6 अगस्त 2009

नवगीत का मुक्तछंद

नवगीत में छंद का बंधन नहीं है। लेकिन इसमें छंद होता है। यहाँ दो शब्दों का अर्थ ठीक से समझ लेना चाहिए- छंदमुक्त और मुक्तछंद।
1- छंदमुक्त का अर्थ है जिसमें छंद की उपस्थित ही न हो। जैसे नई कविता में पंक्तियाँ बदलते हुए इच्छानुसार अपनी भावनाओं के अनुसार आगे बढ़ते जाते हैं।
2- मुक्त छंद- जिसमें छंद तो है पर छंद कैसा रखना चाहते हैं उसकी स्वतंत्रता है।
नवगीत मुक्तछंदवाली रचना है। इसमें पारंपरिक छंदों का प्रयोग नहीं करते हैं। छंद नया बनाने के लिए यह भी ज़रूरी है कि छंद और मात्राओं की जानकारी हो। मात्राएँ कैसे गिनी जाती हैं यह शास्त्री जी ने दाहिने स्तंभ में नीचे बताया है। उसको ध्यान से पढ़ लेना चाहिए। किस पंक्ति में कितनी मात्राएँ रखी जाएँ यह कवि को ही निश्चित करना होता है। स्थाई में कितनी मात्राएँ हों, अंतरे में कितनी मात्राएँ हों और अंतरे की अंतिम पंक्ति का कैसा स्वरूप हो जो वह स्थाई के साथ ठीक से जुड़ सके यह कवि को खुद निश्चित करना होता है। उदाहरण के लिए सुप्रसिद्ध नवगीतकार नईम का एक गीत है-

चिट्ठी पत्री ख़तो किताबत के मौसम फिर कब आएंगे?
रब्बा जाने,सही इबादत के मौसम फिर कब आएंगे?

चेहरे झुलस गये क़ौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा
इससे बदतर किसी कयामत के मौसम फिर कब आएंगे?

इसमें देखें कि स्थाई दो पंक्तियों का बनाया गया है। दोनो की मात्राएँ समान हैं। अंतरा फिर दो पंक्तियों का है दोनों पंक्तियाँ स्थाई से काफ़ी छोटी हैं। तीसरी पंक्ति अंतरे की पंक्ति के समान मात्राओं वाली है लेकिन उसमें तुक नहीं रखी गई है जब कि अंतिम पंक्ति को स्थाई के बराबर रखा गया है ताकि पहली पंक्ति के साथ आसानी से घुल जाए। यह पूरी तरह से एक नया छंद है।
इस प्रकार अनगिनत छंद बनाए जा सकते हैं और उनको सुविधानुसार पंक्तियों में बाँटा जा सकता है। उदाहरण के लिए इस गीत को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-

चिट्टी पत्री
ख़तो किताबत के मौसम
फिर कब आएंगे?
रब्बा जाने,
सही इबादत के मौसम
फिर कब आएंगे?

चेहरे झुलस गये क़ौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
फिर कब आएंगे?

क्यों कि आजकल पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन छोटे छोटे कॉलम में किया जाता है इसलिए पंक्तियों छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट देना अच्छा रहता है। यह तो हुई बात कि नया छंद कैसे बनता है और कैसे लिखा जाता है पर इसके साथ साथ एक बात और भी जाननी चाहिए कि जब हमने एक स्थाई और एक अंतरा बना लिया तो पूरी रचना में उसी छंद का पालन होना चाहिए। तभी गीत में लय सध सकेगी। यह नहीं कि छंद की स्वतंत्रता है तो पहला अंतरा अलग छंद में और दूसरा अंतरा अलग छंद में। जो छंद एक बार बनाया गया है पूरे नवगीत में उसका पालन करना ज़रूरी है। उदाहरण के लिए इसी गीत का दूसरा अंतरा देखें-

ब्याह सगाई बिछोह मिलन के अवसर चूके
फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके
लगा अंगूठा कटवा बैठे नाम खेत से
जीने से भी
बड़ी शहादत के मौसम
फिर कब आएंगे?

