29 जून 2009

नवगीत - कुछ जिज्ञासाएँ कुछ समाधान

राजेन्द्रप्रसाद सिंह ने सन् 1958 में मुज़फ़्फ़रपुर से प्रकाशित ‘गीतांगिनी’ में नवगीत का प्रयोग किया । इससे पूर्व 1957 में इलाहाबाद साहित्य सम्मेलन में वीरेन्द्र मिश्र ने ‘नवगीत’ पर निबन्ध पढ़ा । आकाशवाणी से प्रसारित’नई कविता’विषयक वार्त्ताओं में देवी शंकर अवस्थी ने इसे कविता की कसौटी से अलग नहीं स्वीकारा-“नए गीत को नई कविता के समानान्तर किसी काव्य –धारा के रूप में देखना अनुचित है।”

जब कविता के स्थान पर ‘नई कविता’ प्रचलित हो सकती है तो नवगीत के नाम पर नाक –भौं सिकोड़ना उचित नहीं है । अतीत से पूर्णतया कटकर वर्त्तमान का कोई मूल्य नहीं है । न सारे पारम्परिक गीत लिजलिजी भावुकता के शिकार हैं और न ‘नवगीत’ के नाम पर लिखी जाने वाली सारी रचनाएँ पूरी तरह से नवगीत हैं । जहाँ तक शिल्प के अन्तर की बात है; किसी एक ही विधा में एक ही रचनाकार अपने विकासमान शिल्प के कारण अलग दिखाई दे सकता है । यदि ऐसा नहीं होगा तो फिर नयापन कहाँ रह जाएगा ? कथ्य की नवीनता , वैयक्तिकता के स्थान पर सामाजिकता का स्वर ,उपमान , बिम्ब , प्रतीक ,भाषा ,छन्द सभी में नयापन । लोकजीवन की आँच में बसी –तपी सहज भाषा ने इसके रूप को सँवारा है । विभिन्न आघात –प्रत्याघात से आहत मानव को अभिव्यक्ति दी है । छन्दोबद्ध हो जाने मात्र से लयात्मकता नहीं आ पाती है। छन्द को गति और यति की कसौटी पर कसकर नवगीत के लयात्मक स्वरूप की सत्ता स्थापित की जाती है । संवेदना और शिल्प में सन्तुलन ज़रूरी है । शिल्प की जकड़बन्दी में नए उपमान , प्रतीक और बिम्ब भी अपनी चमक खोने लगते हैं । ये सभी तभी कारगर होते हैं जब इनमें जीवन झलकता है।

यहाँ हरिशंकर सक्सेना, यश मालवीय और कुँअर बेचैन के तीन अलग –अलग रंगों - भंगिमाओं एव भाव गीत दिए जा रहे हैं।
सक्सेना जी के नवगीत ‘मत अंगार बिछाओ’ में पूरा राष्ट्रीय परिदृश्य है। मानचित्र ,अंगार , नागफनी , फ़सल , खरपतवार, जोंकें आदि प्रतीक पूरी विषम परिस्थिति की व्याख्या बनकर उपस्थित हैं। आज यदि देश की हालत पर नज़र डालें तो मानचित्र को जलाने के षड़यन्त्र रोज रचे जा रहे है। नारेबाज़ी में पूरा देश घिरा नज़र आ रहा है। शोषकवर्ग इधर के वर्षों मे खूब फूला-फला है। यह नवगीत वर्त्तमान परिस्थिति का आईना है।

1-मत अंगार बिछाओ
हरिशंकर सक्सेना
जल जाएगा
मानचित्र यह
मत अंगार बिछाओ।

मौसम की
बीमार हवा भी
आक्रामक लगती है
आदर्शों की
पगडण्डी पर
नागफनी उगती है।
मर जाएगी फ़सल यहाँ
मत खर –पतवार उगाओ।
जोंके
पीकर रक्त हमारा
आदमकद हो आईं
शिरा-शिरा में
कालदंश की
लहरें फिर मुस्काईं।

राह ढूँढ़ती पीढ़ी को
मत नारों में उलझाओ ।

[साभार :काव्या -4 (1991) सम्पादक : हस्तीमल ‘हस्ती’]
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दूसरा नवगीत ‘बेटे हैं परदेस में’ पारिवारिक परिदृश्य की मार्मिक अनुभूति को पूरी तन्मयता से अभिव्यक्त करता है। बेटे भी कैसे ? मेरी दोनों आँखों जैसे ; वह भी परदेस में । साँय –साँय करता पूरा घर जैसे अनकही उदासी से घिरा हुआ है। अलगाव का दर्द घर को और घर के हर व्यक्ति को व्यथित कर रहा है । बेटों का पल भर न बिसरना उनके प्रति गहरे लगाव को व्यंजित करता है। इस नवगीत में अलगाव की विवशता को सहर्ष स्वीकार करने का आग्रह भी है। रोटी –रोज़ी के लिए घर परिवार से दूर जाना जीवन का कड़वा सच है।

