9 मई 2009

5- राघवेन्द्र सिंह कुशवाह "राघव"

रहन - सहन अब बदल गया है, ख्वाब नींद से निकल गया है,
चारों ओर घुटन है छाई, जाने कौन घडी है आई,
लैला, मजनूं, हीर गए, पर कुर्बानी का ढंग न बदला,
सारी दुनिया बदल रही है, लेकिन प्यार का रंग न बदला ,

मौसम करवट बदल रहा है, सावन सूखा निकल रहा है,
है वसंत मैं पतझड़ छाई, शीत ऋतु गर्मी है लाई,
वन बदले कलियाँ भी बदली, पर आसमान का रंग ना बदला,
सारी दुनिया बदल रही है, लेकिन प्यार का रंग न बदला ,

बीता सतयुग कलियुग आया, दंगे, झगडे साथ है लाया,
रामायण गीता सब भूले, पैसा देख सभी हैं फूले,
पांडव कौरव व्यस्त जुए मैं , राधा कृष्ण का संग ना बदला,
सारी दुनिया बदल रही है, लेकिन प्यार का रंग न बदला

ज़ाति-पांति की खड़ी हो गई , चारों ओर दीवार,
दिशाहीन हो गया समाज, जैसे नाव बिना पतवार,
सत्ता बदली, शासन बदले, घर, गलियारे, आँगन बदले,
तुलसी, सूर , कबीरा बदले, पर कविता का मर्म ना बदला
सारी दुनिया बदल रही है, लेकिन प्यार का रंग न बदला

सबला तो अब भी अबला है, कितने युग तो बीत गए हैं,
शैतानी चालों को चलकर, कौरव फिर से जीत गए हैं,
दुर्गा, सीता और द्रोपदी, गली - गली अपमानित होती,
संबंधों के शब्दकोष में , माँ है सबसे ऊपर होती,
रिश्तो की गहराई बदली, विश्व सृजन का ढंग ना बदला,
सारी दुनिया बदल रही है, लेकिन प्यार का रंग न बदला

हक़ बदला और फर्ज भी बदले, छटा घटा भी रंग बदलती,
समय बीतने पर तो देखो मेहदी धूमिल पड़ने लगती ,
पिक का गायन, मधुकर का स्वर, इच्छा बदली, बदली आशा,
सरिता तट पर रहने वाला भी रह जाता है प्यासा,
वाडे और इरादे बदले , सत्य झूठ का द्वंद ना बदला,
सारी दुनिया बदल रही है, लेकिन प्यार का रंग न बदला

--राघवेन्द्र सिंह कुशवाह "राघव"

8 टिप्‍पणियां:

  1. राघवेन्द्र जी बहुत अच्छा लिखते हैं आप। काफी सशक्त पकड़ है आपकी छन्द और लय पर। परन्तु कहीं कहीं थोड़े सुधार की आवश्यकता है। जैसे- " वन बदले कलियाँ भी बदली, पर आसमान का रंग ना बदला" इसमें थोड़ा सा संशोधन करने मात्र से लय बिल्कुल ठीक हो सकती है- "वन बदले, कलियाँ बदली, पर आसमान का रंग ना बदला" केवल "भी" हटा देने से सब ठीक हो जाता है। कुछ नए प्रतीक, नए बिंब, नई कल्पनाएँ, कुछ लोक शब्द भी प्रयोग कर सकें तो बहुत अच्छा रहेगा।
    -डा० व्योम

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  2. आदरणीय राघव जी,
    बहुत बहुत अच्छा लगा आपका गीत पढ़ के ! वाह ! वाह !
    ये विशेष लगे :
    "मौसम करवट बदल रहा है, सावन सूखा निकल रहा है,"
    "तुलसी, सूर , कबीरा बदले, पर कविता का मर्म ना बदला "
    "रिश्तो की गहराई बदली, विश्व सृजन का ढंग ना बदला,"
    "पिक का गायन, मधुकर का स्वर, इक्षा बदली, बदली आशा,"
    ----
    एक बात जानना चाहती थी, क्या छंदों में ऐसे पंक्तियों की संख्या बदलना मान्य है?

    सादर शार्दुला

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  3. राघवेन्द्र जी का यह विषय केन्द्रित गीत पाठशाला में आए सभी गीतों से बहुत बड़ा है। उनके पास लिखने को बहुत सामग्री है और लिखने की कला भी है। उन्होंने सतयुग से प्रारम्भ करके द्वापर और त्रेता को समेटते हुए कलियुग के अंतिम चरण तक का वर्णन कर दिया है। गीत का निर्वाह कुशलता से किया है । परम्परागत प्रयोगों के साथ कई नये मौलिक प्रयोग भी गीत को नवगीत की ओर ले जाते हैं। कवि छन्द, लय के ममले में पूर्ण समर्थ है।फिर भी शायद जल्दबाजी में कुछ छूट सा गया है, जिसे ठीक किया जा सकता है।
    १॰॰है वसंत मैं पतझड़ छाई, शीत ऋतु गर्मी है लाई, यहाँ एक मात्रा की कमी होने से ॠतू पढना पड़ है।इसे " आई शीत ॠतु गर्मी लाई" कहकर दूर किया जा सकता है।
    २॰॰वन बदले कलियाँ भी बदली, पर आसमान का रंग ना बदला, यहाँ " भी" हटाकर पर के बाद विराम लगा दें ।
    ३॰ज़ाति-पांति की खड़ी हो गई , चारों ओर दीवार,
    दिशाहीन हो गया समाज, जैसे नाव बिना पतवार ,
    यह अन्तरा सभी अन्तरों से एकदम भिन्न हो गया है जो बाधा उत्पन्न करता है। इसे कुछ इस तरह किया जा सकता है॰॰॰
    ज़ाति-पांति की खड़ी हो गईं , चारों ओर दिवारें कैसे ?,
    हुआ समाज दिग्भ्रमित ऐंसे ,नाव बिना पतवार हो जैसे