ध्यान से देखें तो पाएँगे कि दूसरे अंतरे में पहले अंतरे की सभी नियमों का पालन किया गया है।

इससे पता चलता है कि नवगीत में हम मात्राओं, तुकों और विभिन्न भाषाओं के शब्दों के प्रयोग सभी के विषय में स्वतंत्रता प्राप्त करते हैं। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ ठीक से पता होना चाहिए। स्वतंत्रता का अर्थ स्व-तंत्र-ता अर्थात् अपने द्वारा बनाए गए तंत्र का पालन करना है न कि दिशाहीन होकर उच्छृंखल आचरण करना। इसलिए नवगीत के गीतकार को छंद तुक शब्दों के प्रयोग के सभी नियमों को ठीक से समझकर अपना नया रास्ता चुनना होता है।

गौतम राजरिशी ने एक बार पूछा था कि क्या गज़ल की तरह नवगीत में मात्राएँ गिराने की छूट है बाद में संजीव गौतम ने भी वह सवाल दोहराया था। गजल में भी किसी विशेष स्थान पर, किसी विशेष भाव को व्यक्त करने के लिए, लय खराब न करते हुए मात्रा गिराने की छूट होती है। उसी प्रकार नवगीत में भी सौंदर्य के लिए मात्रा घटाई या बढ़ाई जा सकती है। ऊपर के गीत में हम देखेंगे कि- ब्याह सगाई बिछोह मिलन के अवसर चूके - में बिछोह को बिछह पढ़ना पड़ रहा है। या बिछोह के छो को जल्दी से लघुरूप में पढ़ना पड़ता है। इसके स्थान पर विरह मिलन भी लिखा जा सकता था पर पूरे गीत में जैसा ग्रामीण परिवेश रचा गया है उसको देखते हुए शायद कवि ने बिछोह लिखा। अगर बिछह लिखते तो पढ़नेवाले के लिए अर्थ स्पष्ट न होता।

शास्त्री जी अपनी टिप्पणियों में बार बार सदस्यों को याद दिलाते हैं कि कहाँ मात्राएँ छूटी है और कैसे उन्हें भरना है। यह इसीलिए है कि सदस्य मात्राओं को ठीक से समझ लें। इस आशय का स्पष्टीकरण वे अपने एक लेख में पहले भी दे चुके हैं। अगर रचनाकार सदस्य को लगता है कि जानबूझकर विशेष अर्थ देने या प्रभाव उत्पन्न करने के लिए ऐसा किया गया है तो मात्रा के विषय में बात करनेवाले सदस्य या टिप्पणीकार से तर्क की आवश्यकता नहीं है। अगर सदस्य सचमुच कुछ पूछना या समझना चाहते हैं तो प्रश्नों का स्वागत है।

9 टिप्‍पणियां:

  1. जड़मति से सुजान बनने का रास्ता लांघ कर तय करने जैसा नहीं ही होता। अभी तो पहला क़दम ही है , वो भी लटपटाता सा।
    लेकिन चलते रहना है-- निरंतर।
    आप राह दिखा ही रहे हैं ।
    अनुरोध - निम्न पंक्तियां नवगीत की श्रेणी में आती हैं क्या?--कृपया बताएं ।
    दरिया मे पानी ,
    पानी को खूब रवानी दे।

    ओठों पर मुस्कान
    थिरकती गाती हो हरदम,
    गीतों को दे बोल और
    बोलों को मानी दे।
    दुल्हन के माथे को
    ढ़कती चूनर धानी दे


    फ़सल को पक्कापन ऐसे
    ज्यों सिद्धि तपसी को
    खेतों को दे बीज और
    बीजों को पानी दे

    दुल्हन के माथे को
    ढ़कती चूनर धानी दे

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  2. बहुत ही सटीक और स्‍पष्‍ट आलेख है। दिमाग के सारे खिडकी और दरवाजे खुल गए, सारे ही प्रश्‍नों के उत्तर मिल गए। आभार। अब यदि सम्‍भव हो तो हमारे गीतों की भी चीर-फाड कर दें। क्‍योंकि हम जानते हैं कि उनमें बहुत सारी कमियां होगीं।

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  3. अहा....अभी सब स्पष्ट सा दिख रहा है। कोशिश जारी है...

