2 मई 2010

०४ : फिर कब आएँगे? : नईम

चिट्ठी-पत्री, ख़तो-क़िताबत के मौसम
फिर कब आएँगे?
रब्बा जाने,
सही इबादत के मौसम
फिर कब आएँगे?

चेहरे झुलस गए क़ौमों के लू-लपटों में,
गंध चिरायँध की आती छपती रपटों में।
युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा -
इससे बदतर
किसी क़यामत के मौसम
फिर कब आएँगे?

हवालात-सी रातें दिन कारागारों से,
रक्षक घिरे हुए चोरों से, बटमारों से।
बंद पड़ी इजलास,
ज़मानत के मौसम
फिर कब आएँगे?

ब्याह-सगाई, बिछोह-मिलन के अवसर चूके,
फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके।
लगा अँगूठा कटवा बैठे नाम खेत से -
जीने से भी बड़ी
शहादत के मौसम
फिर कब आएँगे?
--
नईम

6 टिप्‍पणियां:

  1. ब्याह-सगाई, बिछोह-मिलन के अवसर चूके,
    फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके।
    लगा अँगूठा कटवा बैठे नाम खेत से -
    जीने से भी बड़ी
    शहादत के मौसम
    फिर कब आएँगे? yu to poora hi geet bahut achchha laga par yahaN dusri paNkti hamaari laachaari ko vyakt karta anutha bimb hai
    badhai

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  2. चेहरे झुलस गए क़ौमों के लू-लपटों में,
    गंध चिरायँध की आती छपती रपटों में।
    युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा -
    इससे बदतर
    किसी क़यामत के मौसम
    फिर कब आएँगे?

    बहुत बढ़िया नवगीत

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  3. देशज टटकापन माटी का
    सोंधापन
    फिर कब पाएँगे?
    हम यह जानें ,
    नवगीतों की भेंटें
    आज पुनः पाएँगे?

    गहरी बात कह सके कैसे कम से कम में?
    गीतकार हर सोचे दम यह आये कलम में.
    छंद बिना कविता सिसके, सन्नाटा छाया-

    श्री नईम से बेहतर
    नवगीतों को लिखना
    खुद नईम ही लिख पाएंगे?

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  4. नईम-जैसे नवगीतकार के कथ्य पर टिप्पणी करना,
    तो सूरज को दीपक दिखाने के जैसा ही है!
    --
    मुझे ऐसा अवश्य प्रतीत हुआ कि
    दूसरे अंतरे की एक पंक्ति प्रकाशित होने से रह गई है!
    --
    यह एक सशक्त नवगीत है!
    लिखना सीख रहे रचनाकारों को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए!

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