    ४॰सरिता तट पर रहने वाला भी रह जाता है प्यासा, यहाँ भी दो मात्रा इसमें कुछ जोड़ा जा सकता है यथा॰॰ फिर भी रह जाता है प्यासा,
    ५॰॰कविता का मर्म ना बदला, आसमान का रंग ना बदला
    राधा कृष्ण का संग ना बदला, विश्व सृजन का ढंग ना बदला,
    सत्य झूठ का द्वंद ना बदला, यहाँ निरर्थक न को ना लिखा गया है । राघव जी यदि इन कमियों को दूर कर लें तो यह बहुत सशक्त गीत है। उनका पूरा वर्णन मुझे बहुत अचछा लग रहा है।

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  4. मानशी जी गीत और नवगीत में कुछ बुत बड़ा अन्तर नहीं है । नवगीत पुरानी परम्परागत रूढियों के बन्धनों से मुक्त होकर कुछ नया लिखने की स्वतन्त्रता देता है। लेकिन नियम तो यहाँ भी होंगे भले ही नियम भी आप के ही बनायें हों पर पूरे गीत में एक रूपता परम आवश्यक है।जहाँ तक मात्रा का प्रश्न है तो वह अपने आप दिखाई देती है कि यहाँ कुछ कम या ज्यादा है।

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  5. राघव जी को एक सुंदर गीत की रचना के लिये बधाई...
    बहुत छोटा हूँ अभी तो समझ और बुद्धि में, कितु जैसा कि कटारे जी और पूर्णिमा जी ने कहा कि ये विचारों का खुला मंच है तो सब गुरूजनों से एक प्रश्न था-विशेष कर कटारे जी, पूर्णिमा जी और डाकटर व्योम साब से कि राघव जी का ये गीत क्या पूरी तरह से नवगीत की परंपरा है?उनके शब्द,विचार,छंद,शैली तो सब के सब अद्‍भुत हैं...किंतु रचना पढ़ कर एक क्षणिक आभास सा होता है कि विषय-पंक्ति "मगर प्यार का रंग न बदला" को कहीं-कहीं जबरदस्ती बिठाया गया है।
    राघव जी, कृपया आप अन्यथा नहीं लेंगे, इस आशा से ये प्रश्न रख रहा हूँ...सीखने के क्रम में हूँ हो सकता है कमी मेरे देखने में हो..

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  6. abhi tak aaye sabhi navgeet sundar hain..saath hi tippaniyon ke maadhyam se nayi baaten bhi khul kar saamney aa rahi hain...aabhaar

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  7. राघवेन्द्र जी का गीत भाषा और संस्कृति पर उनकी पकड़ का परिचायक तो है ही, गीत में व्यक्त करने की उनकी कुशलता का भी परिचायक है। गीत लंबा है और इतनी सारी बातें एक ही विषय पर कह पाना एक उपलब्धि है। इस गीत में बहुत कुछ ऐसा है जिसे नवगीत का तत्व कहा जा सकता है और बहुत कुछ ऐसा भी है जो इसे पारंपरिक गीत बनाता है। निःसंदेह इसे राघव जी ने किसी विधा को ध्यान में रखकर नहीं लिखा होगा। यह गीत कहता है कि मन के भावों को उन्मुक्तता से लयबद्ध किया गया है उसे किसी विधा में बाँधने की कोशिश नहीं की गई है।

    गौतम जी के प्रश्न के उत्तर में कहना चाहूँगी कि नवगीत की पाठशाला अभी शुरू ही हुई है और हम सब किसी सख्त नियमों को लेकर नहीं चल रहे हैं। नवगीत का नियम भी है बने बनाए नियमों से मुक्ति, पर मुक्ति की दिशा हर कवि को स्वयं निर्धारित करनी होगी। अगर हम यहाँ निश्चित नियम बनाने लगे तो सब गीत एक से होने लगेंगे जो हम नहीं चाहते। हम चाहते है सब खूब पढ़ें खूब लिखें, खूब वाद-विवाद हो और इस सबसे गुज़र कर (क्यों कि बिना इसके संभव नहीं) हर कवि अपनी स्वतंत्र दिशा का निर्माण कर सके। कुछ लोग बिलकुल नए छंद बनाएँगे, कुछ भाषा में नए प्रयोग करेंगे कुछ नई नई लयकारियाँ ढूँढेगे। यह सब निरंतर अभ्यास से ही संभव होगा। और जब जब आप इस प्रकार का कोई नया प्रयोग करेंगे जो नवगीत को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाता है तब तब डॉ. व्योम, शास्त्री जी या मुझसे उसके विषय में प्रशंसा के शब्दों की कमी नहीं होगी। जहाँ जहाँ कमियाँ होंगी वहाँ भी टिप्पणी होती रहेगी। कुछ बिलकुल दिशाहीन होगा तो उस पर भी विमर्श करेंगे। इस तरह सबको पूरी स्वतंत्रता रहेगी अपना मार्ग तय करने की बस वाहन गीत का ही हो, वह धीरे धीरे नव से नवतर होता जाएगा। इसके साथ ही हम कुछ लेख भी प्रकाशित करते रहते हैं महत्वपूर्ण कड़ियों के अंतर्गत, उन्हें भी ध्यान से पढ़ना चाहिए। कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों की सूची भी है, मिल सकें तो वे पुस्तकें पढ़नी चाहिएँ। एक बार फिर से प्रतिप्रश्नों का स्वागत है।

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  8. बहुत-बहुत मेहरबानी पूर्णिमा जी

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