9 अगस्त 2009

नवगीत की भाषा

नवगीत की भाषा स्पष्ट है हिंदी ही होती है। लेकिन नवगीत के लिए कैसी हिंदी का प्रयोग किया जाय यह बहुत कुछ कवि की व्यक्तिगत रुचि पर निर्भर करता है। हर कवि का अपना शब्दकोश होता है जिसमें से वह भाव के अनुरूप शब्द निकालता है और प्रयोग करता है। उसकी अपनी पसंद नापसंद होती है, उसका अपना व्यक्तित्व भी होता जिसे वह कविता में व्यक्त करता है। ये सब मिलकर नवगीत के गीतकार की भाषा बनाते हैं।

व्यापक शब्दकोश वाला कवि स्वाभाविक सी बात है भावों को बेहतर व्यक्त कर सकेगा। लेकिन एक अच्छा कवि भाषा को विषयवस्तु के अनुसार सुंदरता से ढालते हुए कविता में सौंदर्य भरता है। नवगीत के लिए हमें ऐसी ही भाषा की आवश्यकता होती है जो विषय के अनुरूप सुंदर, सहज और अर्थपूर्ण हो। उदाहरण के लिए डॉ. अश्वघोष का यह गीत भारतीय संस्कृति को लाजवंती धारणाओं और पश्चिमी प्रभाव को पछुआ हवाओं के रूपक में बाँधते हुए लिखा गया है। विषय गंभीर है तो उसके अनुरूप ही संस्कृत की ओर झुकाव रखने वाली सहज शब्दावली का प्रयोग करते हुए नवगीत को बड़ी सुंदरता से रचा गया है।

लाजवंती धारणाएँ

लाजवंती धारणाएँ
पढ़ रहीं नंगी कथाएँ

नीतियाँ बेहाल हैं
आदर्श की धज्जी उड़ी है,
रीतियाँ होकर
अपाहिज
कोशिशों के घर पड़ी है,
पुस्तकों में
कैद हैं नैतिक कथाएँ

मूल्य सारे
टूटकर बिखरे पड़े हैं,
प्रचलन को
स्वार्थ,
अब ज़िद पर अड़े हैं,
तेज होती जा रहीं
पछुआ हवाएँ

नवगीत में आँचलिक भाषा के प्रयोग की परंपरा रही है। यह नवगीत को सौंदर्य तो प्रदान करती ही है मिट्टी से जोड़े रखने में भी मदद करती है जो नवगीत की एक बड़ी आवश्यकता है। आँचलिकता ऐसी हो जो सबको छू जाए, जो नवगीत में उस विशेष वातावरण का सृजन कर दे जिसे हम प्रस्तुत करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए डॉ. हरीश निगम का यह गीत देखें-
बिखरे हैं पर

खाली पिंजरा
डोल रहा ओसारे में!

चला गया सुगना
बिखरे हैं पर
टीसों के मौसम
गए हैं ठहर

फ़र्क न लगता
शाम-सुबह अंधियारे में!

फेरे हैं दिन-भर
परछाईं के
आए ना झोंके
पुरवाई के

टोना-सा है
अमलतास कचनारों में!
यहाँ ओसारे, सुगना, टीस, टोना आदि आँचलिक शब्द अन्य सामान्य शब्दों के साथ मिलकर पाठक के मन पर अनमने ग्रामीण परिवेश का टोना रचने में सफल सिद्ध होते हैं। कुशल नवगीतकार अपने गीत की भाषा को नवगीत के परिवेश, विषय वस्तु और संवेदनाओं को सही ढंग से व्यक्त करने के लिए बदलता रहता है।

इससे पहले वाले लेख में हमने नईम का एक नवगीत उर्दू की ओर झुकाव वाला पढ़ा था। इसी तरह अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग भी नवगीतों में खूब हुआ है। यश मालवीय मुंबई का वर्णन करते हुए कहते हैं-
मुंबई

साँस साँस
बस अपने लिए तरसना होता है
सुबह हुई
जूते के फीते कसना होता है

लेनी पड़ती होड़ बसों से
लोकल ट्रेनों से
फूल फूल सपनों की लाश
न उठती क्रेनों से
गर्दन तक गहरे दलदल में
धँसना होता है

बार जुआघर होटल
डिस्को पार्टी रोशन होते
होटों पर जलती सिगरेट
पर बुझे बुझे मन होते
पीकर पागल सा
रोना या हंसना होता है

