6 जून 2009

६- उफ ये कैसे

उफ ये कैसे, गर्मी के दिन

सुबह की
शीतल भोर सुहानी
रातों की वो मधुर चाँदनी
शाम ढले गाँवों
में फैली
धूल-कणों की उड़ती लाली
गर्मी भर
न ये दिख पातीं
कटती रातें
तारों को गिन
उफ ये कैसे गर्मी के दिन

शीतल
छाया भाती सबको
दिन में धूप सताती सबको
जीव जगत व्याकुल
हो जाता
तरस नहीं क्यों? आता रब को
श्रमिकों का
बाहर श्रम करना
हो जाता है
बड़ा कठिन
उफ ये कैसे गर्मी के दिन

आग
उगलता है सूरज जब
खो जाती है हरियाली सब
कूप-सरोवर के
जल-स्तर
दूर, न जाने हो जाते कब
वन-
उपवन गर रहे उजड़ते
सब खुशियाँ
जायेंगी छिन
उफ ये कैसे गर्मी के दिन

--विजय तिवारी 'किसलय'

10 टिप्‍पणियां:

  1. कार्यशाला दो में सब के सब नवगीत बहुत अच्छे आ रहे हैं। पता नहीं ये गर्मी का प्रभाव या या नवगीत की पाठशाला के सदस्यों का जोश ....... "नवगीत संख्या-७" [उफ ये कैसे गर्मी के दिन] एक सुन्दर मँजा हुआ नवगीत है।
    एक दो शब्द बदल दें तो ये और अच्छा हो सकता है जैसे-
    "श्रमिकों का
    बाहर श्रम करना
    हो जाता है
    बड़ा कठिन
    उफ ये कैसे गर्मी के दिन"
    यहाँ " बड़ा कठिन" में २ मात्राएँ कम हो रही हैं इसलिए लय वाधित हो रही है। इसे यदि ऐसा कर दें-
    " हो जाता है
    कुछ और कठिन
    उफ ये कैसे गर्मी के दिन"
    तो यह एकदम ठीक हो जाएगा।
    इसी तरह-
    "आग
    उगलता है सूरज जब
    खो जाती है हरियाली सब
    कूप-सरोवर के
    जल-स्तर
    दूर, न जाने हो जाते कब
    वन-
    उपवन गर रहे उजड़ते
    सब खुशियाँ
    जायेंगी छिन
    उफ ये कैसे गर्मी के दिन"
    यहाँ इस प्रकार बदल कर देखें-
    " "आग
    उगलता है सूरज जब
    खो जाती है हरियाली सब
    कूप-सरोवर के
    जल-स्तर
    दूर, पकड़ से हो जाते तब
    वन-
    उपवन गर रहे उजड़ते
    सब खुशियाँ
    भी जायेंगी छिन
    उफ ये कैसे गर्मी के दिन " "
    एक सुन्दर और मनमोहक नवगीत के लिए रचनाकार को वधाई।

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  2. जीवन को सुंदर चित्रण गरमी के दिनों का...बढ़िया नवगीत के बधाई

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  3. उफ़ ये कैसे गर्मी के दिन- उफ़! से शुरू हुआ यह गीत पहले छंद में प्रकृति के पास पहुँचता है, दूसरे में जन सामान्य के पास और तीसरे में सामाजित सरोकारों से साक्षात्कार करता है। इतनी बड़ा क्षेत्र एक ही नवगीत में सुंदरता से पिरो लेने वाले रचनाकार को बधाई और शुभकामनाएँ!

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  4. यह नवगीत पढ़ते पढ़ते नज़रों के सामने गर्मी की दोपहर में घर से बाहर का मंज़र उभर आया। नवगीत के माध्यम से आपने (कवि ने)गर्मी के दिन का बयान सफलता पूर्वक किया। शुभकामनाएँ व बधाई स्वीकारें।

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  5. मुक्ता जी ठीक कहती हैं। सहज सुंदर मौसम का नवगीत जो इस दुनिया की हर समस्या को छूते हुए बहता है। प्राकृतिक, सामाजिक, और वैश्विक सरोकार बहुत मधुरता से भरे गए हैं। डॉ.व्योम की टिप्पणी ध्यान देने योग्य है।

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  6. तरस नहीं क्यों? आता रब को
    श्रमिकों का
    बाहर श्रम करना
    हो जाता है
    बड़ा कठिन
    उफ ये कैसे गर्मी के दिन
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    मानव मन की सँवेदनाओँ के प्रति
    सहानुभूति लिये
    ये नवगीत भी बहुत अच्छा लगा
    - लावण्या

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  7. सचमुच इस बार सारे गीत एक-से-बढ़कर एक आ रहे हैं...

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  8. बहुत अच्छा लगा -

    सुबह की
    शीतल भोर सुहानी
    रातों की वो मधुर चाँदनी
    शाम ढले गाँवों
    में फैली
    धूल-कणों की उड़ती लाली

    भोर से लेकर सांझ तक का सुंदर चित्र. शानदार गीत शानदार भाव

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  9. नवगीत बहुत अच्छे चाल चलन वाला है। बहुत सुन्दर प्राकृतिक वर्णन । इस गीत की सभी पंक्तियाँ १६ मात्रा वाली हैं और अन्तिम पंक्ति १४ मात्रा वाली है २ मात्रा का रिक्त स्थान है जो अच्छा प्रयोग हो सकता था किन्तु पहले अंतरे में अन्ति पंक्ति १६ कर देने से यह नियम गड़बड़ा गया है। इसलिये या तो जैसा डा०व्योम ने कहा वैसा करें या फिर पहले अंतरे की पंक्ति भी १४ की करें।
    १॰॰कटती रातें
    तारों को गिन १६
    २॰॰हो जाता है
    बड़ा कठिन १४
    ३॰॰सब खुशियाँ
    जायेंगी छिन १४
    या तो कटती रातें तारे गिन १४ करें
    मुखड़ा में भी एक मात्रा ज्यादा हो रही है ।उसे " सुन्दर शीतल भोर सुहानी " कर लें तो अच्छा होगा

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  10. सुबह की
    शीतल भोर सुहानी
    रातों की वो मधुर चाँदनी
    शाम ढले गाँवों
    में फैली
    धूल-कणों की उड़ती लाली
    गर्मी भर
    न ये दिख पातीं
    कटती रातें
    तारों को गिन
    उफ ये कैसे गर्मी के दिन

    bahut ache shabdon mein byaan kiya hai garmi ke dino ko
    mubarak ho

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