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  4. पूर्णिमा जी,

    पहला आलेख पढ़ कर कई प्रश्न मस्तिष्क में उभरे थे। खास तौर पर नये छन्द को रचने की बात पर। धन्यवाद आप सब का कि जल्दी ही इस विषय पर नया आलेख पढ़ने को मिला। आभार।

    शशि पाधा

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  5. दोनों आलेख बहुत अच्छे हैं पूर्णिमा जी. ऐसा लग रहा है कि नवगीत का ढांचा प्रतिभागियों को अब ज्यादा साफ़ दिखायी दे रहा है. मैं सबको नवगीत के विषय मैं अपने अनुभव से गुज़ारना चाहता हूं यदि आप इज़ाज़त दें-बात यूं है कि मैंने एम0एम0हिव्दी से किया और उसके बाद कविताओं का चस्का लग गया. शुरूआत एक-दो मुक्तछ्न्द के बाद गीतों से हुई. चूंकि कविताओं से सही परिचय एम0ए0 में ही हुआ था तो वही काव्य भाषा मन में समायी हुई थी. जैसे-
    बस एक रश्मि स्वर्णवर्णी
    हो स्फरित सविता दृगों से.
    पैठ धरती में गयी उर में किसी के,
    नव दीप्ति कर दी प्रज्ज्वलित.
    और
    नेहसिक्त कर स्पर्शों को
    अश्रु से भीगे चक्षुओं को..आदि-आदि
    इस छायावादी भाषा के साथ गीत लेखन लगभग तीन वर्ष तक किया.नये अच्छे संकलन ज़्यादा पढे नहीं थे, आगरा में सोम जी के अलावा नवगीत नाम से ही ज़्यादा परिचय नहीं था. गोष्ठियों में भी नवगीत नाम से कोई गीत नहीं सुनाता था. एक दिन भाई कुमार ललित ने बताया कि तीन संकलन पढने का मन है-1-यश मालवीय जी का 'कहो सदाशिव', कैलाश गौतम जी का 'सर पर आग' तथा अतुल कनक जी का शायद 'पूर्वा'. कुछ दिन बाद दिल्ली में 'कहो सदाशिव' संकलन मिल गया. पूरे संकलन की फोटोस्टेट करायी और संकलन ललित भाई को बेच दिया. संकलन को पढा. पढा क्या पूरा संकलन मन में इतने गहरे उतर गया कि एम0 ए0 की भाषा न जाने कहां गायब हो गयी एक दूसरी ही भाषा सामने थी. आप भी उस संकलन के कुछ गीतों के नमूने देखें-
    तुम किताब से धरे मेज़ पर
    पिछले सालों से....
    तुम अलबम से दबे पांव जब बाहर आते हो....
    यदा कदा वह डांट तुम्हारी
    मीठी सी.
    घोर शीत में जग जाती है याद अंगीठी सी.
    और
    गीत को स्वेटर सरीखा बुन रहा हूं.
    समय की पदचाप जैसे सुन रहा हूं.
    एक और देखें-
    सुबह सुबह की आपाधापी भाप भरा संवाद.
    नरभक्षी मौसम के मुंह फिर लगा ख़ून का स्वाद.
    ये देखें-
    मां तो झुलसी फसल हो गयी.
    कैसी अपनी नसल हो गयी.
    इसे देखिये-
    कितनी मुंह्ज़ोर हवा ढीठ घुडसवार सी.
    फिर भी है मौन सदी गीली दीवार सी.
    हल हुई समस्या के कोरे समझौते.
    भाई चारा पहने सैकडों मुखौटे.
    प्यार नहीं हिन्दी या उर्दू या फारसी.
    बडे मुंह अंधेरे ही घटना-दुर्घटना.
    घर आंगन बंटे हुए अमृतसर-पटना. ट्रेन लडी कटनी या जबलपुर इटारसी.
    और ये मासूम चित्र देखिये संवेदनाओं से भरा-
    हिलते रहे हरे पत्तों से नन्हे हाथ तुम्हारे.
    दफ़्तर जाना ही था पापा क्या करते बेचारे.
    कुछ समय बाद जब इलाहाबाद यश जी के घर पर उनसे मुलाकात हुई तो लगभग दो घंटे बाद जब नीचे उतर कर आये तो उन्होंने अपनी माताजी से मिलवाते हुए कहा अम्मा ये संजीव हैं इन्हें कहो सदा शिव के सारे गीत याद हैं!
    उसके बाद फिर तो ढूंढ कर नवगीत संकलन पढे. दादा नईम- पंख झुलसाकर गिरा सम्पाती धरा पर आंख सूरज से मिलाने का नतीज़ा है. श्रद्धेय माहेश्वर तिवारी, विद्यानन्दन राजीव, भारत भूषण. कैलाश गौतम, उमाकांत मालवीय, वसु मालवीय, सुधांशु उपाध्याय, वीरेन्द्र मिश्र, मुकुट बिहारी सरोज,देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, सोम ठाकुर,नचिकेता, कुमार रवीन्द्र, महेन्द्र नेह, शम्भु नाथ सिंह आदि-आदि के नवगीतों को पढने और सुनने का अवसर मिला.
    मेरा ये सब लिखने का आशय सिर्फ़ इतना कहना था कि जो बात बडे-बडे लेख, आलेख, निबन्ध, विद्वान नहीं समझा पाते वो सब उदाहरण समझा जाते हैं. अपने भीतर कुछ नया समाहित करने के लिये उससे सम्बन्धित पुराने से मोह का त्याग करना पडता है. अगर पहले से ही मान लें कि हमारी मुट्ठी तो भरी है तो नया फिर किसमें समेंटंगे. नयी धूप और ताज़ी हवा के लिये घर की खिडकियां और रौशनदान तो खोलने हीं होंगे. नहीं तो-
    खिडकियां देर से खोली बडी भूल हुई,
    मैं ये समझा था कि बाहर भी अंधेरा होगा.
    मात्रा गिराने के नियम के विषय में पूछने का मक़सद इतना सा था कि मैं तो मात्राएं गिरा लेता हूं. नियम की जानकारी नहीं है. मैंने नवगीत से सम्बन्धित आलेख लगभग शून्य ही पढे हैं क्योंकि मुझे लगता है कि नवगीत लिखने के लिये नवगीत पढना ज़रूरी है और समीक्षक बनने के लिये आलेख पढना.