2-बेटे हैं परदेश में
यश मालवीय

मेरी दोनों आँखों जैसे
बेटे हैं परदेस में ।

याद आ रही है दोनों की
मिली-जुली –सी शैतानी
नहीं हो रही है
इन दोनों बाहों की खींचातानी
पत्थर बना रहा है
अम्मा की आँखों वाला पानी
फ़ोन कर रही
सन जैसे बालों की बुढ़िया नानी-

हमें बताओ , आखिर कैसे
बेटे हैं परदेस में ?

दादी की तस्वीर
कह रही है, बच्चों को फ़ोन करो
बैठो नहीं इस तरह
उठकर सन्नाटे पर पैर धरो
देख अजनबी अपना चेहरा
शीशे में , किसलिए डरो ?
मरने की तो उमर नहीं है
क्यों आखिर इस तरह मरो ?

हमें पता है जैसे –तैसे
बेटे हैं परदेस में !

साँय-साँय करता पूरा घर
पूरे घर को गाओ ना
गाओ कुछ इस तरह कि गा दे
घर का हर कोना-कोना
मधुर-मधुर –सा गीत बना दो
ये अपना हँसना-रोना
कठिन वक़्त का चले न
सूरज –चन्दा पर जादू टोना

नहीं बिसरते पल भर , ऐसे
बेटे हैं परदेस में !
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[ आजकल : अप्रैल 2009 से साभार ]

कुँअर बेचैन का नवगीत ‘बेटियाँ’ नवगीत –जगत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है । बेटी के लिए कवि द्वारा प्रयुक्त उपमान नवीन एवं ताज़गी लिये हुए तो हैं ही ,साथ ही साथ बेटी के सन्दर्भ में नितान्त उपयुक्त नवीन उपमान -‘शीतल हवाएँ’ , तरल जल की परातें, लाज़ की उज़ली कनातें, पावन-ऋचाएँ हैं तो कुछ प्रचलित उपमान –‘पारे, ध्रुव-सितारे,नाव, घटाएँ’ अपनी नई आभा के साथ उपस्थित हैं ।

3-बेटियाँ : कुँअर बेचैन
बेटियाँ-
शीतल हवाएँ हैं
जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं
बेटियाँ -
पावन-ऋचाएँ हैं
बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं
हैं चपलता तरल पारे की
और दृढता ध्रुव-सितारे की
कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन
नाव हैं ये उस किनारे की
बेटियाँ-
ऐसी घटाएँ हैं
जो छलकती हैं, नदी बनकर नहीं बहतीं ।

सामाजिकता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि मानव-मन की सहज चेतना में अंकुरित, पल्लवित –पुष्पित भावों और कल्पना को तिलांजलि दे दी जाए और नवगीत को किसी विचारधारा विशेष का अनुचर बना दिया जाए । ‘चन्दन वन डूब गया’ के नवगीतकार किशन सरोज की इन पंक्तियों की सामाजिकता और गहन तथा पावन प्रेमानुभूति(गंगा शब्द को ध्यान में रखकर) को देखिए:-

(क ) -अपनी ही पीड़ा मत जानो मेरे मन !
आँगन का भी दु:ख पहचानो मेरे मन !

(ख) 1– मिल सको तो अब मिलो
अगले जनम की बात छोड़ो ।

2-नागफनी आँचल में बाँध सको तो आना
धागो- बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं ।

3- कर दिए लो
आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र
तुम निश्चिन्त रहना।
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प्रस्तुति -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

4 टिप्‍पणियां:

  1. bachcho ke intzaar me apno kya haal hota hai usko bahut khoobsoorati ke saath shabdo me piroya hai aur saath hi betiyon ke baare me bhi khoob kaha .

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  2. आभार इस ज्ञान का..कोई पुख्ता परिभाषा तैयार हो तो बात बने.

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  3. श्रेष्‍ठ जानकारी। लेकिन कार्यशाला के नवगीतों पर भी विवेचना होनी चाहिए तभी हम सीख पाएंगे।

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  4. बहुत सारगर्भित बातें आदरणीय कम्बोज जी के लेख में निहित हैं. उम्मीद है नवगीत के विषय में नज़र साफ़ होगी.

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