिन्न कैसे है?

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  10. गीत बहुत प्‍यारा है। बधाई

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  11. सुंदर नवगीत है। देखा गौतम जी, जिसको आप "अदना सा" कह रहे थे उसको कितनी प्रशंसा मिल रही है। यह इसलिए है कि आपने पहले गज़लें लिखी हैं और भाषा की रवानगी समझी है। उसका लाभ नवगीत में भी मिला है। शायद इसमें ध्यान से देखने से कमियाँ ढूँढी जा सकती है लेकिन पहले नवगीत के हिसाब से यह काफ़ी सधा हुआ है।

    नवगीतों में हम धीरे धीरे कुछ और बातें समझेंगे। जैसे नवगीत में छंद की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है। इसका अर्थ यह है कि हम अपना छंद बना सकते हैं। मुखड़ा कितना लंबा हो, कहाँ-कहाँ विराम हो और अंतरे में कितनी पंक्तियाँ हों, वे कितनी लंबी हों और किस प्रकार मुखड़े से मिलें इसका निर्णय हम स्वतंत्रता से कर सकते हैं। लेकिन जो छंद हमने पहले मुखड़े और अंतरे में बनाया है उसका पूरे गीत में पालन होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो गीत का प्रवाह रुक जाएगा। यही वे स्थान है जहाँ शास्त्री जी कहते हैं कि मात्राएँ कम हैं या ज्यादा हैं। आशा है हम सब रोज़ यहाँ कुछ नया सीखें और प्रश्न पूछें। जिससे नया सीखने का अवसर मिलता रहे।

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  12. गौतम राजरिशी द्वारा दी गई पंक्ति विशेष पर लिखा गया नवगीत बहुत अच्छा है। कृष्ण-राधा और शंकर-गौरी के प्रयोग नवगीत के केन्द्रीय भाव को देखते हुए सतीक प्रयोग है। "डमरू वो मिरदंग न बदला" पंक्ति पूरे गीत की सुन्दरता में चार चाँद लगा रही है। "सिंहासन कितने ही बदले, इश्क ने अपना ढँग न बदला" ये इस नवगीत के सबसे अन्त की पंक्तियाँ हैं। यह चरण ऊपर की तुलना में थोड़ा कम प्रभावशाली हैं। यहाँ अपेक्षा की जाती है कि इसे थोड़ा और सुधारा जाए ताकि यह चरण सबस अधिक प्रभावक बन सके। कुल मिलाकर एक सुन्दर नवगीत के लिए गौतम राजरिशी जी को हार्दिक वधाई।
    -डा० व्योम

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  13. आप सब का आभारी हूँ। ये तो मेरे लिये सम्मान की बात है कि मेरी रचना पर मुझे स्वंय कटारे साब, शर्दुलाजी, पूर्णिमा जी और डाक्टर व्योम साब का आशिर्वाद मिला है....
    मानोशी जी के प्रश्न मैं भी दुहराना चाहुँगा।
    अपनी बात में ये कहना चाहता था कि "इश्क" की जगह मैं "प्रीत" शब्द का इस्तेमाल कर सकता था, लेकिन ऊपर "दरिया" शब्द के बैलेंस को बनाने के लिये ही इश्क को लेकर आया था, बाकि गुरूजनों का जो आदेश हो...
    सांकृत्यायन जी, समीर जी, राहुल उपाध्याय जी, रंजना जी, संजीव जी ,गुरूभाई अर्श,अजीत जी और कमल जी का बहुत-बहुत शुक्रिया...

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