यहाँ क्रेन, लोकल ट्रेन, होटल, पार्टी, बार, डिस्को, सिगरेट आदि अनेक शब्द अँग्रेज़ी के होने के बावजूद गीत के बहाव में कमी नहीं आई है। न ही यह दुरूह बना है, बल्कि कवि जो कहना चाहता और उसको कहने में ये शब्द सहायक बन गए हैं।

कुल मिलाकर यह कि नवगीत की भाषा विषय, स्थान और अभिव्यक्ति के अनुरूप होनी चाहिए। हमारी भाषा गीत की लय में बह जाए और जो हम कहना चाहते हैं उसे सहजता से कह जाए, ऐसी होनी चाहिए। खूब नवगीत पढ़ना अच्छे नवगीत लिखने में सहायक होता है। जिस परिवेश में हम रहते हैं उसे अच्छी तरह समझने और उसके शब्दों को अपनी संवेदना में शामिल करते रहने से इन शब्दों का नवगीत में ढल जाना आसान होता है। किसी शब्द से जबरदस्ती अच्छी नहीं उसे सहज आने दें। ठीक लगे तो रखें अन्यथा बदल दें। नवगीत की दुनिया में बस इतना ही काफ़ी है।

--पूर्णिमा वर्मन

7 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्णिमा जी

    आपने बहुत ही उम्‍दा नवगीत हमारे लिए यहाँ पर प्रस्‍तुत किए, इसके लिए हम आभारी हैं। बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। अब हमें हमारी गल्तियां पहाड़ सी नजर आने लगी हैं। लेकिन आपके समाधान से ये पहाड बालू के बन गए हैं और हमें इन्‍हें बुहारना आने लगा है। आभार।

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  2. नवगीत और गीत, नवगीत का मुक्तछंद, नवगीत की भाषा और फिर विस्तृत समालोचना बहुत ही सार्थक और श्रमसाध्य काम हो रहा है। यह तो एक एक लेख संजोने योग्य है। नवगीत की साधक इस मंडली को मेरा साधुवाद। आशा है यह क्रम जारी रहे। सब महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत लेख हो गए हैं क्यो न अब एक कार्यशाला हो जाए फिर कुछ लेख हो जाएँगे। बाकी सदस्यों का क्या विचार है?

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  3. शुक्रिया शब्द अब कम पड़ जायेगा पूर्णिमा जी...
    और भाषा में विस्तार होगा ज्यादा से ज्यादा पढ़ने से...वो तो मैं खूब कर रहा हूं...

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  4. सुन्दर, अतिसुन्दर,कैसे तारीफ़ करूँ, समझ नहीं पा रहा हूँ। इतनी ज्ञानवर्धक जानकारी आपने इन लेखों के ज़रिये हम तक पहुँचाई,पुर्णिमाजी, आपका बहुत-बहु्त धन्यवाद। इतने उम्दा नवगीतों के सामने हमारे गीत कितने बौने हैं, अब पता चला। फिर भी कार्यशाला के आरम्भ होने का इंतज़ार रहेगा।

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  5. पूर्णिमा जी,

    नवगीत की भाषा, कथ्य तथा मात्रायों के विषय में इतनी बहुमूल्य जानकारी देने के लिये हार्दिक धन्यवाद । मैं तो प्रत्येक लेख को बार बार पढ़ रही हूँ और नवगीत के सही स्वरूप को समझने का प्रयत्न कर रही हूँ । अभिव्यक्ति के लिये शब्द भंडार बढ़ाने के लिये हमें नई नई रचनायों को पढ़्ने की आवश्यकता रहेगी , विशेषकर आँचलिक भाषा के शब्द जानने के लिये। मुझे लगा के अगर हम अपने प्रदेश के लोकगीतों को सुनें और पढ़ें तो भी अपना शब्द कोष बढ़ेगा। उदाहरण के लिये सुन्दर नवगीत देने के लिये आभार । कितने प्रश्नों के सहज ही उत्तर मिल गये । अगली कार्यशाला की प्रतीक्षा रहेगी ।
    शशि पाधा

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  6. किसी शब्द से जबरदस्ती अच्छी नही,शब्दों को सहज़ आने दें---यही सुन्दर बात है। आजकल बहुत से नव-गीतकार जबर्दस्ती नये-नये दूरस्थ भाव ,कूट भाव वाले शब्दों को ठूंस-ठांस कर नव-गीत रच रहे हैं जो विधा के लिये घातक है।

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  7. इस आलेख में
    नवगीत का भाषा-विज्ञान
    बहुत सरल ढंग से समझाया गया है!

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