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  6. नवगीत की भाषा पर बहुत ही सार्थक लेख है। इसके लिए पूर्णिमा जी को धन्यवाद। पर साथ ही संजीव गौतम जी के विस्तृत संदेश में उनकी आप बीती भी कुछ कम पठनीय नहीं। इससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। कृपया इसको भी एक पोस्ट में दे दें ताकि जिन लोगों का ध्यान इस ओर नहीं गया है उनको भी लाभ मिल सके।

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  7. संजीव जी की विस्तृत टिप्पणी ने भाव-विह्वल तो किया ही, बहुत सारी बातें भी स्पष्ट कर दी\ अभी तक मैं सिर्फ ग़ज़लों की किताबें ही खरीदा करता था,इस बार पहली बार यश मालविय जी की "एक चिड़िया अलगनी पर, एक मन में’ खरीद लाया..

    शुक्रिया पूर्णिमा जी...शुक्रिया कटारे साब!

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  8. तमाम नव-गीत पढ सुनकर यही लगता है कि यह गीत ही है जिसे लोक-गायन में रुक-रुक कर व पंक्तियां अलग-अलग करके,कहीं-कहीं छोढ के गाया जाता है। हां आजकल इसे कवि लोग नयी -नयी लक्षणायें,व्यन्जनायें ,कठिन शब्द प्र्योग करके दुरूह बना देते हैं,सिर्फ़ नये पन के लिये..। यह कवि के ग्यान के ऊपर निर्भर करता है।

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  9. इस आलेख को पढ़कर
    नए छंद बनाना आसान हो जाता है!

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