18 सितंबर 2009

१३- पावस प्रातः

ले सीली सी ताप
औ हलकी सी भाप
पावस प्रातः बिखरी पड़ी है

बादल से न बोलूं आज
फिर छितराऊ रश्मि का राज
नग-शिखर पर टिका कर कोहनी
भोर-नवोढा विचर रही है
झील-झील की बूँद-बूँद में
पावस प्रातः निखरी पड़ी है

नील गगन का कोना कोना
पाखी संग बतरस में खोना
नग-शिखर पर सुला कर रोहणी
अरुण-सुषमा छितर रही है
क्षण-क्षण की मोह-माया में
पावस प्रातः पिघली पड़ी है

--स्वाती भालोटिया

6 टिप्‍पणियां:

  1. बादल से न बोलूं आज
    फिर छितराऊ रश्मि का राज
    नग-शिखर पर टिका कर कोहनी
    भोर-नवोढा विचर रही है
    kitna sunder chitran hai
    saader
    rachana

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  2. प्रातः काल को बहुत सुन्दर शब्दों में पिरोया, बहुत बहुत बधाई , धन्यवाद

    विमल कुमार हेडा

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  3. वाह दी आपने क्या लिखा है...
    कसम से जब आपकी रचनाएँ पढता हूँ तो लगता है की यह कभी ख़त्म ना हों...
    सच में आपने पावस प्रातः को बिखरा दिया है...
    आपका भाई
    मीत

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  4. नयी नवेली भोर का इतना विविध तथा सजीव चित्रण। बहुत ही सुन्दर कल्पना और अभिव्यक्ति के लिये ढेर सी बधाई स्वीकार करें ।

    शशि पाधा

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  5. नग-शिखर पर टिका कर कोहनी
    भोर-नवोढा विचर रही है
    झील-झील की बूँद-बूँद में
    पावस प्रातः निखरी पड़ी है
    ye panktiyan bahut sunder
    bahut sunder varnan hai
    badhai
    rachana

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  6. पढ़ने के बाद नरम नरम सा महसूस हुआ।
    शब्द-संयोजन मोहता है।

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