1 मई 2010

०३ : तार-तार हो गई : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक'

तार-तार हो गई

जिन्दगी ही जिन्दगी पे आज भार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!

हादसे सबल हुए हैं
गाँव-गली-राह में,
खून से सनी हुई
छुरी छिपी है बाँह में,
मौत जिन्दगी की रेल में सवार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!

चीत्कार, काँव-काँव,
छल रहे हैं धूप छाँव,
आदमी के ठाँव-ठाँव,
चल रहे हैं पेंच-दाँव,
सभ्यता के हाथ सभ्यता शिकार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
--
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
खटीमा, उत्तराखण्ड (भारत)

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! शास्त्री जी!सुन्दर नवगीत!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभ्यताएं अपने आप को नष्ट कर लेती है

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर कविता जी.धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूबसूरती से लिखा है ये नवगीत....मौत जिंदगी कि रेल पर सवार हो गयी.....कटु सत्य ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. श्री मयंक जी, नमस्कार.
    आपके नवगीत ने भाव विभोर कर दिया है.
    हमें अभी तक नवगीत लिखना ही नहीं आया- गीत ही बन जाता है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. उत्तम द्विवेदी2 मई 2010 को 8:59 am

    बहुत खूब ... आप से बहुत कुछ सिखने को मिला.
    सधन्यवाद, बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  7. जिन्दगी ही जिन्दगी पे आज भार हो गई!
    मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
    -----------------
    सभ्यता के हाथ सभ्यता शिकार हो गई!
    मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
    बहुत गहराई तक घाव करता हुआ ये गीत, इस सुन्दर गीत के लिए डाक्टर साहब को बहुत बहुत बहुत बधाई एवं धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

    उत्तर देंहटाएं
  8. हादसे सबल हुए हैं
    गाँव-गली-राह में,
    खून से सनी हुई
    छुरी छिपी है बाँह में,
    मौत जिन्दगी की रेल में सवार हो गई!
    मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
    बहुत बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  9. विमल कुमार हेडा7 मई 2010 को 8:38 am

    शारदा जी नमस्कार, टिपण्णी LINK करने का तरीका बदल जाने के कारण ANONYMOUS से टिपण्णी करना पड़ा वैसे निचे नाम तो लिखा था, आपके सुझाव का स्वागत है, धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

    उत्तर देंहटाएं
  10. गीत की यह प्रविष्टि यह सचमुच सिंगार हो गयी.
    अमन चैन शांति पर हिंसा निसार हो गई...

    पूरा होगा स्वप्न यह
    पग है इसी राह में
    मयंक को बधाई है-
    सलिल की वाह-वाह में.

    प्रतीक बिम्ब शिल्प भाव मिल गुहार हो गई!
    गीत की यह प्रविष्टि यह सचमुच सिंगार हो गयी.

    उत्तर देंहटाएं
  11. मौत ज़िंदगी की रेल में सवार हो गई!
    सभ्यता के हाथ सभ्यता शिकार हो गई!
    --
    इन दो पंक्तियों में निहित बिंब
    आतंकवाद की संपूर्ण विभीषिका दर्शाने में सक्षम हैं!
    --
    गाने का प्रयास किया जाए,
    तो इसे एक अच्छी लय में सुंदर ढंग से
    गाया जा सकता है!

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।