14 मई 2010

१६ : आतंक ने है घेरा : शारदा मोंगा 'एरोमा'

है समय का फेरा,
आतंक ने है घेरा।

चोरी धमार, है बेशुमार,
दुराचार और अत्याचार,
असहाय जनता है लाचार,
छल कपट का डेरा।

सिलसिला बम्ब धमाकों का,
अपहरण और विस्फोटों का,
खून के प्यासे, बहशी दरिंदे ,
स्वार्थी दुश्मन, विषैले फंदे ,
आतंकी साया चहुँ ओर छाया,
लगाया खौफ ने डेरा।

उठ जाग युवक, रणभेरी बजा,
कर दृढ़ संकल्प , पकड़ खडग,
वीरों का कर्तव्य यही ,
पहन क्रान्ति का चोला,
आतंक हो समूल नष्ट,
मिटे आतंकी घेरा।
--
शारदा मोंगा 'एरोमा'

8 टिप्‍पणियां:

  1. विमल कुमार हेडा़15 मई 2010 को 8:22 am

    उठ जाग युवक, रणभेरी बजा,
    कर दृढ़ संकल्प , पकड़ खडग,
    वीरों का कर्तव्य यही ,
    पहन क्रान्ति का चोला,
    आतंक हो समूल नष्ट,
    मिटे आतंकी घेरा।

    नई जागृति नया जोश भरती ये पंक्तियाँ, रचना अच्छी लगी
    शारदा जी को बहुत बहुत बधाई, धन्यवाद।

    विमल कुमार हेडा़

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  2. अच्छा प्रयास किन्तु भाषा के प्रवाह, लय और पदभार को जितना साध सकें, गीत में उतना निखर आएगा.

    सिमट गया उजियारा.
    फ़ैल रहा अंधियारा.

    गीत पंक्तियों का विषम भार.
    ज्यों लय ने किया अस्वीकार
    शासन से जनगण बेज़ार.
    लगाता आतंक नित्य फेरा.

    अंतरों को जोड़ सके मुखड़ा.
    मिट जाये तब सारा दुखड़ा.
    विषमता स्वीकार्य नहीं पद में.
    अनदेखी सुविधा के मद में.
    सत्ता ने खुद को भरमाया,
    कालिमामय हो रहा सवेरा.

    गीत रच सुगीत मीत गा.
    बाँसुरी अमन की फिर बजा.
    बहे नेह नर्मदा नदी.
    मिटा दे आतंक औ' बदी.
    लय-धुन है गीत को अभीष्ट.
    भाव का अभाव है घनेरा.
    Acharya Sanjiv Salil

    http://divyanarmada.blogspot.com

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  3. एक अच्छा प्रयास है शारदा जी। जोशीला गीत है आपका । धन्यवाद ।
    सादर,
    शशि पाधा

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