15 मई 2010

१७ : घमासान हो रहा : भारतेंदु मिश्र

आसमान लाल-लाल हो रहा,
धरती पर घमासान हो रहा।

हरियाली खोई है,
नदी कहीं सोई है,
फसलों पर फिर किसान रो रहा।

सुख की आशाओं पर,
खंडित सीमाओं पर,
सिपाही लहू लुहान हो रहा।

चिनगी के बीज लिए,
विदेशी तमीज लिए,
परदेसी धान यहाँ बो रहा।
--
भारतेंदु मिश्र

7 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब ...मन को भायी ये रचना.

    ______________
    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है !!

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  2. sankshipt shabdavali me aatank ke alag alag roopoN ka chitran achchha geet hai

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  3. भारतेन्दु जी !
    अच्छे प्रयोग . प्रशंसनीय ।

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  4. भारतेन्दु जी !
    अच्छे प्रयोग . प्रशंसनीय ।

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  5. विमल कुमार हेडा़17 मई 2010 को 8:47 am

    रचना अच्छी लगी, बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद।
    विमल कुमार हेडा़

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  6. शब्द-शब्द चीख-चीख रो रहा.
    आदमी अनीत-बीज बो रहा..

    रचना मन भाई है.
    कहनी कह पाई है.
    अनुष्ठान सार्थक यह हो रहा।

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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