8 सितंबर 2010

०४. नाची झन-झनक-झन : प्रवीण पंडित

बरखा बिखरी
हुई वियोगिन साँवरी
नाची झन-झनक-झन
बावरी

कोयल कूकी
एक लहर-सी जी में हूकी
कुछ सीधे, कुछ आड़े-टेढ़े, पाँव री
बिखरी लटियां, नयना बिखरे
भाव री

मेघा गरजा
बहुत हिया में ख़ुद को बरजा
भूली पनघट, कुइँयाँ, गलियाँ, गाँव री
पी को मिलने चली, लिए मन
चाव री

रिमझिम बुँदियाँ
भीगा झूलन,भीगा अँचरा,भीगी गुइँयाँ
सुबक सवेरे कागा बोला, काँव री
जागी लगी जिया की, भूली
घाव री
--
प्रवीण पंडित

9 टिप्‍पणियां:

  1. रिमझिम बुँदियाँ
    भीगा झूलन,भीगा अँचरा,भीगी गुइँयाँ
    सुबक सवेरे कागा बोला, काँव री
    जागी लगी जिया की, भूली
    घाव री
    --sunder abhivyakti
    badhai
    rachana

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  2. ध्यान दिया जाये-
    "पावस आवत देखि करि, कोयल साधी मौन,
    अब दादुर वक्ता भये हम को पूछत कौन".

    क्षमा करें
    वर्षा के मौसम में कोयल नहीं, मेंढक टर्राते हैं.
    वर्षा में तो 'दादुर मोर पपिहा बोले'

    "कोयल कूकी
    एक लहर-सी जी में हूकी" से बसंत का आभास
    होती है

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  3. उत्तम द्विवेदी10 सितंबर 2010 को 7:09 pm

    भूली पनघट, कुइँयाँ, गलियाँ, गाँव री
    .....
    भीगा झूलन,भीगा अँचरा,भीगी गुइँयाँ
    सुबक सवेरे कागा बोला, काँव री

    सुन्दर पंक्तियाँ,बधाई!

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  4. मेघा गरजा
    बहुत हिया में ख़ुद को बरजा
    भूली पनघट, कुइँयाँ, गलियाँ, गाँव री
    पी को मिलने चली, लिए मन
    चाव री

    रिमझिम बुँदियाँ
    भीगा झूलन,भीगा अँचरा,भीगी गुइँयाँ
    सुबक सवेरे कागा बोला, काँव री
    जागी लगी जिया की, भूली
    घाव री
    --
    विरह वेदना को इससे संुदर अभिव्यक्ति आज तक “ाायद किसी दी हो
    प्रवीणजी इस मरहमजनित पंक्तियों के लिए आपको “ातषः साधुवाद।

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  5. शारदा जी !
    आपकी बात पूर्णतः उचित है |
    जानकारी हेतु आभार |

    प्रवीण

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  6. अच्छी रचना. त्रुटि की चर्चा हो ही चुकी है, दुहराने से कोई लाभ नहीं.

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