1 दिसंबर 2009

१८-एक दीपक

जूझ कर कठिनाइयों से
कर सुलह परछाइयों से
एक दीपक रातभर जलता रहा

लाख बारिश आँधियों ने सत्य तोड़े
वक्त ने कितने दिए पटके झिंझोड़े
रौशनी की आस पर
टूटी नहीं
आस्था की डोर भी
छूटी नहीं

आत्मा में डूब कर के
चेतना अभिभूत कर के
साधना के मंत्र को जपता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा

जगमगाहट ने बुलाया पर न बोला
झूठ से उसने कोई भी सच न तौला
वह सितारे देख कर
खोया नहीं
दूसरों के भाग्य पर
रोया नहीं

दिन महीने साल निर्मम
कर सतत अपना परिश्रम
विजय के इतिहास को रचता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा

--पूर्णिमा वर्मन

10 टिप्‍पणियां:

  1. सधी हुई गेयता, सुन्दर भावाभिव्यक्ति, विचारोत्तेजक, क्या क्या लिखूँ? सब कुछ है इस रचना में। मेरी बधाई स्वीकार करें।

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  2. आदरणीया पूर्णिमा जी प्रणाम.
    तारीफ इसलिये नहीं कर रहा कि यह गीत आपने लिखा है बल्कि ये गीत तारीफ़ ख़ुद मांग रहा है. बहुत प्यारा गीत है. अनुकरणीय...

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  3. क्या बात है ...... इस नवगीत की..... बहुत कुछ कह दिया गया है इन शब्दों में
    "लाख बारिश आँधियों ने सत्य तोड़े
    वक्त ने कितने दिए पटके झिंझोड़े
    रौशनी की आस पर
    टूटी नहीं
    आस्था की डोर भी
    छूटी नहीं"

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  4. Ek Deepak Ratbhar Jalta raha" sahaj lay tal me supravahit manviya samvednaon ki aisi abhvyakti anyatra durlabh hai. dhnyavad

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  5. पूर्णीमाजी, बहुत सुन्दर और गहरी बात लिये है आपकी एक एक पंक्ती...सुन्दर लयताल, सहज किंतु गहरे भाव लिये है यह गीत...साथ में हिम्मत रख कठिनाईयों से जूझकर जीतने का सन्देश आपने नवीन अन्दाज़ में प्रस्तुत किया है...बहुत सारी बधाई!

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  6. आत्मा में डूब कर के
    चेतना अभिभूत कर के
    साधना के मंत्र को जपता रहा
    ...
    वह सितारे देख कर
    खोया नहीं
    दूसरों के भाग्य पर
    रोया नहीं
    ...
    दिन महीने साल निर्मम
    कर सतत अपना परिश्रम
    विजय के इतिहास को रचता रहा
    एक दीपक
    रातभर जलता रहा

    सुंदर भाव और प्रवाह, दीदी!

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  7. kitni sunder rachna hai.kitnim sadhi hui me kuchh likhne layak to nahi pr jo laga likh diya .
    aap to guru hai
    saader
    rachana

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  8. आशाओं के प्रेरक दीप जलाता,
    एक अपूर्व और आदर्श नवगीत!

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