1 दिसंबर 2009

१९-अँधियारा हँसता है

दीप जलाते रहे अनगिनत
फिर क्यों अँधियारा हँसता है

माटी के सोने-चाँदी के
दीपों में घृत-तेल भरा था
और वर्तिका डुबो उसी में
अग्नि पुंज स्पर्श धरा था
किंतु भुला बैठे थे हम यह
दीपक तले तिमिर बसता है।


दीप जलाए थे जो भी सब
केवल तन की अभिलाषा थी
दीप शिखा में नहीं कहीं भी
दीपित मन की सद-आशा थी
इसीलिए दिन-रात जगत पर
अंधकार पंजा कसता है।


दीप और अँधियार लड़े जब
अँधकार ने यह पहचाना
दीप जलाकर भस्म करेगा
मुश्किल है मेरा बच पाना
दीपक की छाया बन बैठा
मान दीप का ही ग्रसता है।

-निशेष जार

3 टिप्‍पणियां:

  1. निशेष जी का यह नवगीत बहुत सुन्दर है। विशेषतः -
    "किंतु भुला बैठे थे हम यह
    दीपक तले तिमिर बसता है।"

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  2. pad dar pad kramik vikasit hoti rachana.....hum jaise nausikhyoN ke liye seekhane ka avsar pradan karti hai

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