24 मई 2010

२६ : आतंक का साया : संजीव वर्मा 'सलिल'

सच कहें मन भा गया
आतंक का साया.....

भीड़ तंत्री हम न जानें
आत्म अनुशासन.
स्वार्थ मंत्री हम न मानें
नीति, हो उन्मन.
'प्रीति भय बिन हो नहीं'-
है सत्य यह चिंतन-
सफल शासक वही जिसने
नियम मनवाया.
सच कहें मन भा गया
आतंक का साया.........

क्रांतिकारी जब बने आतंक
अरि भागा.
सत्य-आग्रह हेतु जन-मन
तभी अनुरागा.
तंत्र अपना हुआ, निज हित
सभी ने साधा.
है नहीं आतंक, भ्रष्टाचार
मन भाया.
सच कहें मन भा गया
आतंक का साया.........

आओ! सर्वोदय की भूली
राह अपनायें.
दुराग्रह का शमन कर,
सुख-शांति फिर लायें.
सिरफिरे जो उन्हें दें
कटु दंड- थर्रायें.
शेष जन-गण कहे:जैसा
किया फल पाया.
सच कहें मन भा गया
आतंक का साया.......
--
संजीव वर्मा 'सलिल'

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरनीय सलिलजी,
    प्रणाम.
    नासमझ बेनामी के कारण हमें अपने साथ से वंचित न करें. आपसे अनुरोध है.
    वस्तुत; बेनामी को गीत समझ नहीं आया. हमें भी समझने के लिए तनिक प्रयत्न करना पड़ा था .यदि मुखड़े का अंश-
    सच कहें मन भा गया
    'आतंक का साया'.......
    इस प्रकार ('----') में दिखाया जाता तो तनिक समझने मैं सरल हो जाता.
    धन्यवाद.
    सादर-शारदा मोंगा

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  2. आदरणीय सलिल जी का गीत बहुत उच्चस्तरीय है। इस सम्बन्ध में कोई विपरीत टिप्पणी जिसे मैं पढ़ नहीं पाया ध्यान देने योग्य नहीं है। कई पाठक कविता की समझ नहीं रखते और अन्यथा अर्थ निकाल लेते हैं। आशा है सलिल जी विचलित नहीं होंगे और नवगीत की पाठशाला में पूर्ववत् योगदान करते रहेंगे।
    शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

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