30 जून 2009

डॉ. विनोद निगम के दो नवगीत - इसी विषय पर

गाढी हो गई धूप

गाढी हो गई धूप
नीमों के नीचे भी,
सूख गए फल वाले हरे कुंज आमों के,
फूल के बगीचे भी,

छायाएं सिमट गईं वस्त्रहीन पेड़ों में,
सूखापन बिछा हुआ, खेतों में, मेड़ों में
हाँफ रहा शहर ,गर्म हवा के थपेड़ों में,
उड़ती है तपी धूल ,
आगे भी ,पीछे भी,

सड़कों पर दूर दूर सन्नाटा.
झुलस गया कोलाहल
सूखा, आकर्षण चौराहों का
कुम्हलायी चहल॰पहल
भाप बन गए ,पुरइन वाले तालाब कुएं
कलशों का ठंडा जल,

बित्तों भर बची नदी ,
भिगो नहीं सकी मुई गोरी की घांघर को
टखनों के नीचे भी,

कमरों में जमीं हुई खामोशी,
बाहर है पिघलापन,
मौसम के आग बुझे हाथ, छू रहे तन को,
मन को भी घेरे है, एक तपन,
और एक याद, जो चमक उठती रह रह
ज्यों धूप में टंगा दर्पण ,

सुलग रहे हरियाली के आँचल,
दूब के गलीचे भी,
नीमों के नीचे भी ,
गाढी हो गई धूप


धूप

घाटियों में ऋतु सुखाने लगी है
मेघ धोये वस्त्र अनगिन रंग के
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।

पर्वतों पर छन्द फिर बिखरा दिये हैं
लौटकर जातीं घटाओं ने।
पेड़, फिर पढ़ने लगी हैं, धूप के अखबार
फुरसत से दिशाओं में।
निकल, फूलों के नशीली बार से
लड़कड़ाती है हवा
पाँव दो, पड़ते नहीं हैं ढ़ग के।

बँध न पाई, निर्झरों की बाँह, उफनाई नदी
तटों से मुँह जोड़ बतियाने लगी है।
निकल जंगल की भुजाओं से, एक आदिम गंध
आंगन की तरफ आने लगी है।

आँख में आकाश की चुभने लगी हैं
दृश्य शीतल, नेह-देह प्रसंग के।
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।

-डॉ. विनोद निगम

1 टिप्पणी:

  1. आह!

    अद्‍भुत गीत..
    "बित्तों भर बची नदी ,
    भिगो नहीं सकी मुई गोरी की घांघर को"

    और दूसरा गीत "पर्वतों पर छन्द फिर बिखरा दिये हैं
    लौटकर जातीं घटाओं ने।
    पेड़, फिर पढ़ने लगी हैं, धूप के अखबार
    फुरसत से दिशाओं में।
    निकल, फूलों के नशीली बार से
    लड़कड़ाती है हवा
    पाँव दो, पड़ते नहीं हैं ढ़ग के।"

    इन ऊँचाईयों तक कभी पहुँच भी पाऊँगा क्या?

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