19 मई 2010

२१ : काला कूट धुआँ : प्रवीण पंडित

नस-नाड़ी अग्नि दहकाता काला कूट धुआँ
बन कर आँसू भरी आंख से आया फूट धुआँ

सरसों झुलसी , सूखी तुलसी
घर अंगने बदरंग ।
मक्खन जैसी देह का छिन मे,
छलनी हो गया अंग ।
अरमानों की फ़सल को पल में ले गया लूट धुआँ ।

बिटिया बहना निपट अकेली,
चौखट बिखरे केश ।
देह हुलसती लकवा खा गयी,
फुलकारी हुई श्वेत ।
उम्र चौरासी के सपनों को कर गया ठूंठ धुआँ।

भटके बछड़ों के सपनों की ,
ऊंची उड़े पतंग|
रोज़ी-रोटी की आसानी,
सीख और सत्संग|
काले बादल चीर के उजली दे जाये धूप धुआँ।
--
प्रवीण पंडित

6 टिप्‍पणियां:

  1. waah sir...badi hi samvedansheel kavita...aaj ki paristhiti ka achcha vivechan kiya....

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  2. विमल कुमार हेड़ा20 मई 2010 को 8:25 am

    सुन्दर रचना बहुत बहुत बधाई,
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेड़ा

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  3. Praveen Ji, marmsparshi rachna ke liye haardik dhanyvaad.
    Saadr,
    Shashi

    { yaatra me hone se Devnaagari me nai likh saki}

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  4. तन-मन, जग-जीवन झुलसाता काला कूट धुआँ.
    सच का शंकर हँस पी जाता, सारा झूट धुआँ....

    आशा तरसी, आँखें बरसीं,
    श्वासा करती जंग.
    गायन कर गीतों का, पाती
    हर पल नवल उमंग.
    रागी अंतस ओढ़े चोला भगवा-जूट धुआँ.....

    पंडित हुए प्रवीण, ढाई
    आखर से अनजाने.
    अर्थ-अनर्थ कर रहे
    श्रोता सुनें- नहीं माने.
    धर्म-मर्म पर रहा भरोसा, जाता छूट धुआँ.....

    गीत सार्थक है. . कूट, फूट, लूट के साथ ठूंठ या धूप की तुक नहीं मिलती गलत है. छूट, जूट, टूट, बूट, शूट, हूट सही रहतीं.

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